इंस्टाग्राम-यूट्यूब: पिछले कुछ वर्षों में इंस्टाग्राम और यूट्यूब भारत के करोड़ों लोगों, खासकर बच्चों और किशोरों की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन इन्हीं प्लेटफॉर्म्स पर परोसा जा रहा कंटेंट अब गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। अश्लीलता से भरे रील्स, गाली-गलौज से सजी भाषा, अपराध और “भौकाल” को ग्लैमराइज़ करने वाले वीडियो, और रोस्ट कॉमेडी के नाम पर परोसी जा रही फूहड़ता — यह सब मिलकर एक ऐसा डिजिटल माहौल बना रहा है जिसमें बच्चों और युवाओं का मानसिक विकास खतरे में पड़ सकता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह सब सिर्फ चोरी-छिपे नहीं, बल्कि खुलेआम, मिलियन-बिलियन व्यूज के साथ हो रहा है। सवाल यही उठता है — जिस समाज की जड़ें सांस्कृतिक मूल्यों और मर्यादा में मानी जाती हैं, वहां ऐसा कंटेंट बनाने वाले इतनी बड़ी संख्या में दर्शक कैसे जुटा लेते हैं, और एल्गोरिद्म उन्हें बढ़ावा क्यों देता रहता है?
BBC की रिपोर्ट ने खोली पोल
हाल ही में सामने आई एक BBC Eye investigation ने इस मसले की गंभीरता को उजागर कर दिया। जांच में पाया गया कि इंस्टाग्राम भारत में भुगतान वाले विज्ञापन दिखा रहा था जो बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को बढ़ावा दे रहे थे। BBC ने यह जांच तब शुरू की जब उसने देखा कि इंस्टाग्राम उन यूजर्स को भी यौन रूप से आपत्तिजनक कंटेंट सुझा रहा था, जिन्होंने ऐसी किसी सामग्री की खोज तक नहीं की थी। एक हफ्ते के भीतर ही परीक्षण खाते पर आपत्तिजनक विज्ञापन आने लगे, और कुछ दिनों बाद ऐसे विज्ञापन भी दिखने लगे जो बच्चों से जुड़ी असुरक्षित सामग्री की ओर इशारा करते थे, जो टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म की ओर मोड़ रहे थे।
सबसे परेशान करने वाली बात यह रही कि यह सब इंस्टाग्राम के स्वचालित विज्ञापन-मंजूरी सिस्टम से होकर गुजरा, जिसका काम ही ऐसी सामग्री को छानना है। यानी कंपनी की अपनी सुरक्षा-व्यवस्था भी नाकाम साबित हुई। इस रिपोर्ट के सामने आने के तुरंत बाद केंद्र सरकार हरकत में आई और उसने मेटा को नोटिस भेजकर सात दिन के भीतर जवाब मांगा, साथ ही तुरंत ऐसे विज्ञापनों और कंटेंट को हटाने का निर्देश दिया।
यह घटना अकेली नहीं है, बल्कि उस बड़े सिस्टम की एक झलक भर है जिसमें प्लेटफॉर्म्स मुनाफे के लिए कंटेंट मॉडरेशन में लगातार ढिलाई बरतते नजर आते हैं।
रोस्ट कॉमेडी और “भौकाल” कल्चर
BBC की रिपोर्ट सिर्फ विज्ञापनों तक सीमित मसला नहीं दिखाती, बल्कि यह उस बड़ी प्रवृत्ति की तरफ इशारा करती है जो भारतीय सोशल मीडिया पर पहले से मौजूद है। रोस्ट कॉमेडी के नाम पर गालियों और अश्लील मजाक को “कूल” बताकर पेश किया जा रहा है। अपराध और गैंगस्टर लाइफस्टाइल को “भौकाल” और “स्वैग” कहकर ग्लोरिफाई करने वाले वीडियो युवाओं में हीरो जैसी छवि बना रहे हैं। इस तरह का कंटेंट बनाने वाले कई क्रिएटर्स को करोड़ों व्यूज और सब्सक्राइबर मिलते हैं, जो यह दिखाता है कि एल्गोरिद्म और दर्शक दोनों ही इस तरह के कंटेंट को बढ़ावा दे रहे हैं।
यहीं पर समाज को खुद से भी सवाल पूछने की जरूरत है — जब ऐसा कंटेंट बनाने वालों को इतनी लोकप्रियता, पैसा और पहचान मिलती है, तो यह सिर्फ प्लेटफॉर्म की नाकामी नहीं, बल्कि दर्शकों की पसंद का भी नतीजा है। कमाई का यह मॉडल जब तक चलता रहेगा, तब तक ऐसे क्रिएटर्स की संख्या भी बढ़ती रहेगी।
बच्चों और समाज पर असर
बाल मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाविदों का लंबे समय से कहना रहा है कि किशोरावस्था में लगातार हिंसक, अश्लील या अपराध-महिमामंडन करने वाला कंटेंट देखने से व्यवहार पर असर पड़ सकता है। इससे कई तरह के खतरे जुड़े हैं:
- स्कूली उम्र के बच्चों तक आसानी से पहुंचने वाला अश्लील और आपत्तिजनक कंटेंट उनकी मानसिक और भावनात्मक परिपक्वता को समय से पहले प्रभावित कर सकता है।
