आधार कार्ड: असम सरकार ने राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठ को रोकने के उद्देश्य से एक ऐतिहासिक और कड़ा निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने घोषणा की है कि अब राज्य में 18 साल से अधिक उम्र के लोगों का आधार कार्ड नहीं बनाया जाएगा। यह फैसला असम कैबिनेट की बैठक के बाद सामने आया, जिसे राज्य की सुरक्षा के लिहाज़ से एक बेहद अहम कदम माना जा रहा है।
क्या है पूरा फैसला?
इस फैसले के मुताबिक, अब से राज्य में 18 साल से ज्यादा उम्र के किसी भी नागरिक को नया आधार कार्ड जारी नहीं किया जाएगा। हालांकि, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और चाय बागान समुदायों के सदस्यों को आधार कार्ड के लिए आवेदन करने और प्राप्त करने के लिए एक साल का अतिरिक्त समय मिलेगा। इन वर्गों के कई लोगों को अभी तक आधार कार्ड नहीं मिले हैं, इसलिए उन्हें यह छूट दी गई है
मुख्यमंत्री सरमा ने बताया कि यह नियम 1 अक्टूबर से लागू होगा और इस समय-सीमा के बाद आधार कार्ड केवल “दुर्लभतम मामलों” में ही 18 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को जारी किए जाएंगे।
अगर कोई अभी तक वंचित रहा तो?
यदि कोई व्यक्ति अभी भी आधार कार्ड जारी करने से वंचित रह गया है, तो उसे जिला आयुक्त को आवेदन करना होगा और जिला आयुक्त उचित पात्रता पर विचार करने के बाद इस संबंध में कार्रवाई कर सकते हैं। जिला आयुक्त तभी आधार कार्ड की अनुमति देंगे जब स्पेशल ब्रांच और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल की रिपोर्ट यह स्पष्ट कर दे कि संबंधित व्यक्ति असम या भारत का नागरिक है।
यह फैसला क्यों लिया गया?
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि यह कदम पिछले एक साल में बांग्लादेश से बढ़ती घुसपैठ से जुड़ी चिंताओं को दूर करने के लिए उठाया गया है। असम लंबे समय से घुसपैठ की समस्या से जूझ रहा है, खासकर बांग्लादेशी नागरिकों की घुसपैठ से।
हिमंता ने इससे पहले बताया था कि असम में लगभग 29 लाख बीघा जमीन पर बांग्लादेशी घुसपैठियों और संदिग्ध नागरिकों का कब्जा है। सरकार की आशंका है कि आधार कार्ड का दुरुपयोग कर अवैध प्रवासी भारतीय नागरिकता का दावा कर सकते हैं, और इसी खतरे को देखते हुए यह कठोर नीति अपनाई गई है।
UIDAI के नियमों से कितना अलग है यह फैसला?
भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) के नियमों के अनुसार, आधार नामांकन के लिए कोई उम्र सीमा निर्धारित नहीं है। ऐसे में असम सरकार का यह फैसला केंद्र की नीति से अलग दिशा में जाता है। यह कदम संवैधानिक और प्रशासनिक दृष्टि से बहस का विषय बन सकता है।
यह फैसला असम की राजनीति में एक बड़ा मोड़ है। एक तरफ जहां सरकार इसे सुरक्षा और राष्ट्रीय हित का कदम बता रही है, वहीं विपक्ष और नागरिक अधिकार संगठन इसे आम नागरिकों के अधिकारों पर प्रहार बता सकते हैं। क्या यह नीति वाकई घुसपैठ रोक पाएगी या असली नागरिक ही इससे परेशान होंगे — यह आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा।
