सितंबर 2026 में UPI पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को लेकर छिड़ी बहस ने एक पुराने सवाल को फिर हवा दे दी है — बैंकिंग सिस्टम आम ग्राहक से आखिर कितने तरीकों से कमाई करता है? सरकार ने साफ किया है कि 15 अक्टूबर 2026 से 2,000 रुपये से अधिक के मर्चेंट UPI भुगतान पर 0.4% MDR लागू होगा, जबकि छोटे भुगतान और आपसी (P2P) लेनदेन इससे मुक्त रहेंगे। सरकार का कहना है कि यह पैसा बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडरों और UPI ऐप पार्टनरों के बीच बंटेगा ताकि डिजिटल भुगतान ढांचे और साइबर सुरक्षा को मजबूत किया जा सके, और यह ग्राहक पर सीधा टैक्स नहीं है। वहीं कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत विपक्ष ने इसे “UPI टैक्स” करार देकर वापस लेने की मांग की है, और एक याचिकाकर्ता इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट तक ले गया है। सरकार ने विदेशी दबाव के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि अगस्त 2026 में ही UPI पर 24.5 अरब लेनदेन हुए, और बड़े मूल्य के मर्चेंट लेनदेन से मिलने वाला यह संसाधन इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने में लगेगा।
यह बहस अपनी जगह ठीक है, लेकिन यह भी एक मौका है यह समझने का कि बैंक अपने ग्राहकों से पहले से ही किन-किन रास्तों से शुल्क वसूलते आए हैं — वह भी तब जबकि ग्राहक बैंक में पैसा जमा रखने पर टैक्स देता है, लेनदेन पर GST चुकाता है, और बैंक उसी जमा राशि को कर्ज के रूप में आगे देकर ब्याज कमाता है।
बैंक किन-किन चीज़ों पर चार्ज वसूलते हैं
आम बचत खाताधारक को जाने-अनजाने जिन प्रमुख शुल्कों का सामना करना पड़ता है, वे कुछ इस तरह हैं:
- न्यूनतम औसत बैलेंस (MAB) पेनल्टी — खाते में तय सीमा से कम राशि रहने पर हर महीने जुर्माना, जो शहरी क्षेत्रों में सबसे ज्यादा और ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम होता है।
- ATM लेनदेन शुल्क — मुफ्त सीमा के बाद अपने ही बैंक के ATM पर, और दूसरे बैंक के ATM पर तो पहले से ही कम मुफ्त लेनदेन के बाद शुल्क।
- डेबिट कार्ड वार्षिक शुल्क और SMS अलर्ट शुल्क — हर तिमाही या सालाना कटता रहता है, चाहे ग्राहक ने कार्ड या SMS सेवा का कितना भी इस्तेमाल किया हो।
- चेकबुक और चेक बाउंस शुल्क — तय सीमा से ज्यादा चेक पन्ने मांगने पर शुल्क, और चेक बाउंस होने पर भारी जुर्माना।
- NEFT/RTGS/IMPS और डुप्लीकेट स्टेटमेंट शुल्क — शाखा में जाकर फंड ट्रांसफर करने या पुराना स्टेटमेंट मांगने पर शुल्क (हालांकि RBI के निर्देश पर NEFT/RTGS अब ज्यादातर ऑनलाइन मुफ्त है)।
- खाता रखरखाव (अकाउंट मेंटेनेंस) शुल्क — कुछ बैंक निष्क्रिय या “नॉन-मेंटेनेंस” खातों पर भी शुल्क वसूलते हैं।