- अपराध और “भौकाल” को हीरोइज़्म की तरह दिखाने वाला कंटेंट किशोरों में हिंसा और गैरकानूनी गतिविधियों के प्रति आकर्षण बढ़ा सकता है।
- गाली-गलौज और असम्मानजनक भाषा को सामान्य बनाकर दिखाने से आपसी बातचीत और रिश्तों में मर्यादा कमजोर पड़ती जा रही है।
- लगातार ऐसा कंटेंट देखने से बच्चों और युवाओं में चिड़चिड़ापन, आक्रामकता और असंतुलित व्यवहार बढ़ने की आशंका जताई जाती रही है।
इन खतरों को हल्के में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि आज की पीढ़ी की सोच और व्यवहार का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं प्लेटफॉर्म्स पर बीतने वाले समय से गढ़ा जा रहा है।
सरकार और प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी
भारत में IT नियम, 2021 (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को आपत्तिजनक कंटेंट पर कार्रवाई करने के लिए बाध्य किया गया है, और सरकार समय-समय पर नोटिस और निर्देश जारी करती रही है — जैसा हालिया मेटा नोटिस में देखा गया। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह कार्रवाई अक्सर किसी बड़े विवाद या मीडिया रिपोर्ट के सामने आने के बाद ही होती है, न कि लगातार और सक्रिय निगरानी के तहत।
सवाल यह भी है कि क्या मौजूदा कानून और नियामक ढांचा इतना पर्याप्त है कि वह करोड़ों घंटे रोज अपलोड होने वाले कंटेंट पर पहले से नजर रख सके, या फिर हर बार सिर्फ रिपोर्ट या विवाद सामने आने के बाद ही प्रतिक्रिया दी जाएगी। जब तक कंटेंट मॉडरेशन सिर्फ “प्रतिक्रियात्मक” (reactive) बना रहेगा और सक्रिय (proactive) निगरानी की व्यवस्था मजबूत नहीं होगी, तब तक इस तरह की घटनाएं बार-बार सामने आती रहेंगी।
अन्य देशों की स्थिति :
ऑस्ट्रेलिया — दुनिया का पहला पूर्ण प्रतिबंध
ऑस्ट्रेलिया ने नवंबर 2024 में कानून पास किया जिसके तहत Facebook, Snapchat, TikTok और X जैसी कंपनियों को 16 साल से कम उम्र के बच्चों को अकाउंट रखने से रोकने के लिए “reasonable steps” लेने होंगे, और बाद में YouTube को भी इसमें शामिल किया गया। नियम न मानने पर 5 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का जुर्माना लगाया जा सकता है, और यह 10 दिसंबर 2025 से लागू हो गया। हालांकि लागू होने के बाद भी एक स्टडी में पाया गया कि 85% किशोर तीन महीने बाद भी सोशल मीडिया एक्सेस कर पा रहे थे, क्योंकि कई प्लेटफॉर्म सिर्फ सेल्फ-डिक्लेयर्ड उम्र या सेल्फी-आधारित वेरिफिकेशन पर निर्भर थे, जिसके बाद ऑस्ट्रेलिया ने जुर्माने की राशि दोगुनी करने का फैसला किया।
ब्रिटेन (UK)
ब्रिटेन ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन का ऐलान किया, प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा कि हजारों माता-पिता ने बताया कि उनके बच्चे स्क्रॉलिंग के चक्र में फंस चुके हैं। यह नियम Snapchat, TikTok, YouTube, Instagram, Facebook और X जैसे यूजर-टू-यूजर प्लेटफॉर्म पर लागू होगा।
यूरोप
फ्रांस: फ्रांस की नेशनल असेंबली ने जनवरी 2026 में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन के प्रस्ताव को 130-21 वोट से पास किया, अब यह सीनेट में लंबित है।
इटली: 15 साल से कम उम्र के बच्चों पर प्रतिबंध का बिल संसद में है, जिसमें डिजिटल आइडेंटिटी वॉलेट के जरिए उम्र सत्यापन होगा।
जर्मनी: CDU और SPD दोनों प्रमुख पार्टियां प्रतिबंध का समर्थन कर रही हैं — CDU 16 साल से कम के लिए बैन चाहती है, SPD 14 साल से कम के लिए, बाकी को “यूथ वर्जन” देने की बात कर रही है।
डेनमार्क: 15 साल से कम उम्र के लिए सख्त प्रतिबंध पर विचार, साथ ही 2.47 करोड़ डॉलर का बजट डिजिटल सुरक्षा पहलों के लिए।
स्पेन: प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ ने 16 साल से कम उम्र के लिए बैन का ऐलान किया और प्लेटफॉर्म एग्ज़ीक्यूटिव्स को हेट स्पीच के लिए जवाबदेह बनाने का कानून भी बनाने की बात कही।
