भारत की मेज़बानी में 12-13 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वां ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ। यह सम्मेलन भू-राजनीतिक तनावों, व्यापार युद्ध और वैश्विक संघर्षों के बीच हुआ, जिसमें ग्यारह सदस्यीय समूह ने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सर्वसम्मति दिखाई। आइए पहले संक्षेप में जानते हैं कि ब्रिक्स क्या है, और फिर विस्तार से इस सम्मेलन के हर पहलू को समझते हैं।
ब्रिक्स क्या है?
ब्रिक्स की शुरुआत 2006 में हुई थी और इसका मूल नाम इसके संस्थापक चार देशों — ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन (BRIC) — के पहले अक्षरों से बना था। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद यह “ब्रिक्स” (BRICS) बन गया। शुरुआत में यह समूह मुख्य रूप से आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित था, लेकिन समय के साथ इसका एजेंडा तीन मुख्य स्तंभों — राजनीतिक व सुरक्षा सहयोग, आर्थिक व वित्तीय सहयोग, तथा सांस्कृतिक व जन-जन संपर्क — तक फैल गया। यह समूह आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, खाद्य व ऊर्जा सुरक्षा, वित्तीय ढांचे में सुधार, व्यापार और डब्ल्यूटीओ जैसे वैश्विक मुद्दों पर काम करता है।
2024 में इस समूह का बड़ा विस्तार हुआ, जब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात इसमें शामिल हुए (सऊदी अरब की सदस्यता को लेकर स्थिति अब भी लचीली मानी जाती है)। इसके बाद इंडोनेशिया भी इसका पूर्ण सदस्य बना, जिससे अब इस समूह में कुल 11 देश — ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात — शामिल हैं। इसके अलावा 2025 में बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम जैसे दस देश “पार्टनर कंट्री” के रूप में इस समूह से जुड़े।
भारत को 2026 में चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता मिली — इससे पहले भारत 2012, 2016 और 2021 में भी अध्यक्ष रह चुका है।
2026 सम्मेलन के बारे में
18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित हुआ। भारत ने 1 जनवरी 2026 को ब्राज़ील से ब्रिक्स की अध्यक्षता ग्रहण की थी (ब्राज़ील ने 2025 में 17वें ब्रिक्स सम्मेलन की मेज़बानी रियो डी जेनेरियो में की थी)। भारत की अध्यक्षता का आधिकारिक विषय (थीम) था — “Building Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” (सहनशीलता, नवाचार, सहयोग और स्थिरता का निर्माण), जो पिछले साल रियो सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रखे गए “मानवता-केंद्रित” दृष्टिकोण से प्रेरित बताया गया। भारत की इस अध्यक्षता का लोगो कमल के फूल पर आधारित था, जिसकी पंखुड़ियां सभी सदस्य देशों के झंडों के रंगों को दर्शाती हैं।
अपनी अध्यक्षता के दौरान भारत ने देशभर के 25 से अधिक शहरों में 350 से ज़्यादा ब्रिक्स बैठकों और उच्चस्तरीय आयोजनों की मेज़बानी की।
Thank you to all BRICS leaders for making the Delhi Summit very productive and outcome oriented! pic.twitter.com/C3DMZWGgLL
— Narendra Modi (@narendramodi) September 13, 2026
किन नेताओं ने की शिरकत
इस सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान समेत सभी ग्यारह सदस्य देशों के शीर्ष नेता शामिल हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन सभी नेताओं की मेज़बानी की। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस से भी प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात हुई। शी जिनपिंग की यह यात्रा उल्लेखनीय रही, क्योंकि 2020 के गलवान संघर्ष के बाद यह उनकी लगभग सात साल में पहली भारत यात्रा थी।
प्रमुख द्विपक्षीय बैठकें
- मोदी-पुतिन मुलाकात — शुक्रवार, 11 सितंबर को हुई, जिसमें व्यापार, ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी पर चर्चा हुई। रूस भारत का प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।
- मोदी-पेज़ेशकियान मुलाकात — इसी दिन हुई, जिसमें पश्चिम एशिया की स्थिति सहित द्विपक्षीय मुद्दों पर बात हुई।
- मोदी-शी जिनपिंग मुलाकात — शनिवार, 12 सितंबर को हुई। यह बैठक भारत-चीन सीमा तनाव के बाद रिश्तों को स्थिर करने की दिशा में एक अहम कदम मानी गई, हालांकि विश्लेषकों ने आर्थिक मुद्दों और भरोसे की कमी के चलते किसी बड़ी सफलता की उम्मीद कम जताई थी।
सम्मेलन के दौरान दिल्ली में सुरक्षा के व्यापक इंतज़ाम किए गए थे, जिसमें करीब 30,000 सुरक्षाकर्मियों की तैनाती, 22 यातायात डायवर्जन पॉइंट और लगभग 4,800 ट्रैफिक कर्मियों की तैनाती शामिल थी।
नई दिल्ली घोषणापत्र: मुख्य बिंदु
सम्मेलन के पहले दिन ही सभी सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से 140-सूत्रीय “नई दिल्ली घोषणापत्र” को अपनाया। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं घोषणा करते हुए कहा कि किसी भी सदस्य देश ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई। यह घोषणापत्र कई वैश्विक मुद्दों पर समूह के साझा रुख को दर्शाता है:
The New Delhi Declaration, adopted unanimously at the 2026 BRICS Delhi Summit, reflects the confidence of a BRICS that is wider in reach and stronger in purpose.
