मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सहारनपुर में प्रदेशव्यापी “डिजी रोवर (डिजी रोवर-जीएनएसएस) विशेष भूमि पैमाइश अभियान” का शुभारंभ किया, जो 1 जुलाई से शुरू होकर 15 अगस्त तक पूरे प्रदेश में संचालित किया जाएगा। इस अभियान के दौरान सभी तहसीलों में सीमांकन एवं पैमाइश से जुड़े लंबित मामलों का निस्तारण अत्याधुनिक डिजी रोवर तकनीक के जरिए किया जाएगा। साफ है कि सरकार सिर्फ एक जिले या एक तहसील तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में इस बदलाव को एक साथ लागू कर रही है।
इसके पीछे मंशा यह है कि भूमि संबंधी विवादों का त्वरित समाधान हो सके और राजस्व सेवाएं पहले से ज्यादा पारदर्शी, सटीक और तकनीक आधारित बनें।
डिजी रोवर तकनीक आखिर है क्या
यह कोई सामान्य मशीन नहीं, बल्कि सैटेलाइट-आधारित एक अत्याधुनिक सर्वे यंत्र है। यह उपकरण ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जीएनएसएस) पर आधारित है, जो पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे कई उपग्रहों से संकेत प्राप्त कर किसी भी जगह की स्थिति बेहद सटीकता से तय करता है। एक विशेष सुधार प्रणाली की मदद से यह जमीन की माप सेंटीमीटर स्तर तक की शुद्धता के साथ कर सकता है।
सीधे शब्दों में समझें तो लेखपाल या राजस्व अधिकारी अब जमीन पर रोवर यंत्र लेकर जाते हैं, यह यंत्र सैटेलाइट से जुड़कर उस स्थान के अक्षांश-देशांश (कोऑर्डिनेट्स) को सेकंडों में रिकॉर्ड कर लेता है, और उसी आधार पर सीमा रेखा और क्षेत्रफल तय हो जाता है — पूरी तरह डिजिटल रिकॉर्ड के साथ।
पुरानी प्रक्रिया क्या थी और उसमें दिक्कत कहां थी
अब तक प्रदेश में राजस्व विभाग द्वारा जरीब के माध्यम से खेतों की नपाई की जाती रही है, जिसके चलते लगातार भूमि विवाद और अन्य राजस्व संबंधी मामले सामने आते रहे हैं। जरीब यानी लोहे की कड़ियों से बनी एक पारंपरिक चेन, जिसकी मानक लंबाई 66 फीट होती है और इसमें 100 कड़ियां होती हैं।
इस तरीके में कई खामियां थीं:
- चेन खींचने में हाथ से होने वाली गलती की गुंजाइश हमेशा बनी रहती थी।
- पहले जमीन एक फिक्स बिंदु तय करके करीब (जरीब) के माध्यम से नापी जाती थी, और उसी के आधार पर आगे का पैमाना तय होता था — यानी एक जगह चूक हुई तो पूरा माप गड़बड़ हो सकता था।
- न कोई डिजिटल रिकॉर्ड बनता था, न भविष्य में आसानी से सत्यापन हो पाता था — इसी वजह से पक्षपात और विवाद की शिकायतें आम थीं।
- नतीजा यह होता था कि सीमांकन के मामले वर्षों तक तहसीलों में लंबित पड़े रहते थे।
नई तकनीक पुरानी से बेहतर कैसे है
पारंपरिक जरीब या फीते से होने वाली पैमाइश की तुलना में डिजी रोवर तकनीक कहीं अधिक वैज्ञानिक, विश्वसनीय और प्रामाणिक मानी जाती है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि हर मापन का एक डिजिटल रिकॉर्ड तैयार हो जाता है, जिसका भविष्य में भी सत्यापन किया जा सकता है — यानी विवाद की स्थिति में दोबारा जांच आसान हो जाती है।
