उन्नाव में एनजीओ संचालक धीरेंद्र प्रताप सिंह की हत्या की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, मामले की परतें खुलती जा रही हैं। पुलिस के मुताबिक, धीरेंद्र की हत्या महज आपसी विवाद का नतीजा नहीं थी, बल्कि इसके पीछे संपत्ति और पैसों से जुड़ी एक सुनियोजित साजिश थी। आरोप है कि मकान-दुकान और करीब 12 लाख रुपये के लालच में हत्या की सुपारी दी गई।
पुलिस की जांच में सामने आया है कि धीरेंद्र प्रताप सिंह को रास्ते से हटाने के लिए शूटरों से संपर्क किया गया था। इसके बाद उनकी गतिविधियों पर नजर रखी गई और मौका देखकर वारदात को अंजाम दिया गया। पुलिस अब इस बात की पड़ताल कर रही है कि हत्या की साजिश कब और कैसे तैयार हुई तथा इसमें कौन-कौन लोग सीधे तौर पर शामिल थे।
बताया गया कि धीरेंद्र लंबे समय से वाहन चालक के रूप में काम कर रहे रवि के संपर्क में थे और उस पर काफी भरोसा करते थे। यही भरोसा कथित तौर पर साजिशकर्ताओं के लिए सबसे बड़ा हथियार बना। पुलिस के अनुसार, वारदात से पहले रवि ने धीरेंद्र को फोन कर मिलने के लिए बुलाया। इसके बाद वह उन्हें कार से लेकर निकला। रास्ते में लोकेशन साझा की गई और धीरेंद्र को सुनसान जगह पर ले जाया गया।
पुलिस का दावा है कि हत्या के बाद शव को दुर्गमा क्षेत्र में फेंक दिया गया। घटना की जानकारी मिलने पर पुलिस ने जांच शुरू की और संदिग्धों से पूछताछ के साथ मोबाइल फोन की गतिविधियों तथा अन्य साक्ष्यों को खंगाला। जांच के दौरान पुलिस को ऐसे सुराग मिले, जिनसे कथित साजिश की कड़ियां जुड़ती चली गईं।
मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी सामने आया कि हत्या के बाद आरोपियों ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की। पूछताछ में विरोधाभासी बातें सामने आने के बाद पुलिस का संदेह गहराया। इसके बाद मोबाइल लोकेशन, कॉल डिटेल और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाया गया।
पुलिस के मुताबिक, वारदात के बाद शव को फेंकने के साथ ही आरोपियों ने सबूत मिटाने की कोशिश भी की। हालांकि, पुलिस की तकनीकी जांच और पूछताछ के दौरान सामने आए तथ्यों ने कथित तौर पर पूरी कहानी को जोड़ने में मदद की। पुलिस ने इस मामले में कई लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की है और कुछ आरोपियों से जुड़े साक्ष्य भी जुटाए हैं।
जांच में यह भी सामने आया कि धीरेंद्र सामाजिक गतिविधियों से जुड़े हुए थे और कई लोगों के संपर्क में रहते थे। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि संपत्ति को लेकर विवाद की शुरुआत कहां से हुई और हत्या की सुपारी देने के पीछे वास्तविक लाभार्थी कौन था। मकान-दुकान और 12 लाख रुपये का लालच हत्या की साजिश का मुख्य कारण था या इसके पीछे कोई और वजह भी थी, यह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि भरोसे के रिश्तों का इस्तेमाल किस तरह गंभीर अपराध की साजिश में किया जा सकता है। जिस व्यक्ति पर पीड़ित भरोसा करता था, वही यदि उसे सुनसान जगह तक पहुंचाने की साजिश का हिस्सा बन जाए तो अपराध की जांच और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है।
फिलहाल पुलिस की प्राथमिकता हत्या में शामिल सभी आरोपियों की भूमिका स्पष्ट करना, कथित सुपारी की रकम और संपत्ति से जुड़े लेन-देन की जांच करना तथा वारदात के पीछे पूरी साजिश का पर्दाफाश करना है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि तकनीकी साक्ष्यों और पूछताछ के आधार पर जांच आगे बढ़ाई जा रही है। अंतिम तस्वीर जांच पूरी होने और अदालत में साक्ष्य सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