With a focus on innovation, sustainability, people-to-people ties and more, the endeavour is to make cooperation… pic.twitter.com/MtqucBx9AY
— Narendra Modi (@narendramodi) September 12, 2026
आतंकवाद और सुरक्षा
- घोषणापत्र में 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले (जिसमें 26 लोग मारे गए थे) की कड़ी निंदा की गई।
- नागरिक ढांचे और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी वाली शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर हमलों को लेकर भी चिंता जताई गई।
पश्चिम एशिया और गाज़ा
- घोषणापत्र में गाज़ा में तत्काल युद्धविराम और 1967 से पहले की सीमाओं तथा पूर्वी येरुशलम को राजधानी मानते हुए द्वि-राष्ट्र समाधान की मांग की गई।
- फिलिस्तीन की संयुक्त राष्ट्र में पूर्ण सदस्यता का समर्थन किया गया।
- हालांकि, अमेरिका-इज़राइल के हमलों या ईरान द्वारा खाड़ी देशों को निशाना बनाए जाने की सीधे तौर पर निंदा करने से परहेज़ किया गया, जिससे सदस्य देशों के बीच मतभेद उजागर हुए।
रूस-यूक्रेन युद्ध
- यूक्रेन युद्ध पर घोषणापत्र में सीधा ज़िक्र किए बिना, अंतरराष्ट्रीय विवादों को “वार्ता, परामर्श और कूटनीति” के ज़रिए सुलझाने की सामान्य अपील की गई — यह इस बात का संकेत है कि रूस के संस्थापक सदस्य होने के चलते इस मुद्दे पर गुट के भीतर तनाव बना हुआ है।
- समूह ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से अनधिकृत एकतरफा प्रतिबंधों की आलोचना करते हुए इन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध बताया।
व्यापार और टैरिफ
- बढ़ते एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों पर गंभीर चिंता जताई गई, जिन्हें व्यापार को विकृत करने वाला और WTO के नियमों के विरुद्ध बताया गया।
- कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म जैसे पर्यावरण की आड़ में संरक्षणवादी कदमों का विरोध किया गया।
- WTO में सुधार की मांग दोहराई गई ताकि एक खुला, निष्पक्ष और पारदर्शी बहुपक्षीय व्यापार ढांचा बना रहे।
- विकासशील और अल्प विकसित देशों के लिए विशेष व अलग व्यवहार (Special and Differential Treatment) तथा मोस्ट-फेवर्ड-नेशन सिद्धांत को दोहराया गया।
वित्तीय सहयोग
- सीमा-पार भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल और ब्रिक्स की स्थानीय मुद्राओं में व्यापार निपटान को प्रोत्साहित करने पर सहमति बनी।
- भारत के गिफ्ट सिटी (GIFT City) स्थित अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र में स्वैच्छिक “ब्रिक्स इंश्योरेंस रेसिलिएंस सेंटर” के तहत “ब्रिक्स रिस्क लैब” बनाने के भारत के प्रस्ताव में रुचि दिखाई गई।
- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी वित्तीय संस्थाओं में सुधार की ज़रूरत पर बल दिया गया।
संयुक्त राष्ट्र सुधार
- रूस और चीन ने भारत और ब्राज़ील को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में विस्तारित भूमिका दिए जाने के लिए अपना समर्थन दोहराया, ताकि एक अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था बन सके।
प्रौद्योगिकी और एआई
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के वैश्विक शासन (गवर्नेंस) पर “नेताओं के वक्तव्य” को लागू करने की प्रतिबद्धता जताई गई।
पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण
- घोषणापत्र में भारत की “इंटरनेशनल बिग कैट्स अलायंस” पहल का समर्थन किया गया और सदस्य देशों को बड़ी बिल्ली प्रजातियों (जैसे बाघ, शेर) के संरक्षण में सहयोग के लिए प्रोत्साहित किया गया।
घोषणापत्र में इंडोनेशिया के चार शांति सैनिकों की मौत पर भी संवेदना व्यक्त की गई।
सम्मेलन के इतर आयोजन
नेताओं ने भारत मंडपम में “इंडिया इनोवेट्स” प्रदर्शनी का दौरा किया। इसके अलावा वार्षिक ब्रिक्स बिज़नेस फोरम भी आयोजित हुआ, जिसमें हुआवेई, अलीबाबा और एमिरेट्स जैसी बड़ी कंपनियों की भागीदारी की चर्चा रही। पुतिन ने इस बिज़नेस फोरम के पूर्ण सत्र को संबोधित किया और मोदी के साथ भारत-रूस व्यापार मंत्रालयों द्वारा सह-आयोजित “इनोप्रोम” औद्योगिक प्रदर्शनी का भी दौरा किया।
चुनौतियां और मतभेद
यह सम्मेलन ब्रिक्स की बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक ताकत को दिखाने के साथ-साथ समूह के भीतर मतभेदों को भी उजागर करता है। समूह में शामिल भारत और चीन के बीच अपने भू-राजनीतिक मतभेद हैं, वहीं ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के क्षेत्रीय हित भी हमेशा एक जैसे नहीं होते। रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान-इज़राइल संघर्ष जैसे मुद्दों पर सर्वसम्मति बनाना समूह के लिए एक बड़ी चुनौती रही, फिर भी अंततः सभी सदस्य देश एक साझा घोषणापत्र पर सहमत हुए।
18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज़ को मज़बूत करने और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। भारत की मेज़बानी में हुए इस आयोजन ने व्यापार, वित्त, तकनीक और वैश्विक शासन से जुड़े कई अहम मुद्दों पर समूह के साझा रुख को सामने रखा, भले ही अंतरराष्ट्रीय संघर्षों पर सदस्य देशों के बीच मतभेद अब भी बरकरार हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस घोषणापत्र में लिए गए संकल्पों को व्यवहारिक रूप में कैसे लागू किया जाता है।