इनमें से कई शुल्क इतने छोटे लगते हैं कि ग्राहक ध्यान ही नहीं देता, लेकिन करोड़ों खातों पर जोड़ें तो यह रकम बेहद बड़ी हो जाती है।
बैंकों की कमाई: आंकड़े क्या कहते हैं
संसद में पेश किए गए सरकारी आंकड़े इस कमाई की तस्वीर साफ करते हैं। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में बताया कि सिर्फ न्यूनतम औसत बैलेंस (MAB) न रखने पर वित्त वर्ष 2022-23 से 2025-26 तक बैंकों ने ग्राहकों से कुल 26,170.37 करोड़ रुपये पेनल्टी के रूप में वसूले। इसमें अकेले वित्त वर्ष 2025-26 में ही 7,086.63 करोड़ रुपये वसूले गए, जिसमें प्राइवेट बैंकों का हिस्सा 4,948.71 करोड़ रुपये (करीब 70%) और सरकारी बैंकों का हिस्सा 2,137.92 करोड़ रुपये रहा। निजी बैंकों में HDFC बैंक सबसे आगे रहा, जबकि सरकारी बैंकों में SBI ने 477.27 करोड़ रुपये की सबसे ज्यादा वसूली की। अगर इसमें डेबिट कार्ड चार्ज को भी जोड़ दें, तो वित्त वर्ष 2025-26 में देश के 123 सरकारी और निजी बैंकों ने सिर्फ मिनिमम बैलेंस पेनल्टी और डेबिट कार्ड चार्ज से मिलाकर 14,650 करोड़ रुपये की कमाई की।
यह कोई नई बात नहीं है। 2017-18 में जब वित्त मंत्रालय के आंकड़े सामने आए तो पता चला कि SBI ने अकेले उस साल के शुरुआती आठ महीनों में ही न्यूनतम औसत बैलेंस न रखने पर ग्राहकों से 1,772 करोड़ रुपये वसूल लिए थे — यह रकम बैंक के उस तिमाही के मुनाफे से भी ज्यादा थी। इस भारी आलोचना के बाद सरकार ने SBI को पेनल्टी और ATM पर लगने वाले शुल्क पर पुनर्विचार करने को कहा था, जिसके बाद बैंक ने जुर्माना दर करीब 75% तक घटाई और बाद में मार्च 2020 से बचत खातों पर यह शुल्क पूरी तरह समाप्त कर दिया।
ATM और खाता रखरखाव शुल्क के मोर्चे पर भी आंकड़े कम चौंकाने वाले नहीं। वित्त वर्ष 2022-23 से 2025-26 के बीच सरकारी बैंकों ने सिर्फ ATM और अकाउंट मेंटेनेंस चार्ज से मिलाकर 10,230 करोड़ रुपये की कमाई की, जिसमें सबसे ज्यादा हिस्सा पंजाब नेशनल बैंक का रहा — करीब 1,784.55 करोड़ रुपये — जबकि SBI ने अकेले ATM और अकाउंट मेंटेनेंस चार्ज से 3,349 करोड़ रुपये वसूले। ध्यान देने वाली बात यह है कि निजी बैंकों के आंकड़े इसमें शामिल नहीं हैं, क्योंकि RBI के पास उनका ब्योरा उपलब्ध नहीं है — यानी असल आंकड़ा इससे भी कहीं ज्यादा होने की संभावना है।
ग्राहकों पर बोझ: छोटा शुल्क, बड़ा असर
