सफेद फॉस्फोरस: दक्षिणी लेबनान का नबातियेह शहर। लगभग 40,000 लोगों की आबादी वाले इस शहर के आसमान में अचानक एक अजीब नजारा दिखा — हवा में फटते गोले, और फिर नीचे गिरती जलती हुई सफेद धाराएँ, जैसे आसमान से आग की बारिश हो रही हो। वीडियो सोशल मीडिया पर फैले, विशेषज्ञों ने पहचाना — यह सफेद फास्फोरस था।
इजरायल ने आरोपों से इनकार किया। मानवाधिकार संगठन चिल्लाते रहे। और दुनिया ने एक बार फिर वही पुराना सवाल सुना जो हर उस युद्ध में उठता है जहाँ ये हथियार इस्तेमाल होते हैं: क्या यह युद्ध अपराध है?
इस सवाल का जवाब सीधा नहीं है। और यही इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी त्रासदी है।
सफेद फास्फोरस: वह आग जो पानी से नहीं बुझती
सफेद फास्फोरस एक मोमी, पीले-सफेद रंग का रासायनिक तत्व है। इसकी खासियत — और इसकी भयावहता — एक ही बात में है: यह हवा के संपर्क में आते ही जलने लगता है, और तब तक जलता रहता है जब तक ऑक्सीजन मिलती रहे।
इसे पानी से नहीं बुझाया जा सकता। त्वचा पर पड़े तो हड्डी तक जल जाती है। धुआँ इतना घना और जहरीला होता है कि साँस लेना मुश्किल हो जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, इजरायल अमेरिकी निर्मित 155 मिमी M825A1 आर्टिलरी गोले का उपयोग करता है, जिनमें सफेद फास्फोरस से लेपित 116 टुकड़े होते हैं। इन्हें हवा में फटने के लिए डिजाइन किया गया है — जिससे एक बड़े इलाके में घना धुआँ फैलता है और जमीन पर आग का जोखिम पैदा होता है।
सेनाएँ इसे मुख्यतः तीन कामों के लिए इस्तेमाल करती हैं: धुएँ की आड़, लक्ष्य चिह्नित करना, और इन्सेंडियरी हथियार के रूप में — यानी आग लगाने के लिए।
समस्या यह है कि तीसरा उपयोग पहले दो की आड़ में होता है, और अंतरराष्ट्रीय कानून दोनों के बीच की रेखा खींचने में बुरी तरह विफल रहा है।
इतिहास के वो काले अध्याय जब दुनिया ने रासायनिक हथियार झेले
सफेद फास्फोरस अकेला नहीं है। रासायनिक युद्ध का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी आधुनिक युद्धकला — और उतना ही क्रूर।
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) — रासायनिक युद्ध का जन्म
22 अप्रैल 1915 को बेल्जियम के Ypres में जर्मन सेना ने पहली बार बड़े पैमाने पर क्लोरीन गैस का इस्तेमाल किया। पीली-हरी धुंध की एक दीवार मित्र राष्ट्रों की खाइयों की तरफ बढ़ी। हजारों सैनिक दम घुटने से मरे। जल्द ही फॉसजीन और मस्टर्ड गैस भी मैदान में आए। प्रथम विश्वयुद्ध में रासायनिक हथियारों से करीब 1.3 लाख लोग मारे गए, और दस लाख से अधिक घायल हुए। यही वह पल था जब दुनिया ने महसूस किया कि एक नई, अदृश्य और अमानवीय किस्म की हत्या का हथियार ईजाद हो चुका है।
द्वितीय विश्वयुद्ध और उसके बाद
नाजी जर्मनी ने Zyklon B गैस का इस्तेमाल Holocaust में किया — यह शायद इतिहास का सबसे बड़ा रासायनिक नरसंहार था। जापान ने चीन में मस्टर्ड गैस और लुइसाइट का प्रयोग किया। वियतनाम युद्ध में अमेरिका ने Agent Orange (डाइऑक्सिन युक्त हर्बिसाइड) का प्रयोग किया, जिसके दुष्प्रभाव दशकों तक रहे।
हालिया इतिहास के घाव
- 1988 — हलबजा, इराक: सद्दाम हुसैन ने कुर्द नागरिकों पर मस्टर्ड गैस और नर्व एजेंट का इस्तेमाल किया। 5,000 से अधिक लोग मारे गए — यह युद्धकाल में नागरिकों पर रासायनिक हथियारों का सबसे बड़ा दस्तावेजीकृत हमला था।
- 2013 — गूटा, सीरिया: बशर अल-असद की सरकार पर सारिन गैस से 1,400 से अधिक नागरिकों की हत्या के आरोप। यह घटना दुनिया की अंतरात्मा को हिला देने वाली थी।
- 2017 — खान शेखौन, सीरिया: फिर सारिन। फिर बच्चे। फिर निंदा। फिर वही बेबसी।
- 2018 — सैलिसबरी, UK: रूसी खुफिया एजेंसी पर नोविचोक नर्व एजेंट से एक पूर्व रूसी जासूस पर हमले का आरोप।
कानून का ढाँचा: क्या है, क्या नहीं है
रासायनिक हथियार सम्मेलन (CWC) — 1993/1997
