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Home»खबर विशेष»“राष्ट्र पहले” — लेकिन त्याग सिर्फ आम आदमी का?
खबर विशेष

“राष्ट्र पहले” — लेकिन त्याग सिर्फ आम आदमी का?

News DriftBy News DriftMay 15, 2026No Comments8 Mins Read
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“राष्ट्र पहले” — लेकिन त्याग सिर्फ आम आदमी का?
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एक अपील जिसने आग लगा दी:

  • 10 मई 2026 को तेलंगाना के सिकंदराबाद में भाजपा की एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक अभूतपूर्व अपील की। उन्होंने नागरिकों से “राष्ट्र को व्यक्तिगत सुविधा से ऊपर रखने” का आग्रह किया — विदेश यात्रा बंद करें, कम ईंधन जलाएं, घर से काम करें, और कम से कम एक साल सोना न खरीदें।
  • उन्होंने कहा, “इस वैश्विक संकट की घड़ी में हमें कर्तव्य को सर्वोपरि रखकर संकल्प लेना होगा और पूरी निष्ठा से उसे निभाना होगा।”
    भाषण सुनने में बहुत अच्छा लगा। लेकिन जब उसी रैली के बाद प्रधानमंत्री का काफिला सड़क पर निकला — एसयूवी, बुलेटप्रूफ वाहन, दर्जनों गाड़ियाँ — तो सोशल मीडिया पर एक सवाल गूँजने लगा: त्याग क्या सिर्फ आम नागरिक के लिए है?

संकट वास्तविक है — लेकिन जिम्मेदार कौन?
पहले यह समझें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह अपील क्यों की। कारण आर्थिक हैं और गंभीर हैं।

  • भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। 2025-26 के वित्त वर्ष में भारत ने 123 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया — यह अकेले सबसे बड़ा आयात मद है।
  • सोने में भारत ने 72 अरब डॉलर खर्च किए, जो दुनिया में चीन के बाद सबसे अधिक है।
  • पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होते ही भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में दो महीनों के भीतर लगभग 38 अरब डॉलर की गिरावट आई।
  • जनवरी से मई 2026 के बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय बाजार से लगभग 1.97 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए।
  • रुपया 15 मई तक 95.63 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया।
  • RBI को रुपये को थामे रखने के लिए डॉलर बेचने पड़े
  • IMF ने अनुमान लगाया है कि 2026 में भारत का चालू खाता घाटा (CAD) 84 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है।

संकट झूठा नहीं है। लेकिन सवाल यह है — इस संकट के लिए जिम्मेदार कौन है? और इसकी कीमत कौन चुकाएगा?

वह सवाल जो कोई नहीं पूछता: यह नौबत आई क्यों?
प्रधानमंत्री ने मध्य पूर्व के युद्ध को इस संकट का कारण बताया। यह आंशिक सच है। लेकिन पूरा सच यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था की बुनियादी कमज़ोरियाँ सरकार की अपनी नीतियों की देन हैं।
पहला — तेल की लत: दस साल में मोदी सरकार ने नवीकरणीय ऊर्जा के बड़े-बड़े वादे किए। सोलर पैनल की बातें हुईं, इलेक्ट्रिक वाहन की नीतियाँ बनीं। लेकिन तेल आयात घटा नहीं — बल्कि बढ़ा। भारत ने मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष में कुल आयात का 22% यानी 174.9 अरब डॉलर केवल कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर खर्च किया। दस साल में ऊर्जा स्वतंत्रता की दिशा में ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए?

दूसरा — FDI का सूखा: 2023-24 में शुद्ध FDI करीब 10 अरब डॉलर था। 2024-25 में यह सिमटकर मात्र 0.35 अरब डॉलर रह गया — जो किसी हिसाब की गलती जैसा आँकड़ा है। यह “विश्वगुरु” की अर्थव्यवस्था का हाल है। बड़े-बड़े ‘Invest India’ समिट हुए, लाखों करोड़ के MoU साइन हुए — पर निवेश आया कहाँ?