खुद मुख्यमंत्री ने भी इस पर मुहर लगाई। उन्होंने कहा कि डिजी रोवर तकनीक के जरिए भूमि की पैमाइश पहले की तुलना में अधिक सटीक, पारदर्शी और विश्वसनीय होगी। इससे सीमांकन से जुड़ी त्रुटियां कम होंगी, भूमि विवाद और अनावश्यक मुकदमेबाजी पर भी असरदार लगाम लगेगी, और नागरिकों को समय पर राजस्व सेवाएं मिल सकेंगी।
गाजीपुर के जिलाधिकारी ने भी इसे लेकर उम्मीद जताई कि यह टेक्नोलॉजी सैटेलाइट का इस्तेमाल करती है, और सरकार की मंशा है कि इसके जरिए जमीनी विवाद के मामलों को कम से कम किया जाए ताकि लोगों को जल्द समाधान मिल सके।
अभियान कैसे काम करेगा
- अवधि: 1 जुलाई से 15 अगस्त तक पूरे प्रदेश में यह अभियान चलेगा।
- फोकस: इसमें तय समयावधि के भीतर अधिकतम लंबित पैमाइश प्रकरणों के निस्तारण का लक्ष्य रखा गया है।
- जिम्मेदारी किसकी: इस अभियान के सफल संचालन के लिए मंडलायुक्त, जिलाधिकारी, अपर जिलाधिकारी (राजस्व), उप जिलाधिकारी, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और लेखपाल — सभी मिलकर समन्वित रूप से काम करेंगे।
- कानूनी आधार: राजस्व संहिता की धारा-24 के तहत आने वाले सीमा-विवाद (हदबंदी) के लंबित मामलों को प्राथमिकता दी जा रही है — जिले-स्तर पर पहले से ही ऐसे अभियानों की तैयारी चल रही थी, जिन्हें अब डिजी रोवर तकनीक के साथ जोड़ दिया गया है।
- निगरानी: जिलाधिकारी और अपर जिलाधिकारी स्तर पर नियमित समीक्षा होगी ताकि तय समय-सीमा में ज्यादा से ज्यादा मामले निपटाए जा सकें।
व्यावहारिक स्तर पर प्रक्रिया कुछ इस तरह चलेगी: संबंधित किसान या भूमि-स्वामी का सीमांकन/पैमाइश का मामला जिस भी तहसील में लंबित है, वहां लेखपाल व राजस्व निरीक्षक मौके पर डिजी रोवर यंत्र लेकर पहुंचेंगे, संबंधित पक्षों व पड़ोसी खातेदारों की मौजूदगी में जमीन की सीमाएं जीएनएसएस से रिकॉर्ड की जाएंगी, और उसका डिजिटल दस्तावेज़ तैयार कर मामले का निस्तारण किया जाएगा।
क्या सभी जमीनों की पैमाइश दोबारा होगी?
यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है, और मौजूदा जानकारी के मुताबिक जवाब स्पष्ट है — नहीं, हर जमीन की दोबारा पैमाइश नहीं होगी।अभियान का मकसद खासतौर पर सीमांकन व पैमाइश से जुड़े वे मामले निपटाना है जो पहले से तहसीलों में लंबित पड़े हैं — यानी जिन जमीनों पर पहले से कोई विवाद, अपील या शिकायत दर्ज है, या जिनकी पैमाइश अब तक अधूरी/विवादित रही है, उन्हीं मामलों को प्राथमिकता से निपटाया जाएगा।
जिन जमीनों की पैमाइश पहले से हो चुकी है और उन पर कोई विवाद या शिकायत लंबित नहीं है, उनकी दोबारा पैमाइश की कोई अनिवार्यता फिलहाल सामने नहीं आई है। हां, अगर भविष्य में कोई खातेदार अपनी जमीन की सीमा को लेकर नया विवाद या शिकायत (धारा-24 के तहत या IGRS पोर्टल पर) दर्ज कराता है, तो उस मामले में भी अब डिजी रोवर तकनीक ही इस्तेमाल होगी।
क्या अब हमेशा के लिए केवल रोवर से ही पैमाइश होगी?
