Spinal Muscular Atrophy Treatment(SMA) एक गंभीर आनुवंशिक बीमारी है, जो मुख्य रूप से शरीर की मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाली तंत्रिका कोशिकाओं को प्रभावित करती है। यह बीमारी विशेष रूप से बच्चों में गंभीर रूप ले सकती है और समय के साथ मांसपेशियों में कमजोरी, शारीरिक विकास में बाधा तथा गंभीर मामलों में सांस लेने और निगलने जैसी समस्याओं का कारण बन सकती है।
हाल के वर्षों में SMA के उपचार के क्षेत्र में बड़ी प्रगति हुई है। हालांकि, आधुनिक जीन-आधारित उपचारों की अत्यधिक कीमत लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रही है। ऐसे में भारत में विकसित कम लागत वाली दवा की उपलब्धता SMA से प्रभावित बच्चों और उनके परिवारों के लिए महत्वपूर्ण राहत का आधार बन सकती है।
₹18 करोड़ के इलाज से ₹3.5 लाख तक की उम्मीद
SMA के उपचार में विदेशी जीन थेरेपी की कीमत लगभग ₹18 करोड़ तक पहुंच सकती है। इसके अलावा, कुछ अन्य उपचारों की लागत भी परिवारों के लिए बेहद अधिक होती है।
समाचार रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बनी रिसडिप्लाम (Risdiplam) आधारित दवा की कीमत लगभग ₹3.5 लाख सालाना तक है। इस प्रकार विदेशी दवा की तुलना में उपचार की लागत में लगभग 50 गुना तक कमी आ सकती है।
यह अंतर केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि भारत जैसे देश में उपचार की पहुंच के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है। अत्यधिक महंगे उपचार के कारण जिन परिवारों के लिए SMA का इलाज लगभग असंभव था, उनके लिए कम लागत वाली दवा उपचार की संभावनाओं को व्यापक बना सकती है।
SMA क्या है?
Spinal Muscular Atrophy (SMA) एक आनुवंशिक न्यूरोमस्कुलर बीमारी है। इसमें रीढ़ की हड्डी में स्थित मोटर न्यूरॉन कोशिकाएं प्रभावित होती हैं। यही कोशिकाएं मस्तिष्क से मांसपेशियों तक संकेत पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
जब ये कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होती हैं, तो मांसपेशियों को पर्याप्त तंत्रिका संकेत नहीं मिल पाते। परिणामस्वरूप:
- मांसपेशियों में कमजोरी आती है।
- मांसपेशियों का आकार और शक्ति कम हो सकती है।
- बैठने, खड़े होने और चलने जैसी गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।
- गंभीर मामलों में सांस लेने और निगलने में कठिनाई हो सकती है।
समाचार में इसे ‘मोटर न्यूरॉन’ कोशिकाओं के नष्ट होने से जुड़ी बीमारी बताया गया है।
बीमारी का आनुवंशिक आधार
SMA का संबंध मुख्य रूप से SMN1 जीन में होने वाले आनुवंशिक परिवर्तन से है। यह जीन शरीर में Survival Motor Neuron (SMN) प्रोटीन के निर्माण के लिए आवश्यक है।
SMN प्रोटीन की कमी से मोटर न्यूरॉन कोशिकाएं प्रभावित होती हैं और धीरे-धीरे मांसपेशियों की कार्यक्षमता कम होने लगती है।
SMA की गंभीरता अलग-अलग हो सकती है। कुछ बच्चों में बीमारी बहुत कम उम्र में गंभीर रूप लेती है, जबकि कुछ मामलों में लक्षण अपेक्षाकृत बाद में दिखाई देते हैं।
बच्चों में बीमारी का प्रभाव
SMA का सबसे गंभीर प्रभाव छोटे बच्चों में देखा जा सकता है। गंभीर मामलों में बच्चे को:
- सिर संभालने,
- बैठने,
- खड़े होने,
- चलने,
- निगलने तथा
- सांस लेने
में कठिनाई हो सकती है।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि कुछ बच्चों की मानसिक क्षमता सामान्य रहती है। इसका अर्थ है कि शारीरिक अक्षमता और मानसिक विकास के बीच हमेशा सीधा संबंध नहीं होता।
बीमारी कितनी दुर्लभ है?
रिपोर्ट के अनुसार, लगभग हर 10,000 जीवित जन्मों में एक बच्चा इससे प्रभावित हो सकता है और यह बीमारी आबादी के लगभग 2% हिस्से में कैरियर (वाहक) के रूप में मौजूद हो सकती है।
कैरियर वह व्यक्ति होता है जिसके अंदर बीमारी से संबंधित आनुवंशिक परिवर्तन मौजूद हो सकता है, लेकिन उसमें बीमारी के स्पष्ट लक्षण आवश्यक रूप से दिखाई नहीं देते।
यदि माता-पिता दोनों संबंधित जीन परिवर्तन के वाहक हों, तो बच्चे में SMA विकसित होने का जोखिम बढ़ सकता है।
उपचार में जीन थेरेपी की भूमिका
SMA के उपचार में सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक प्रगतियों में से एक जीन थेरेपी है। इसका उद्देश्य बीमारी के मूल आनुवंशिक कारण को लक्षित करना है।
लेकिन जीन थेरेपी की सबसे बड़ी चुनौती इसकी अत्यधिक लागत है। रिपोर्ट में विदेशी जीन थेरेपी की कीमत लगभग ₹18 करोड़ तक बताई गई है।
इस प्रकार उपचार विज्ञान में प्रगति होने के बावजूद, उसकी आर्थिक पहुंच सीमित रही है।
यही कारण है कि भारत में अपेक्षाकृत कम लागत वाले उपचार का विकास महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
रिसडिप्लाम क्यों महत्वपूर्ण है?