तीसरा — रुपये की कमज़ोरी: रुपया दुनिया की सबसे कमज़ोर उभरती बाज़ार मुद्राओं में से एक बन गया है। यह कमज़ोरी रातोंरात नहीं आई — यह वर्षों की नीतिगत अनिश्चितता, GST की जटिलताओं और व्यापार असंतुलन का नतीजा है।

इस पूरे दशक में सरकार ने आर्थिक मजबूती की जगह चुनावी प्रबंधन को प्राथमिकता दी। और जब संकट आया — तो अपील जनता से की गई।

पहले बंगाल में काफिले, फिर जनता को उपदेश

  • मितव्ययिता की अपील से ठीक कुछ समय पहले — पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव प्रचार में भाजपा के काफिले सड़कों पर थे। हेलीकॉप्टर उड़ रहे थे। रोड-शो हो रहे थे। एसयूवी की लंबी कतारें थीं। हर रैली में हज़ारों लीटर डीजल जला।
  • और फिर 10 मई को वही नेता मंच पर आए और कहा — “तेल बचाओ।” यह विडंबना नहीं, यह पाखंड है।
  • सोशल मीडिया पर उपयोगकर्ताओं ने वीडियो शेयर किए जिनमें दिखाया गया कि मितव्ययिता की अपील के बाद मोदी एक बुलेटप्रूफ Range Rover-टाइप SUV में जामनगर में रोड-शो कर रहे थे — जो मात्र 5 km/l का माइलेज देती है — और उनके पीछे एक विशाल काफिला था। 

जब यह आलोचना तूफान बन गई, तब जाकर प्रधानमंत्री ने अपने काफिले का आकार कम किया। पर सवाल यह है — यह कदम अपील से पहले क्यों नहीं उठाया गया? नेतृत्व तो उदाहरण से होता है, दबाव में नहीं।

अपील के बाद — 5 देशों की विदेश यात्रा
अपील के ठीक पाँच दिन बाद — 15 मई 2026 को — प्रधानमंत्री छह दिन की विदेश यात्रा पर निकल पड़े। प्रधानमंत्री मोदी 15 से 20 मई 2026 तक UAE, नीदरलैंड्स, स्वीडन, नॉर्वे और इटली की यात्रा पर हैं।
सरकार का तर्क है कि यह यात्रा ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार के लिए ज़रूरी है। यह तर्क सुनने में सही भी लगता है। UAE भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और वहाँ 45 लाख से अधिक भारतीय रहते हैं।
लेकिन जब एक प्रधानमंत्री देश की जनता से कहे “एक साल विदेश मत जाओ” — और खुद पाँच दिन बाद पाँच देशों की यात्रा पर निकल जाए — तो जनता यह संदेश ग्रहण करती है कि नियम उनके लिए हैं, नेता के लिए नहीं।

पेट्रोल-डीजल महंगा: “कम इस्तेमाल करो” — लेकिन “ज़्यादा दाम पर”

  • अपील का असर देखते-देखते — 15 मई 2026 को पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ा दिए गए।
  • दिल्ली में पेट्रोल 94.77 रुपये से बढ़कर 97.77 रुपये प्रति लीटर हो गया। डीजल 87.67 से 90.67 रुपये प्रति लीटर हो गया। CNG की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई। यह चार साल में पहली बड़ी ईंधन मूल्य वृद्धि थी।
  • मुंबई में पेट्रोल 106.68 रुपये, कोलकाता में 108.74 रुपये और चेन्नई में 103.67 रुपये प्रति लीटर हो गया। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि यह बढ़ोतरी वास्तविक ज़रूरत का मात्र दसवाँ हिस्सा है। यानी आगे और बढ़ोतरी आ सकती है।
  • शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि “पेट्रोल-डीजल में 3 रुपये प्रति लीटर की तेज वृद्धि और CNG में 2 रुपये की बढ़ोतरी उस आम आदमी के लिए कुचलने वाला झटका है जो पहले से महंगाई और बढ़ती लागत से जूझ रहा है।”
  • पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष ने तंज कसते हुए कहा: “मोदी सरकार पहले नागरिकों को ‘कम गाड़ी चलाओ’ का उपदेश देती है, फिर PR अभियान चलाती है कि ‘हमने PM का काफिला छोटा किया’ — और फिर चुपके से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा देती है।”