सरकार का उद्देश्य सिर्फ मौजूदा लंबित मामलों को निपटाना ही नहीं, बल्कि आगे चलकर भी तकनीक-आधारित व्यवस्था को स्थायी रूप देकर भूमि विवादों को न्यूनतम स्तर तक लाना है। इसका सीधा मतलब है कि यह कोई अस्थायी या एकबारगी अभियान भर नहीं, बल्कि सरकार की मंशा इसे आगे भी जमीन नापने का मुख्य और स्थायी तरीका बनाने की है। यानी आने वाले समय में नई पैमाइश, सीमांकन या विवाद-निस्तारण के ज्यादातर मामलों में परंपरागत जरीब की जगह डिजी रोवर तकनीक ही इस्तेमाल होने की उम्मीद है, हालांकि इसे लेकर अभी कोई अंतिम/औपचारिक आदेश सामने नहीं आया है कि जरीब को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया हो।
जनता के लिए यह कैसे फायदेमंद है
- कम समय में समाधान — डिजी रोवर अभियान से भूमि विवादों के समाधान की प्रक्रिया में तेजी आएगी और लोगों को अनावश्यक रूप से कार्यालयों के चक्कर लगाने से राहत मिलेगी।
- कम गलती, कम विवाद — सैटेलाइट-आधारित सटीक माप से सीमांकन की गलतियां घटेंगी, जिससे भाई-भाई या पड़ोसी खातेदारों के बीच जमीन को लेकर होने वाले झगड़े स्वाभाविक रूप से कम होंगे।
- डिजिटल रिकॉर्ड, भविष्य में सुरक्षा — हर मापन का डिजिटल रिकॉर्ड बनने से भविष्य में भी सत्यापन आसान होगा, यानी दोबारा विवाद होने पर पुराना सटीक डेटा मौजूद रहेगा।
- किसानों के अधिकार सुरक्षित — इससे किसानों के भूमि अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और तकनीक आधारित सुशासन मजबूत होगा।
- जवाबदेह प्रशासन — आधुनिक तकनीक अपनाने से राजस्व प्रशासन पहले से ज्यादा प्रभावी और जवाबदेह बनेगा।
चुनौतियां भी कम नहीं
हर बड़ी तकनीकी पहल की तरह इसकी सफलता भी कुछ शर्तों पर टिकी है। विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी नई तकनीक की सफलता केवल आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता से सुनिश्चित नहीं होती — इसके लिए प्रशिक्षित कर्मचारी, नियमित तकनीकी परीक्षण, अद्यतन भू-अभिलेख, गुणवत्ता नियंत्रण और प्रभावी निगरानी व्यवस्था भी जरूरी है। अगर उपकरण मानकों के अनुरूप संचालित नहीं हुए या पुराने भू-अभिलेख समय पर अपडेट नहीं हुए, तो तकनीक की उपयोगिता सीमित रह सकती है।
साथ ही, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस तरह की व्यवस्था की सफलता आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी पर भी निर्भर करती है — यानी पैमाइश के समय संबंधित खातेदारों और पड़ोसी भूमि-स्वामियों का मौके पर मौजूद रहना जरूरी होगा, ताकि माप को लेकर बाद में कोई विवाद न खड़ा हो।
यूपी सरकार का डिजी रोवर अभियान भूमि प्रबंधन के क्षेत्र में एक बड़ा और दूरगामी कदम है। दशकों पुरानी जरीब वाली व्यवस्था, जो इंसानी गलती और पक्षपात की गुंजाइश छोड़ जाती थी, अब सैटेलाइट-आधारित सटीक तकनीक को रास्ता दे रही है। फिलहाल इसका दायरा तहसीलों में लंबित सीमांकन-पैमाइश के मामलों तक सीमित है, लेकिन सरकार की मंशा इसे भविष्य में स्थायी और मुख्य व्यवस्था बनाने की है। अगर प्रशिक्षण, निगरानी और भू-अभिलेखों का अद्यतन ठीक ढंग से हुआ, तो यह तकनीक वाकई गांव-गांव में दशकों से चले आ रहे जमीनी झगड़ों को घटाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।