रिपोर्ट में भारत में निर्मित ओरल रिसडिप्लाम आधारित दवा की कीमत लगभग ₹3.5 लाख सालाना बताई गई है।
यह उपचार जीन थेरेपी से अलग है। इसे मुंह के माध्यम से दिया जा सकता है और इसका उद्देश्य शरीर में SMN प्रोटीन के उत्पादन को बढ़ाने में सहायता करना है।
इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि उपचार की लागत में भारी अंतर होने के कारण अधिक परिवार लंबे समय तक उपचार का खर्च वहन करने की स्थिति में आ सकते हैं।
सरकारी संस्थानों और वैज्ञानिक टीम की भूमिका
रिपोर्ट के अनुसार, PGI के निदेशक पद्मश्री डॉ. राधाकृष्ण धीमान ने दवा वितरण के दौरान मेडिकल जेनेटिक्स विभाग की टीम को बधाई दी।
विभागाध्यक्ष डॉ. कौशिक मंडल के नेतृत्व में टीम में डॉ. दीपिका सक्सेना, डॉ. अमिताभ एम., डॉ. हसीना एस. सेन, डॉ. अंकित भट्टाचार्य तथा अन्य विशेषज्ञ शामिल रहे।
दवा की खरीद में संयुक्त निदेशक सामग्री प्रबंधन प्रकाश सिंह और गंगा विष्णु की भूमिका भी बताई गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, संस्थान में 100 से अधिक SMA पीड़ित बच्चे पंजीकृत हैं, जिनमें से 50 से अधिक बच्चे उपचार का इंतजार कर रहे हैं।
यह आंकड़ा बताता है कि सस्ती दवा की उपलब्धता केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि वास्तविक उपचार आवश्यकता को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।
पहली खेप में 15 बच्चों को मुफ्त दवा
रिपोर्ट में बताया गया है कि नेटको फार्मा की इस दवा की पहली खेप में 15 बच्चों को मुफ्त दवा दी गई।
यह पहल उन परिवारों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो नियमित उपचार का खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं।
यदि कम कीमत वाली दवा की नियमित और पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित होती है, तो प्रतीक्षा सूची में शामिल बच्चों सहित अधिक SMA मरीजों तक उपचार पहुंचाया जा सकता है।
महंगे इलाज से सस्ती दवा तक: क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
SMA के मामले में उपचार की लागत लंबे समय से एक बड़ी बाधा रही है। एक तरफ ₹18 करोड़ तक की जीन थेरेपी है, वहीं दूसरी तरफ लगभग ₹3.5 लाख वार्षिक लागत वाली दवा उपचार को अपेक्षाकृत अधिक सुलभ बना सकती है।
इस बदलाव के तीन प्रमुख आयाम हैं:
1. उपचार की पहुंच बढ़ना
कम लागत का अर्थ है कि अधिक परिवार उपचार पर विचार कर सकते हैं।
2. स्वास्थ्य समानता
दुर्लभ बीमारियों में अक्सर आर्थिक स्थिति उपचार प्राप्त करने की क्षमता तय करती है। कम लागत वाली दवा इस असमानता को कम कर सकती है।
3. भारतीय फार्मास्युटिकल क्षमता
भारत में कम लागत वाली दवाओं का निर्माण देश की किफायती स्वास्थ्य सेवा और जेनेरिक/बायोफार्मास्युटिकल क्षमता को मजबूत करता है।
अभी भी कई चुनौतियां
सस्ती दवा उपलब्ध होना महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन SMA से निपटने के लिए केवल दवा पर्याप्त नहीं है। इसके साथ कई अन्य चुनौतियों पर भी ध्यान देना होगा:
- SMA की समय पर पहचान और निदान
- आनुवंशिक परीक्षण की उपलब्धता
- नवजात/शिशु स्तर पर शीघ्र पहचान
- विशेषज्ञ न्यूरोलॉजी और जेनेटिक्स सेवाएं
- नियमित फिजियोथेरेपी और पुनर्वास
- श्वसन एवं पोषण संबंधी देखभाल
- दवा की नियमित उपलब्धता
- गरीब परिवारों के लिए वित्तीय सहायता
- दुर्लभ रोगों के लिए मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति
स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी जैसी दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी के क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती केवल प्रभावी उपचार विकसित करना नहीं है, बल्कि उसे सभी जरूरतमंद मरीजों तक किफायती कीमत पर पहुंचाना भी है।
₹18 करोड़ तक की विदेशी जीन थेरेपी की तुलना में लगभग ₹3.5 लाख वार्षिक लागत वाली रिसडिप्लाम आधारित दवा की उपलब्धता इस दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देती है। PGI में पंजीकृत 100 से अधिक SMA बच्चों और उपचार की प्रतीक्षा कर रहे 50 से अधिक बच्चों का उल्लेख इस जरूरत की गंभीरता को सामने लाता है।
