उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा नागरिकों को अवैध रूप से हिरासत में रखने के एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। देवरिया जिले के गौरी बाजार थाने में चार लोगों को कथित तौर पर बिना किसी वैध आधार के हिरासत में रखे जाने के मामले में अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी जताई है और थाना प्रभारी (SHO) को अपनी सैलरी से मुआवजा भरने का आदेश दिया है।
क्या था मामला?
मामले में याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि उन्हें गौरी बाजार थाने में बिना किसी उचित कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में रखा गया। सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने संबंधित समय की सीसीटीवी फुटेज मांगी, तो पुलिस की ओर से बताया गया कि थाने का कैमरा खराब होने के कारण फुटेज उपलब्ध नहीं है। इस जवाब से असंतुष्ट अदालत ने देवरिया के पुलिस अधीक्षक (SP) संकल्प शर्मा और संबंधित थाना प्रभारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होने का निर्देश दिया, जिसके बाद दोनों अधिकारी सुनवाई के दौरान अदालत में उपस्थित रहे।
हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान जब एसपी ने सीसीटीवी खराब होने की जानकारी न होने की बात कहते हुए अदालत से बिना शर्त माफी मांगी, तो हाई कोर्ट ने इसे भी गंभीरता से लिया। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा, “माफी अदालत से नहीं, बल्कि उस जनता से मांगिए जिसे सुरक्षा देने के बजाय परेशान किया जा रहा है।”
इसके अलावा अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि रिकॉर्ड में हेरफेर और गंभीर लापरवाही बरतने वाले थाना प्रभारी के खिलाफ अब तक निलंबन या अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जरूरी रिकॉर्ड उपलब्ध न कराना और सामान्य डायरी (जीडी) में महत्वपूर्ण घटनाओं की एंट्री न करना एक गंभीर मामला है, और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर सख्त टिप्पणी
अवैध हिरासत से जुड़े एक अन्य मामले में भी अदालत ने पहले साफ कहा था कि पुलिस अधिकारी ने याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकारों का लापरवाहीपूर्वक उल्लंघन किया। इससे स्पष्ट होता है कि अदालत नागरिकों की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों की रक्षा को लेकर बेहद संवेदनशील रुख अपना रही है, और पुलिस की मनमानी कार्यशैली पर सवाल उठाना अदालत की प्राथमिकता बन चुका है।
याचिकाकर्ताओं को मिलेगा मुआवजा, वसूली SHO के वेतन से
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि चारों याचिकाकर्ताओं को कुल 65,000 रुपये का मुआवजा दिया जाए। इसका विभाजन इस प्रकार किया गया है:
- याचिकाकर्ता संख्या 2, 3 और 4 — प्रत्येक को 20,000-20,000 रुपये
- याचिकाकर्ता संख्या 1 — 5,000 रुपये
सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह पूरी राशि सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि संबंधित थाना प्रभारी के वेतन से सीधे वसूलीजाएगी। इस तरह का आदेश यह सुनिश्चित करता है कि लापरवाही या मनमानी करने वाले अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से इसकी जिम्मेदारी उठानी पड़े, न कि जनता के टैक्स के पैसे से इसकी भरपाई हो।
थाने में सीसीटीवी को लेकर भी उठे सवाल
इस मामले ने एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा किया है कि जब सरकार थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के दावे करती है, तो ऐसे मामलों में कैमरों का ‘अचानक खराब’ हो जाना और महत्वपूर्ण अवधि की फुटेज का न मिलना गंभीर चिंता का विषय है। अदालत ने इस पहलू को भी अपनी टिप्पणियों में शामिल करते हुए पुलिस थानों में सीसीटीवी सिस्टम के रखरखाव और उसकी जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला न सिर्फ एक विशेष मामले में न्याय सुनिश्चित करता है, बल्कि यह पूरे पुलिस तंत्र के लिए एक स्पष्ट संदेश भी है — कि नागरिकों को अवैध रूप से हिरासत में रखना, रिकॉर्ड में हेरफेर करना, या सबूतों को नष्ट होने देना अब बिना परिणाम के नहीं चलेगा। अधिकारी के व्यक्तिगत वेतन से मुआवजा वसूलने का आदेश यह सुनिश्चित करता है कि जवाबदेही केवल कागजी नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप में भी लागू हो। यह फैसला आगे भी पुलिस प्रशासन को नागरिकों के मौलिक अधिकारों के प्रति अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