आम नागरिक: दोनों तरफ से पिस रहा है

  • सोचिए उस मज़दूर के बारे में जो रोज़ अपनी मोटरसाइकिल पर 40 किलोमीटर काम पर जाता है। उसे कोई work from home नहीं मिलेगा। उसे public transport का कोई भरोसेमंद विकल्प नहीं है। उसके लिए तेल बचाने का मतलब है — खाना कम खाना।
  • कमज़ोर रुपया एक खतरनाक चक्र बनाता है: आयातित ज़रूरी वस्तुओं — तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, उर्वरकों — की कीमत बढ़ती है, जिससे घरेलू महंगाई बढ़ती है, जिससे रुपया और कमज़ोर होता है।
  • किसानों पर डबल मार पड़ रही है — डीजल महंगा, खाद महंगी। और ऊपर से सरकार कह रही है “कम खर्च करो।”
  • वह 32.7 मिलियन भारतीय जो विदेश जाते हैं — उनमें से अधिकांश मध्यमवर्गीय नहीं हैं जो “शौक” के लिए जाते हैं। बहुत से वे लोग हैं जो खाड़ी देशों में मज़दूरी करते हैं, जो अपने परिवार का पेट भरते हैं। क्या उन्हें भी “एक साल विदेश मत जाओ” वाला उपदेश लागू होगा?

पार्टी का धर्म: असली समस्या से ध्यान हटाने की अफीम
इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अपील को देशभक्ति के रंग में रंगा गया। जो इससे सवाल करे — वह “देशद्रोही।” जो सरकार की आलोचना करे — वह “राष्ट्रविरोधी।”

  • जब भाजपा के अपने एक जिला नेता ने मध्यप्रदेश में ग्वालियर से भिंड तक सैकड़ों वाहनों का काफिला निकाला, तो पार्टी ने उन्हें “अनुशासनहीनता” के आरोप में पद से हटा दिया। यह एक नेता को बलि का बकरा बनाकर बाकी पाखंड को ढकने की कोशिश थी।
  • यह वही राजनीतिक संस्कृति है जो हर समस्या को या तो राष्ट्रवाद से ढकती है, या धर्म से। जनता को बताया जाता है — “बाहरी दुश्मन ने यह किया,” “पाकिस्तान ज़िम्मेदार है,” “विदेशी ताकतें भारत को तोड़ना चाहती हैं।” इस बीच घरेलू नीतिगत विफलताएँ बिना जवाबदेही के चलती रहती हैं।
  • असली सवाल यह नहीं है कि जनता कम तेल जलाए या नहीं। असली सवाल यह है — जब अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतें कम थीं, तब सरकार ने वह राहत जनता को क्यों नहीं दी? और जब तेल के दाम गिरे थे, तब excise duty बढ़ाकर वह पैसा कहाँ गया?

अपील नहीं, जवाबदेही चाहिए
मोदी की अपील में आर्थिक तर्क है। संकट असली है। लेकिन जिस तरह यह अपील आई — काफिले के बाद, रैली के मंच से, विदेश यात्रा से पाँच दिन पहले, और पेट्रोल दाम बढ़ोतरी से पाँच दिन पहले — उसने हर तर्क को संदिग्ध बना दिया।

जनता से “राष्ट्र पहले” माँगने से पहले सरकार को खुद से पूछना चाहिए:

  • क्या चुनाव-प्रचार में ईंधन जलाने से पहले “राष्ट्र पहले” था?
  • क्या excise duty के ज़रिए तेल से अरबों कमाते वक्त “आम आदमी पहले” था?
  • क्या तब “राष्ट्र पहले” था जब FDI सूखा और रुपया टूटा?

त्याग की माँग तब ही नैतिक होती है जब नेता खुद पहले त्याग करें। वरना यह अपील नहीं होती — यह आदेश होता है, जो सत्ता ऊपर से नीचे की ओर देती है।

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