राम मंदिर: अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से जुड़ा चढ़ावा चोरी और जमीन खरीद विवाद बीते कुछ हफ्तों से देश की सबसे बड़ी सुर्खियों में है। मामला जितना संवेदनशील है, उतना ही राजनीतिक रूप से गरमाया हुआ भी। इसलिए यह समझना जरूरी है कि अब तक जांच में क्या पुष्ट हुआ है, और क्या अभी सिर्फ आरोप या राजनीतिक दावे हैं।
मामला शुरू कैसे हुआ
जून 2026 की शुरुआत में मंदिर ट्रस्ट के आंतरिक ऑडिट के दौरान दानपात्रों से नकदी और अन्य सामान गायब होने की आशंका सामने आई। सीसीटीवी फुटेज खंगालने पर एक कर्मचारी की भूमिका संदिग्ध मिली, जिसके बाद आंतरिक जांच शुरू हुई। मंदिर के पूर्व लेखा प्रभारी महिपाल सिंह ने सबसे पहले आरोप लगाया कि दानपात्रों से करीब 7 करोड़ रुपए की चोरी हुई है, और यह कोई एक बार की घटना नहीं थी।
मामला सामने आते ही राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और आम आदमी पार्टी ने 200 करोड़ रुपए से ज्यादा की चोरी का आरोप लगाया। मामला बढ़ता देख खुद ट्रस्ट ने जांच की मांग की, जिसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 13 जून को तीन सदस्यीय एसआईटी (विशेष जांच दल) गठित की। एसआईटी में लखनऊ के मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, लखनऊ रेंज के आईजी किरण एस, और वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन को शामिल किया गया।
अब तक जांच में क्या-क्या सामने आया
गिरफ्तारियां और बरामदगी: 13 जून को दो कर्मचारियों की गिरफ्तारी हुई, जिनमें से एक के घर से करीब 10 लाख रुपए नकद बरामद हुए — कुछ रकम अलमारी में तो कुछ गोबर के ढेर में छिपाई गई मिली। बाद में मामले में कुल आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया — अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडे, रमाशंकर मिश्रा, सुभाष श्रीवास्तव और रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू। इन पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 306, 316, 317 और आपराधिक साजिश की धारा 61 के तहत मामला दर्ज हुआ है।
असामान्य संपत्ति: जांच में सामने आया कि 18-20 हजार रुपए मासिक वेतन पाने वाले कुछ कर्मचारियों ने हाल के महीनों में डेढ़ करोड़ और 40 लाख रुपए तक की जमीन-प्लॉट खरीदे। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि उनकी वास्तविक कमाई से ज्यादा संपत्ति कहां से आई।
जमीन खरीद में गड़बड़ी: निर्माण कार्य और जमीन खरीद में भी अनियमितता मिली है — आरोप है कि सर्किल रेट से कहीं ज्यादा भुगतान करके जमीनें खरीदी गईं। एक चर्चित उदाहरण सामने आया जिसमें 2021 में एक परिवार ने अयोध्या के बागबिजैसी गांव में अपनी जमीन दो खरीदारों को 2 करोड़ रुपए में बेची, और महज 10 मिनट बाद उन्हीं खरीदारों ने वही जमीन मंदिर ट्रस्ट को 18.5 करोड़ रुपए में बेच दी — यानी करीब 9 गुना ज्यादा दाम पर। इसी तरह के अन्य मामलों में जमीन 17 गुना तक महंगी खरीदे जाने के आरोप की भी जांच हो रही है। SIT फिलहाल तीन बिंदुओं पर जांच कर रही है: दानपात्रों की चोरी, जमीन खरीद में ओवर-पेमेंट, और निर्माण सामग्री खरीद में करीब 40% कमीशनखोरी की आशंका।
निगरानी तंत्र में ही सेंध: कथित रूप से ये भी सामने आया है कि जिन लोगों को चढ़ावे की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई थी, उनमें से करीब 40 लोगों की भूमिका ही संदिग्ध पाई गई है — जिनमें कंट्रोल रूम प्रभारी, निजी सुरक्षाकर्मी, और पुलिस-पीएसी के जवान तक शामिल हैं। ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों के भतीजे-रिश्तेदार भी मंदिर प्रबंधन में सक्रिय पाए गए, जिनके जरिए कथित तौर पर रकम की बंदरबांट होने का शक जताया गया है।
इस्तीफे: दबाव बढ़ने पर ट्रस्ट महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने नैतिक आधार पर इस्तीफा दे दिया।
सरकार की कार्रवाई अब तक
- 140 पन्नों की SIT रिपोर्ट उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) को सौंपी जा चुकी है, जिसमें कई सेवादारों और अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध बताई गई है और दोषियों पर FIR दर्ज कराने की संस्तुति की गई है।
- आठों गिरफ्तार आरोपियों की संपत्तियों पर बुलडोजर कार्रवाई और गैंगस्टर एक्ट लगाने की तैयारी की जा रही है।