इन आंकड़ों के पीछे असल कहानी उन करोड़ों आम खाताधारकों की है जिनके लिए हर महीने कटने वाला 50, 100 या 600 रुपये का जुर्माना छोटी बचत पर सीधा प्रहार साबित होता है। जो ग्राहक बुनियादी बचत खाता (BSBDA या जीरो बैलेंस खाता) नहीं खुलवाते, उन्हें अक्सर यह जानकारी ही नहीं होती कि साधारण बचत खाते पर न्यूनतम बैलेंस की शर्त लागू है। RBI के नियमों के मुताबिक बैंकों को पेनल्टी लगाने से पहले SMS, ईमेल या पत्र के जरिए अलर्ट करना अनिवार्य है, लेकिन व्यवहार में बहुत से ग्राहकों को यह पता तब चलता है जब खाते से पैसा पहले ही कट चुका होता है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के, कम आय वाले और कम बैंकिंग-साक्षर ग्राहकों पर इसका असर अनुपातहीन रूप से ज्यादा पड़ता है, क्योंकि वे न तो शुल्क-मुक्त खातों के विकल्प जानते हैं और न ही हर महीने बैलेंस पर नजर रख पाते हैं।
दूसरे बैंक के ATM से पैसा निकालना: हर बार महंगा होता चार्ज
अगर आपका अपना बैंक का ATM पास में नहीं है और आप मजबूरी में दूसरे बैंक के ATM से पैसा निकालते हैं, तो इसका बोझ भी लगातार बढ़ता गया है। जब कोई ग्राहक अपने बैंक के बजाय किसी दूसरे बैंक के ATM का इस्तेमाल करता है, तो उसका बैंक उस ATM के मालिक बैंक को एक तय “इंटरचेंज फीस” चुकाता है, और यही लागत अंततः ग्राहक से वसूली जाती है। यह शुल्क समय के साथ लगातार बढ़ा है — जनवरी 2022 से मुफ्त सीमा पार करने पर प्रति ट्रांजैक्शन 21 रुपये वसूले जा रहे थे, और अब RBI ने NPCI के प्रस्ताव पर मंजूरी देते हुए इसे 1 मई 2025 से बढ़ाकर 23 रुपये कर दिया है। इसके अलावा बैलेंस चेक या मिनी स्टेटमेंट जैसे गैर-वित्तीय लेनदेन पर भी शुल्क 1 रुपये बढ़ाकर 7 रुपये कर दिया गया है। यानी सिर्फ यह जानने के लिए कि आपके खाते में कितना पैसा बचा है, अगर आपने मुफ्त सीमा पार कर ली हो, तो अलग से चार्ज लगेगा।
इसके साथ ही मुफ्त लेनदेन की संख्या भी वर्षों में घटती गई है। पहले ग्राहकों को दूसरे बैंक के ATM पर महीने में पांच मुफ्त लेनदेन मिलते थे, लेकिन बाद में इसे मेट्रो शहरों के लिए घटाकर तीन कर दिया गया (गैर-मेट्रो में पांच बरकरार रहे), और इस सीमित मुफ्त सुविधा से आगे बढ़ते ही हर ट्रांजैक्शन पर तय शुल्क लागू होने लगा। छोटे और क्षेत्रीय बैंकों के ग्राहक, जिनके अपने ATM नेटवर्क सीमित हैं और जो पहले से ही बड़े बैंकों के ATM नेटवर्क पर निर्भर हैं, इस बढ़ोतरी की सबसे ज्यादा मार झेलते हैं।
2014 के बाद से चार्जेज़ का सफर: धीरे-धीरे बढ़ता बोझ
मौजूदा सरकार के कार्यकाल में बैंकिंग शुल्कों की दिशा देखें तो एक स्पष्ट पैटर्न नजर आता है — डिजिटल और कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा देने की सरकारी मुहिम के साथ-साथ पारंपरिक बैंकिंग सेवाओं पर शुल्क भी लगातार बढ़ते गए:
- 2014-2015 के आसपास दूसरे बैंक के ATM पर मुफ्त लेनदेन की संख्या घटाकर पांच से घटाकर बड़े शहरों में तीन कर दी गई, जिसका तर्क यह दिया गया कि ATM और शाखा नेटवर्क का घनत्व बढ़ चुका है इसलिए मुफ्त सुविधा की जरूरत कम हो गई है।
