पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का सीधा असर बुधवार को कच्चे तेल की कीमतों और भारतीय शेयर बाजार, दोनों पर दिखा। ब्रेंट क्रूड का वायदा भाव छह सप्ताह में पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया — मंगलवार को यह 97.89 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ था। पश्चिम एशिया में तेल संयंत्रों और टैंकरों पर हुए हमलों को इस उछाल की वजह बताया जा रहा है।
महंगे तेल और बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिम से भारतीय शेयर बाजार में लगातार तीसरे कारोबारी सत्र गिरावट रही:
- सेंसेक्स: 813.35 अंक लुढ़ककर करीब तीन महीने के निचले स्तर 74,764.23 अंक पर बंद।
- निफ्टी: 203.60 अंक की गिरावट के साथ 23,431.50 अंक पर बंद।
- रुपया: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 34 पैसे टूटकर 95.08 (अस्थायी) के स्तर पर — मंगलवार को भी इसमें 33 पैसे की गिरावट आई थी, यानी लगातार दूसरे दिन रुपया कमजोर हुआ।
तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर किन चार मोर्चों पर
1. महंगाई बढ़ने का खतरा: कच्चे तेल के दाम उछलने से पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन के दाम भी बढ़ सकते हैं, जिससे यात्रा की लागत बढ़ने के साथ-साथ अन्य वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है — यानी असर सिर्फ ईंधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) में महंगाई फैलने का खतरा बनता है।
2. रुपये पर दबाव: भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतें बढ़ने पर डॉलर की मांग बढ़ती है, जिसका सीधा असर रुपये की कमजोरी के रूप में दिखता है — बुधवार की 34 पैसे की गिरावट इसी दबाव का नतीजा है।
3. निवेशकों की चिंता बढ़ी: महंगा तेल कंपनियों की लागत बढ़ाता है और अर्थव्यवस्था पर दबाव डालने की आशंका पैदा करता है, इसलिए निवेशकों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है — यही वजह है कि बाजार में लगातार तीसरे दिन बिकवाली का दबाव बना रहा।
4. सरकार पर दबाव बढ़ेगा: कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से देश का डॉलर में होने वाला आयात खर्च बढ़ता है, जिससे व्यापार घाटा और रुपये पर दबाव, दोनों बढ़ सकते हैं — यानी यह असर सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं, बल्कि सरकार की राजकोषीय और व्यापार नीति के स्तर तक पहुंचता है।
किन कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है
महंगा कच्चा तेल सीधे तौर पर विमानन, पेंट, टायर, रसायन, लॉजिस्टिक और उपभोक्ता सामान जैसे तेल-निर्भर क्षेत्रों के मुनाफे पर दबाव डालता है, क्योंकि इन कंपनियों की उत्पादन लागत में कच्चे तेल या उसके उत्पादों की सीधी हिस्सेदारी होती है।
बाजार में किसे सबसे ज्यादा नुकसान
आईटी क्षेत्र सबसे ज्यादा टूटा: सेंसेक्स की कंपनियों में एचसीएल टेक्नोलॉजीज का शेयर साढ़े चार प्रतिशत नीचे बंद हुआ। सबसे अधिक नुकसान उठाने वाली अगली तीन कंपनियां भी आईटी सेक्टर से ही रहीं। इंफोसिस का शेयर भी साढ़े चार प्रतिशत के करीब टूटा।
भारी गिरावट वाले अन्य शेयर: हिंदुस्तान यूनीलिवर, बजाज फाइनेंस, अल्ट्रा टेक सीमेंट, भारती एयरटेल, बीईएल और रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयर एक से दो प्रतिशत के बीच फिसले। इसके अलावा आईटीसी, इंडिगो, एलएंडटी, कोटक महिंद्रा बैंक, सन फार्मा और एसबीआई भी लाल निशान पर बंद हुए।
आईटी क्षेत्र में सबसे तीखी गिरावट बताती है कि निवेशकों को कच्चे तेल के झटके से सीधे तेल-निर्भर उद्योगों से ज्यादा, वैश्विक मांग और डॉलर-रुपया दरों में उतार-चढ़ाव को लेकर व्यापक चिंता है, क्योंकि आईटी कंपनियों की आय काफी हद तक विदेशी मुद्रा और वैश्विक ग्राहकों के खर्च पर निर्भर करती है।
पेट्रोल-डीजल कंपनियों को सीधा नुकसान
कच्चे तेल की कीमत चढ़ने से सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों को पेट्रोल की बिक्री पर करीब पांच रुपये और डीजल पर 23 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, अगर खुदरा स्तर पर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बदलाव नहीं किया जाता, तो पेट्रोलियम विपणन कंपनियों को इनकी बिक्री पर यह नुकसान खुद उठाना पड़ता है। यानी यहां सरकार और तेल कंपनियों के सामने दोहरी चुनौती है — कीमतें न बढ़ाएं तो कंपनियों का घाटा बढ़ता है, बढ़ाएं तो आम उपभोक्ता पर महंगाई का सीधा बोझ पड़ता है।
यह झटका कितना बड़ा
तीन महीने के निचले स्तर पर सेंसेक्स, लगातार तीसरे दिन की गिरावट, रुपये में लगातार दूसरे दिन कमजोरी और पेट्रोलियम कंपनियों पर प्रति लीटर बढ़ता नुकसान — ये सभी संकेत बताते हैं कि पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनाव का असर अब सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं, बल्कि भारत की मुद्रा, शेयर बाजार और राजकोषीय गणित तक फैल चुका है। आगे की दिशा काफी हद तक इस पर निर्भर करेगी कि पश्चिम एशिया में तनाव कितने समय तक बना रहता है और तेल आपूर्ति पर असर कितना गहरा होता है — अगर स्थिति जल्द सामान्य नहीं होती, तो महंगाई और राजकोषीय दबाव, दोनों और बढ़ सकते हैं।
