यूक्रेन को सैन्य सहायता पहुंचाने के मकसद से किए गए एक बड़े गोला-बारूद सौदे ने एस्टोनिया की राजनीति में भूचाल ला दिया है। इस विवाद के बाद देश के रक्षा मंत्री हन्नो पेवकुर (Hanno Pevkur) को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। यह पूरा मामला भारतीय स्वामित्व वाली एक कंपनी से जुड़े 70 मिलियन यूरो (करीब ₹768.50 करोड़) के आर्टिलरी शेल सौदे से संबंधित है।
क्या था पूरा सौदा?
एस्टोनिया ने अगस्त 2024 में इटली की कंपनी डाटासेल SRL के साथ पहला समझौता किया और उसे करीब 15 मिलियन यूरो का अग्रिम भुगतान किया। इसके बाद अक्टूबर में दूसरा समझौता हुआ, जिसमें 10 मिलियन यूरो से अधिक की अतिरिक्त राशि दी गई। इसी तरह कई और समझौतों के जरिए साल के अंत तक कुल अग्रिम भुगतान लगभग 70 मिलियन यूरो तक पहुंच गया। यह सौदा एस्टोनिया की ‘सेंटर फॉर डिफेंस इन्वेस्टमेंट्स’ एजेंसी और डाटासेल के बीच हुआ था, जिसका मकसद युद्धग्रस्त यूक्रेन को आर्टिलरी शेल की आपूर्ति करना था, क्योंकि उस दौरान कीव में गोला-बारूद की भारी कमी थी।
भारतीय कनेक्शन कैसे आया सामने?
दिलचस्प बात यह रही कि डाटासेल SRL को उसी साल 2024 में भारत की कंपनी ‘नेको डिफेंस म्यूनिशंस’ ने खरीद लिया था। सबसे हैरान करने वाली बात यह सामने आई कि इतने बड़े रक्षा सौदे में शामिल होने के बावजूद डाटासेल ने अपने पूरे इतिहास में पहले कभी एक भी तोप का गोला नहीं बनाया था। कंपनी की उत्पादन क्षमता और साख को लेकर उठे इन्हीं सवालों ने पूरे मामले को विवादों के घेरे में ला दिया।
देरी और गुणवत्ता को लेकर उठे सवाल
भुगतान के बाद उम्मीद थी कि गोला-बारूद कुछ महीनों में यूक्रेन तक पहुंच जाएगा, लेकिन उत्पादन से जुड़ी दिक्कतों के चलते आपूर्ति में लगातार देरी होती रही। 2025 में जब कुछ खेप पहुंची भी, तो रिपोर्टों में दावा किया गया कि वह आवश्यक गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरी।
हालांकि, डाटासेल कंपनी ने इन तमाम आरोपों से इनकार किया है। कंपनी की ओर से कहा गया कि समझौते रद्द होने से पहले उसने एस्टोनिया सरकार को करीब 59 मिलियन यूरो मूल्य का गोला-बारूद उपलब्ध कराया था। वहीं दूसरी ओर, नेको इंडस्ट्रीज के डायरेक्टर रमेश जयसवाल ने भी अपना पक्ष रखते हुए दावा किया कि एस्टोनिया के संबंधित अधिकारियों की गुणवत्ता जांच के बाद ही तोप के गोले भेजे गए थे, और गुणवत्ता जांच पास करने के बाद कंपनी को आगे के ठेके भी मिले, लेकिन बाद में फंड की कमी के चलते उन्हें रोक दिया गया।
ऑडिट रिपोर्ट बनी इस्तीफे की वजह
इस पूरे मामले ने तब गंभीर मोड़ लिया जब एस्टोनिया की राष्ट्रीय ऑडिट एजेंसी ने डाटासेल कंपनी की क्षमताओं और उसकी पृष्ठभूमि पर गंभीर सवाल उठाते हुए एक रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद देश में रक्षा मंत्री पर इस्तीफे का राजनीतिक दबाव लगातार बढ़ता गया।
मंत्री ने ली जिम्मेदारी, लेकिन बचाव भी किया
बुधवार देर रात एक टीवी कार्यक्रम में इस्तीफे की घोषणा करते हुए हन्नो पेवकुर ने राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकार की। उन्होंने कहा कि रक्षा मंत्री व्यक्तिगत रूप से हर अनुबंध की निगरानी नहीं करता, लेकिन ऑडिट रिपोर्ट के निष्कर्ष राजनीतिक जिम्मेदारी का सवाल खड़ा करते हैं, इसीलिए उन्होंने रक्षा क्षेत्र की संपूर्ण जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने का निर्णय लिया।
गौरतलब है कि हन्नो पेवकुर साल 2022 से एस्टोनिया के रक्षा मंत्री का पद संभाल रहे थे। दिलचस्प यह भी रहा कि एस्टोनिया के प्रधानमंत्री क्रिस्टन मिखाल ने भी कहा कि उन्हें इसमें पेवकुर की कोई व्यक्तिगत गलती नजर नहीं आती, बावजूद इसके राजनीतिक जिम्मेदारी तय होने से इस्तीफा हुआ।
यह मामला दिखाता है कि युद्धकाल में की जाने वाली आपात रक्षा खरीद में जल्दबाजी और उचित पड़ताल की कमी किस तरह बड़े वित्तीय व राजनीतिक संकट को जन्म दे सकती है। एक ऐसी कंपनी को करोड़ों का अग्रिम भुगतान करना, जिसका आर्टिलरी शेल बनाने का कोई पूर्व अनुभव या रिकॉर्ड नहीं था, अंततः एस्टोनिया की सरकार के लिए भारी राजनीतिक कीमत साबित हुआ।