- 2017-18 में SBI द्वारा न्यूनतम बैलेंस पेनल्टी से भारी कमाई (आठ महीने में 1,772 करोड़ रुपये) सामने आने पर व्यापक आलोचना हुई, और सरकार को हस्तक्षेप कर बैंक से दरें घटवानी पड़ीं — जो यह दिखाता है कि यह मुद्दा इस दौर में शुरू से ही विवादास्पद रहा है।
- 2019-2022 के बीच ATM इंटरचेंज फीस चरणबद्ध तरीके से बढ़ाई गई, और जनवरी 2022 से यह 21 रुपये प्रति लेनदेन तक पहुंच गई।
- मार्च 2020 में महामारी के दौर में जनदबाव और डिजिटल भुगतान बढ़ाने की जरूरत के चलते SBI ने बचत खातों पर न्यूनतम बैलेंस शुल्क पूरी तरह हटाया, और कई अन्य सरकारी बैंकों ने भी यही रास्ता अपनाया — हालांकि निजी बैंकों में यह पेनल्टी आज भी पूरी तरह लागू है।
- मई 2025 से ATM इंटरचेंज फीस को और बढ़ाकर 23 रुपये कर दिया गया, साथ ही गैर-वित्तीय लेनदेन का शुल्क भी बढ़ा।
- 2022-23 से 2025-26 के बीच अकेले न्यूनतम बैलेंस पेनल्टी से ही बैंकों ने 26,170 करोड़ रुपये से ज्यादा वसूले, जो यह दिखाता है कि सरकारी बैंकों में राहत के बावजूद निजी बैंकों की वसूली के चलते कुल आंकड़ा लगातार ऊपर ही गया है।
- सितंबर 2026 में UPI पर, जो अब तक ग्राहक और छोटे व्यापारियों के लिए पूरी तरह मुफ्त था, बड़े मर्चेंट लेनदेन पर MDR लागू करने का फैसला — यानी छह साल से चले आ रहे “जीरो-MDR” मॉडल में बदलाव की शुरुआत, जिस पर अभी राजनीतिक और कानूनी बहस जारी है।
इस पूरे घटनाक्रम को निष्पक्षता से देखें तो बैंकों और सरकार का पक्ष यह रहा है कि ATM नेटवर्क, साइबर सुरक्षा और डिजिटल भुगतान ढांचे को बनाए रखने की लागत बढ़ी है, इसलिए शुल्कों में संशोधन जरूरी है — खासकर छोटे बैंकों के लिए, जो बड़े नेटवर्क पर निर्भर हैं। वहीं आलोचकों और ग्राहक संगठनों का कहना है कि एक तरफ बैंक ग्राहकों की जमा राशि पर ब्याज देते हैं और सरकार को टैक्स चुकाती है, जबकि दूसरी तरफ वही ग्राहक अपने ही पैसे तक पहुंचने, जानकारी लेने और बुनियादी लेनदेन करने के लिए बार-बार शुल्क चुकाता है — और यह बोझ सबसे ज्यादा उन्हीं ग्राहकों पर पड़ता है जिनके पास बैंकिंग विकल्पों की जानकारी या सौदेबाजी की ताकत सबसे कम होती है।
बैंक चार्जेज़ की यह पूरी तस्वीर बताती है कि यह कोई इक्का-दुक्का मुद्दा नहीं, बल्कि एक सतत ट्रेंड है — न्यूनतम बैलेंस पेनल्टी, ATM शुल्क, SMS और डेबिट कार्ड चार्ज से लेकर अब UPI पर MDR तक, हर कुछ वर्षों में कोई न कोई नया या बढ़ा हुआ शुल्क सामने आता रहा है, और आंकड़े दिखाते हैं कि इससे बैंकों की कमाई हर साल हजारों करोड़ रुपये में है। जहां बैंकों और नियामकों का तर्क बुनियादी ढांचे की लागत और सुरक्षा की जरूरत पर टिका है, वहीं आम ग्राहक के लिए सवाल यही बना रहता है कि जिस पैसे पर वह पहले से टैक्स और ब्याज चुका चुका है, उस तक पहुंचने की कीमत आखिर कब तक बढ़ती रहेगी।