यह अंतरराष्ट्रीय कानून का सबसे मजबूत रासायनिक हथियार-रोधी दस्तावेज है। 193 देश इसके सदस्य हैं — यानी लगभग पूरी दुनिया। इसकी मुख्य बातें:
रासायनिक हथियारों का उत्पादन, भंडारण और उपयोग पूर्णतः प्रतिबंधित है। सदस्य देशों को अपने मौजूदा भंडार नष्ट करने थे। इसके क्रियान्वयन के लिए OPCW (Organisation for the Prohibition of Chemical Weapons) बनाया गया, जिसे 2013 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला।
लेकिन खामी: CWC सफेद फास्फोरस को रासायनिक हथियार नहीं मानता। यह इसकी सबसे बड़ी कमी है।
जिनेवा प्रोटोकॉल — 1925
प्रथम विश्वयुद्ध की भयावहता के बाद तैयार इस संधि ने युद्ध में दमघोंटू, जहरीली और अन्य गैसों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया। यह रासायनिक युद्ध पर पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय समझौता था। भारत 1930 में इसका हिस्सा बना।
CCW (Certain Conventional Weapons Convention) — 1980
इस संधि का प्रोटोकॉल III इन्सेंडियरी हथियारों — यानी आग लगाने वाले हथियारों — के नागरिक क्षेत्रों में उपयोग को प्रतिबंधित करता है। सफेद फास्फोरस यहाँ एक ग्रे एरिया में है। इसे “मुख्य रूप से इन्सेंडियरी” नहीं माना जाता यदि इसका प्राथमिक उद्देश्य धुआँ या रोशनी पैदा करना बताया जाए।
यही वह कानूनी खामी है जिसका फायदा सेनाएँ उठाती हैं।
रोम संविधि (Rome Statute) और ICC
अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) नागरिकों पर जानबूझकर रासायनिक या इन्सेंडियरी हथियारों के प्रयोग को युद्ध अपराध मान सकता है। लेकिन ICC की अपनी सीमाएँ हैं — बड़ी शक्तियाँ इसकी सदस्यता से बाहर हैं या इसके फैसलों की परवाह नहीं करतीं।
सफेद फास्फोरस और कानून की कमज़ोरी
यही इस पूरी कहानी का केंद्र है। इजरायली सेना का तर्क है कि वह सफेद फास्फोरस का उपयोग धुएँ की आड़ के लिए करती है, न कि हमले के लिए — और कानूनी तौर पर यह तर्क खारिज करना आसान नहीं है।
लेकिन मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि 40,000 की आबादी वाले शहर के ऊपर इस हथियार का इस्तेमाल, चाहे इरादा कुछ भी हो, नागरिकों को भयावह नुकसान पहुँचाता है। और यहीं अनुपातहीनता का सिद्धांत (Principle of Proportionality) आता है — अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून कहता है कि युद्ध में नागरिक नुकसान सैन्य लाभ के अनुपात में होना चाहिए।
टायर, कलाया, खियाम और योहमोर जैसे इलाकों में भी ऐसे हथियारों के इस्तेमाल के संकेत मिलने की बात कही गई है। ये सब सवाल उठाते हैं कि क्या यह “धुएँ की आड़” थी या कुछ और।
असली सवाल: कानून काफी है?
रासायनिक युद्ध पर अंतरराष्ट्रीय कानून का ढाँचा तब बना जब दुनिया को WWI की तबाही ने झकझोरा था। लेकिन एक सदी बाद भी:
सफेद फास्फोरस जैसे हथियार कानूनी ग्रे ज़ोन में हैं। सीरिया ने सारिन का प्रयोग किया और OPCW की निंदा के बावजूद जारी रखा। रूस ने नोविचोक इस्तेमाल किया और कभी जवाबदेह नहीं हुआ। CWC से बाहर के देश या राज्येतर संगठन किसी भी नियंत्रण में नहीं हैं।
कानून के पास शब्द हैं, पर दाँत नहीं।
निष्कर्ष: आग सिर्फ लेबनान में नहीं जल रही
नबातियेह के आसमान में जो सफेद लकीरें दिखीं, वे सिर्फ फास्फोरस की नहीं थीं — वे उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की खामियों की भी लकीरें थीं जो एक सदी में रासायनिक युद्ध को रोकने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाई।
जब तक सफेद फास्फोरस CWC के दायरे से बाहर है, जब तक “धुएँ की आड़” और “नागरिकों पर हमले” के बीच की रेखा धुंधली है, और जब तक बड़ी ताकतें अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों के फैसलों को नजरअंदाज करती रहेंगी — तब तक यह आग बुझेगी नहीं।न लेबनान में। न दुनिया में।
