दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ मिनरल्स) की आपूर्ति को लेकर भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय समझौते के आसार बन रहे हैं। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा के मद्देनजर इस समझौते की रूपरेखा को अंतिम रूप दिया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, पूर्व में हुई बातचीत में चीन ने भारत को दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति का भरोसा दिलाया था — ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान चीन के राष्ट्रपति के साथ हुई द्विपक्षीय वार्ता में इस समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं।
साथ ही, भारत सिर्फ चीन पर निर्भर रहने के बजाय कई अन्य देशों के साथ समझौते और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की रणनीति पर भी समानांतर रूप से काम कर रहा है — यानी सरकार की कोशिश आपूर्ति के एक ही स्रोत पर निर्भरता कम करने की भी दिखती है।
दुनिया की आपूर्ति पर चीन की पकड़ इतनी मजबूत क्यों है
दुनिया में दुर्लभ खनिजों की कुल उपलब्धता का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा अकेले चीन के पास है, जिनमें सैमरियम, डिस्प्रोसियम, टेरबियम, इट्रियम, गैडोलिनियम और ल्यूटेनियम जैसे तत्व शामिल हैं। इसी वजह से दुनिया के कई देश इनकी आपूर्ति के लिए चीन पर निर्भर हैं। दुर्लभ खनिजों की श्रेणी में कुल 17 तत्व आते हैं, जिनमें से सात तत्व चीन में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं — इनमें स्कैंडियम प्रमुख है।
चीन की इस लगभग एकाधिकार जैसी स्थिति को देखते हुए भारत के लिए चीन के साथ आपूर्ति समझौता अल्पकालिक रूप से रणनीतिक रूप से जरूरी माना जा रहा है, भले ही दीर्घकाल में भारत घरेलू उत्पादन और वैकल्पिक साझेदारों के जरिए इस निर्भरता को कम करना चाहता हो।
इन खनिजों का इस्तेमाल कहां-कहां होता है
दुर्लभ खनिजों का इस्तेमाल सेमीकंडक्टर उद्योग में चिप बनाने, पवन ऊर्जा टर्बाइन, उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी, बैटरियों, स्मार्टफोन और औद्योगिक धातुओं के निर्माण में किया जाता है। यह सूची खुद बताती है कि यह मसला सिर्फ खनन उद्योग तक सीमित नहीं — बल्कि रक्षा उत्पादन, स्वच्छ ऊर्जा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे भारत के रणनीतिक रूप से अहम क्षेत्रों की आपूर्ति श्रृंखला से सीधे जुड़ा है।
भारत की अपनी स्थिति: तीसरे स्थान पर, पर दोहन अभी सीमित
भारत में भी दुनिया के करीब छह प्रतिशत दुर्लभ खनिज होने का अनुमान है, जिसके चलते भारत इस मामले में तीसरे स्थान पर है। हालांकि अभी तक इनका पर्याप्त दोहन नहीं हो पाया है। इसी कमी को दूर करने के लिए कुछ समय पहले भारत ने नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन शुरू किया, जिसका मकसद ऐसे दुर्लभ खनिजों की खोज करना है।
सरकार के अनुसार, भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग ने आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, झारखंड, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में 7.23 मिलियन टन दुर्लभ खनिजों की मौजूदगी का पता लगाया है। तीसरे स्थान पर होने और साढ़े सात मिलियन टन के करीब भंडार मिलने के बावजूद अभी तक इस संसाधन का बड़े पैमाने पर व्यावसायिक दोहन शुरू नहीं हो पाया है — यानी भारत की असली चुनौती संसाधन की कमी नहीं, बल्कि उसे निकालने और प्रोसेस करने की क्षमता विकसित करना है।
12 सितंबर को भारत-चीन द्विपक्षीय वार्ता
सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच 12 सितंबर की शाम को द्विपक्षीय वार्ता होगी। इसी कड़ी में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ भी 11 सितंबर को द्विपक्षीय वार्ता प्रस्तावित है — यानी दो दिनों के भीतर भारत की दो बड़ी शक्तियों, रूस और चीन के साथ उच्चस्तरीय बातचीत होने जा रही है, जिसमें दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति एक साझा विषय के तौर पर उभर सकता है।
रूस भी सहयोग को तैयार
इस बीच, रूस की तरफ से कहा गया है कि वह भारत को दुर्लभ खनिजों की खोज में मदद करने के लिए तैयार है। रूस ने खुद स्वीकार किया है कि यह एक बेहद जटिल कार्य है, लेकिन रूसी कंपनियों के पास इस क्षेत्र में विशेषज्ञता है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने कहा कि रूस इस संबंध में भारत को सहयोग देने के लिए तैयार है। पुतिन की भारत यात्रा के दौरान द्विपक्षीय वार्ता में इस मुद्दे पर भी चर्चा होने की संभावना है।
रूस का यह प्रस्ताव भारत की उस व्यापक रणनीति में फिट बैठता है, जिसके तहत भारत दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति के लिए किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय चीन, रूस और घरेलू उत्पादन — तीनों मोर्चों पर एक साथ आगे बढ़ना चाहता है।
दुर्लभ खनिजों को लेकर भारत की स्थिति एक साथ तीन स्तरों पर आगे बढ़ती दिख रही है: अल्पकाल में चीन जैसी बड़ी आपूर्तिकर्ता ताकत के साथ भरोसेमंद आपूर्ति समझौता, मध्यम अवधि में रूस जैसे तकनीकी रूप से सक्षम साझेदार से खोज और दोहन में मदद, और दीर्घकाल में नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन के जरिए घरेलू भंडार (7.23 मिलियन टन) का खुद दोहन। 11 और 12 सितंबर को रूस और चीन, दोनों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ लगातार होने वाली द्विपक्षीय वार्ताएं इस रणनीति को ठोस रूप देने का महत्वपूर्ण मौका हो सकती हैं, हालांकि अंतिम समझौतों का ब्यौरा और उनकी शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं।