EU स्तर पर: यह मामला सदस्य देशों पर छोड़ा गया है, लेकिन यूरोपियन कमीशन DSA (Digital Services Act) के जरिए प्लेटफॉर्म्स पर नकेल कस रहा है और उम्र-सत्यापन ऐप को स्पेन, फ्रांस, ग्रीस, डेनमार्क और इटली में ट्रायल कर रहा है।
एशिया
इंडोनेशिया: 28 मार्च 2026 को 16 साल से कम उम्र के लिए सोशल मीडिया बैन लागू किया, यह ऐसा करने वाला पहला गैर-पश्चिमी, एशियाई और मुस्लिम देश बना।
मलेशिया: 1 जून से प्लेटफॉर्म्स के लिए प्रभावी उम्र-सत्यापन उपाय अनिवार्य किए, ताकि 16 साल से कम उम्र के बच्चे रजिस्टर न कर सकें, उल्लंघन पर 1 करोड़ रिंगिट तक जुर्माना।
चीन: 2023 से “माइनर मोड” लागू है जो 18 साल से कम उम्र वालों के लिए रात 10 से सुबह 6 बजे तक इंटरनेट बंद कर देता है, और उम्र के अनुसार रोज़ाना 40 मिनट से 2 घंटे तक ही समय-सीमा तय है।
जापान: जून 2026 में एक सलाहकार पैनल ने सख्त उम्र-सत्यापन का सुझाव दिया, लेकिन ऑस्ट्रेलिया जैसा एकीकृत कानून बनाने को “अवांछनीय” बताकर खारिज किया।
तुर्की: तुर्की ने 15 साल से कम उम्र के लिए प्रतिबंध का कानून पास किया।
UAE: 18 जून को पास हुए प्रस्ताव में सोशल मीडिया की न्यूनतम उम्र 15 साल तय की गई; 15 साल से कम उम्र के बच्चे न अकाउंट बना सकते हैं, न पोस्ट/कमेंट कर सकते हैं, और 15-16 साल वालों के लिए पेरेंटल सुपरविजन जरूरी होगा, यह पहला अरब देश है जिसने ऐसा कानून बनाया।
अमेरिका
COPPA कानून के तहत कंपनियां 13 साल से कम उम्र के बच्चों का डेटा माता-पिता की सहमति के बिना नहीं जुटा सकतीं। इसके अलावा वर्जीनिया राज्य में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए बिना माता-पिता की सहमति के रोज़ाना सिर्फ एक घंटे सोशल मीडिया इस्तेमाल की सीमा है, हालांकि यह कानून अदालत में चुनौती के दायरे में है। कई अन्य राज्यों के कानून भी फ्री-स्पीच आधार पर कोर्ट में अटके हुए हैं।
दूसरा पक्ष भी समझना जरूरी:
इस पूरी बहस का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। कई विशेषज्ञ और कंटेंट क्रिएटर्स यह तर्क भी देते हैं कि:
- रचनात्मकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हर विवादास्पद या बोल्ड कंटेंट को “अश्लील” या “समाज के लिए खतरा” करार देना सेंसरशिप की तरफ ले जा सकता है।
- रोस्ट कॉमेडी, सटायर और डार्क ह्यूमर जैसी विधाएं दुनियाभर में मौजूद हैं, और हर पीढ़ी को पिछली पीढ़ी का मनोरंजन “अश्लील” लगता रहा है।
- असली जिम्मेदारी परिवार और पालन-पोषण की भी है — पेरेंटल कंट्रोल, उम्र-आधारित कंटेंट फिल्टरिंग और डिजिटल साक्षरता जैसे उपाय भी उतने ही जरूरी हैं जितनी सरकारी सख्ती।
फिर भी, जब मामला सीधे बच्चों की सुरक्षा और यौन शोषण से जुड़ी सामग्री का हो — जैसा BBC की जांच में सामने आया — तो वहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दलील टिकती नहीं, और उस पर सख्त, तेज और पारदर्शी कार्रवाई की मांग जायज़ है।
निष्कर्ष
इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स आज के भारत में सूचना, मनोरंजन और कमाई का बड़ा जरिया बन चुके हैं, लेकिन इनकी अनियंत्रित संरचना समाज और खासकर बच्चों के भविष्य के लिए एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है। BBC की हालिया रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया कि प्लेटफॉर्म्स की अपनी सुरक्षा-व्यवस्था भी भरोसेमंद नहीं है। ऐसे में सरकार, प्लेटफॉर्म्स, और अभिभावक — तीनों को मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाना होगा जो सिर्फ विवाद के बाद प्रतिक्रिया देने की बजाय, लगातार और सक्रिय निगरानी पर आधारित हो। तभी डिजिटल दुनिया की आज़ादी और बच्चों की सुरक्षा — दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सकेगा।