- सरकार ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा-107 के तहत आरोपियों से नकदी, सोना-चांदी और संपत्ति की पूरी वसूली की योजना बनाई है — यह प्रावधान अपराध से अर्जित संपत्ति जब्त करने के लिए गैंगस्टर एक्ट से भी तेज माना जा रहा है।
- SIT दूसरे चरण में अब जमीन खरीद से जुड़े वित्तीय लेनदेन, बैंक अधिकारियों की भूमिका और नकदी गणना में शामिल कर्मियों की जांच कर रही है।
- मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि मामले में “दूध का दूध और पानी का पानी” किया जाएगा।
विपक्ष के आरोप — जिन पर अभी कोई पुष्टि नहीं
यहां यह साफ समझना जरूरी है कि नीचे लिखी बातें अभी तक जांच में साबित तथ्य नहीं हैं, बल्कि विपक्षी नेताओं के राजनीतिक आरोप हैं:
- अखिलेश यादव ने FIR दर्ज होने के बाद सवाल उठाया कि “छोटी मछलियों को सजा दी जाएगी जबकि बड़ी मछलियों को छोड़ दिया जाएगा”, और यह भी कहा कि हो सकता है FIR दर्ज होने से पहले सबूत मिटाने के लिए SIT प्रक्रिया का इस्तेमाल हुआ हो।
- कुछ विपक्षी नेताओं ने FIR को “दिखावा” बताते हुए आरोप लगाया कि ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारियों — जिनमें चंपत राय और अनिल मिश्रा शामिल हैं — की जवाबदेही अभी तय नहीं की गई है।
- आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को महाभारत के धृतराष्ट्र से जोड़ते हुए दावा किया कि इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्टों के बावजूद केंद्र सरकार को घोटाले की जानकारी नहीं मिली, यह असंभव है।
- गिरफ्तार आरोपी टिन्नू के भाई ने भी आरोप लगाया कि “बड़े लोग खुद को बचाने के लिए [छोटों को] मोहरा बना रहे हैं।”
- भाजपा नेता रजनीश सिंह ने खुद PMO को पत्र लिखकर ट्रस्ट से चंदे, जमीन खरीद-बिक्री और ऑडिट रिपोर्ट का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करने की मांग की थी। बताया गया है कि जिला प्रशासन के संपर्क करने पर ट्रस्ट ने SIT जांच का हवाला देकर जानकारी देने से इनकार कर दिया।
- राष्ट्रीय जनता दल के एक सांसद ने ट्रस्ट के वित्तीय लेनदेन के फोरेंसिक ऑडिट और CBI जांच की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, साथ ही मांग की है कि जांच पूरी होने तक ट्रस्ट के बड़े फैसले अदालत की निगरानी वाली समिति की मंजूरी के बिना न लिए जाएं।
- 2020-21 में उठे एक पुराने जमीन विवाद पर बनी राधेश्याम मिश्रा समिति की रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं हुई है — आलोचक इसे पुरानी जांचों में देरी और पारदर्शिता की कमी के उदाहरण के तौर पर पेश कर रहे हैं।
दूसरी तरफ, भाजपा और मंदिर ट्रस्ट ने इन सभी आरोपों को राजनीतिक साजिश करार दिया है और कहा है कि मंदिर निर्माण पूरी तरह पारदर्शी तरीके से चल रहा है और जांच एजेंसियां अपना काम कर रही हैं।
अभी क्या स्पष्ट नहीं है
- क्या जांच में ट्रस्ट के किसी वरिष्ठ पदाधिकारी के खिलाफ भी आपराधिक भूमिका सामने आएगी, या मामला अभी तक पकड़े गए निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रहेगा — यह SIT की आगामी रिपोर्ट (जिसकी डेडलाइन 15 जुलाई तक बताई जा रही है) से साफ होगा।
- केंद्र सरकार या इंटेलिजेंस ब्यूरो के पास पहले से कोई विशिष्ट रिपोर्ट थी या नहीं, और अगर थी तो उस पर क्या कार्रवाई हुई — इसकी कोई स्वतंत्र, सार्वजनिक रूप से पुष्ट जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है। यह फिलहाल विपक्ष का आरोप है, सरकारी दस्तावेज से पुष्ट तथ्य नहीं।
- जमीन खरीद में शामिल बिचौलियों और उनके पीछे किन प्रभावशाली लोगों का हाथ है, इसकी अलग से जांच जारी है और अभी कोई नाम आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आया है।
राम मंदिर से जुड़ा यह प्रकरण आस्था और प्रशासनिक जवाबदेही, दोनों को छूता है — इसीलिए यह जितना संवेदनशील है, उतना ही राजनीतिक रूप से भी गरम है। अब तक की जांच में चढ़ावा चोरी, असामान्य रूप से बढ़ी संपत्ति, और जमीन खरीद में सर्किल रेट से कई गुना ज्यादा भुगतान जैसी बातें ठोस तथ्यों के तौर पर सामने आई हैं, और आठ लोगों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। लेकिन बड़े अधिकारियों के बचाव, केंद्र सरकार की चुप्पी, या किसी खास तबके पर कार्रवाई से बचने जैसे आरोप अभी विपक्षी दलों और आलोचकों के दावे हैं, जिनकी पुष्टि किसी जांच रिपोर्ट या अदालत से नहीं हुई है। SIT की अगली रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका पर होने वाली सुनवाई ही यह तय करेगी कि जांच वाकई हर स्तर तक जाती है या नहीं।
