RTI: “सूचना का अधिकार” यानी RTI को लोकतंत्र का सबसे शक्तिशाली हथियार कहा जाता है। 2005 में लागू इस कानून का उद्देश्य था कि आम नागरिक सरकारी कामकाज पर निगरानी रख सके और अधिकारियों से जवाब मांग सके।
कानून साफ कहता है कि मांगी गई सूचना 30 दिनों के भीतर उपलब्ध कराई जानी चाहिए। लेकिन उत्तर प्रदेश में अनेक मामलों में यह समय सीमा केवल कागजों तक सीमित दिखाई देती है। सूचना देने के बजाय आवेदन एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय भेजे जाते हैं, अपीलें लगती हैं, सुनवाई होती है, आदेश जारी होते हैं, लेकिन सूचना फिर भी नहीं मिलती।
केस-1 : लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA)
3 फरवरी 2026 को लखनऊ विकास प्राधिकरण में एक RTI आवेदन दाखिल किया गया।
आवेदन संख्या:
LKDPA/R/2026/60149/1
- कानून के अनुसार 30 दिनों में सूचना मिल जानी चाहिए थी, लेकिन निर्धारित अवधि बीत गई।
- सूचना न मिलने पर प्रथम अपील दायर की गई।
- 10 अप्रैल 2026 को प्रथम अपील की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान प्रथम अपीलीय अधिकारी ने रिकॉर्ड का परीक्षण किया और अपने आदेश में स्पष्ट रूप से लिखा:
- “अपीलार्थी को सूचना प्रेषित किये जाने का कोई अभिलेखीय साक्ष्य पत्रावली में उपलब्ध नहीं है।” अर्थात विभाग यह भी साबित नहीं कर पाया कि उसने सूचना भेजी थी।
इसके बाद प्रथम अपीलीय अधिकारी ने संबंधित जनसूचना अधिकारी को 15 दिनों के भीतर सूचना उपलब्ध कराने का आदेश दिया। लेकिन सूचना आज खबर लिखने तक यानी 17 जून 2026 तक भी उपलब्ध नहीं कराई गयी।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कानून 30 दिन में सूचना देने का प्रावधान करता है, तो नागरिक को पहले अपील क्यों करनी पड़ी? और यदि प्रथम अपील तक जाना पड़े तो कानून का उद्देश्य कितना प्रभावी रह जाता है?
केस-2 : सीतापुर का मामला
दूसरा मामला जनपद सीतापुर के विकास खण्ड सिधौली में अमृत सरोवर योजना से जुड़ा है।
एक आवेदनकर्ता के द्वारा 26 मार्च 2026 को अमृत सरोवर योजना से संबंधित सूचना मांगी गई। सबसे पहले आवेदन पंचायत राज निदेशालय को भेजा गया। फिर निदेशालय ने आवेदन जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO), सीतापुर को भेज दिया।
- इसके बाद जिला पंचायत राज अधिकारी ने आवेदन खण्ड विकास अधिकारी (BDO), सिधौली को स्थानांतरित कर दिया।
- यानी सूचना देने के बजाय आवेदन लगातार एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय घूमता रहा।
- पोर्टल पर प्रकरण “Disposed” दिखा दिया गया, लेकिन आवेदक को सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई।
- यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि किसी योजना पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं और नागरिक केवल यह जानना चाहता है कि कितने अमृत सरोवर बने तथा कितना धन खर्च हुआ, तो यह सूचना उपलब्ध कराने में इतनी कठिनाई क्यों हो रही है?
ट्रांसफर का खेल
RTI अधिनियम की धारा 6(3) के तहत यदि सूचना किसी अन्य प्राधिकरण के पास हो तो आवेदन स्थानांतरित किया जा सकता है।
लेकिन व्यवहार में कई बार यह प्रावधान जवाबदेही से बचने का माध्यम बन जाता है।
आवेदन:
विभाग से निदेशालय,
निदेशालय से जिला कार्यालय,
जिला कार्यालय से ब्लॉक कार्यालय
तक पहुंच जाता है, लेकिन सूचना नागरिक तक नहीं पहुंचती।
इसी तरह के कई मामले:
हालंकि कई RTI कार्यकर्ता या जवाब के इंतज़ार में बैठे आवेदक खुद के लिए या पब्लिक के लिए जनता के पैसे का हिसाब देखने के लिए RTI लगाते हैं लेकिन अधिकारी इस क़ानून की अवमानना लगातार करते जा रहे हैं।
कानून क्या कहता है?
RTI Act की धारा 7(1) के अनुसार सामान्य मामलों में 30 दिनों के भीतर सूचना देना अनिवार्य है।
धारा 7(6) और भी महत्वपूर्ण है।
इसमें स्पष्ट प्रावधान है कि यदि निर्धारित समय सीमा में सूचना उपलब्ध नहीं कराई जाती है तो सूचना निःशुल्क दी जाएगी।
यानी विलंब की कीमत नागरिक नहीं बल्कि विभाग को चुकानी चाहिए।
सबसे बड़ा नुकसान किसका?
जब सूचना समय पर नहीं मिलती तो नुकसान केवल एक RTI आवेदक का नहीं होता।
नुकसान होता है:
पारदर्शिता का,
जवाबदेही का,
लोकतांत्रिक निगरानी का,
और जनता के विश्वास का।
क्योंकि RTI केवल कागज मांगने का अधिकार नहीं है, बल्कि यह जानने का अधिकार है कि जनता के पैसे का उपयोग कैसे हो रहा है।
जवाबदेही तय होगी?
उत्तर प्रदेश में हर वर्ष हजारों RTI आवेदन दायर होते हैं।
लेकिन सवाल यह है कि:
- कितने अधिकारियों पर विलंब के लिए दंड लगाया गया?
- कितने मामलों में धारा 20 के तहत कार्रवाई हुई?
- कितनी बार प्रथम अपीलीय अधिकारियों के आदेशों का पालन नहीं हुआ?
- जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक RTI का 30 दिन वाला वादा आम नागरिक के लिए केवल एक कानूनी प्रावधान बनकर रह जाएगा।
निष्कर्ष
RTI कानून नागरिक को सूचना का अधिकार देता है, लेकिन जमीनी स्तर पर सूचना पाने के लिए नागरिक को आवेदन, प्रथम अपील, द्वितीय अपील और कई बार सूचना आयोग तक का सफर तय करना पड़ता है।
यदि लोकतंत्र में पारदर्शिता को मजबूत करना है, तो केवल RTI कानून होना पर्याप्त नहीं है। आवश्यक यह है कि अधिकारी समयबद्ध तरीके से जवाब देने के लिए जवाबदेह भी बनें।
अन्यथा “30 दिन में सूचना” का वादा, महीनों और वर्षों के इंतजार में बदलता रहेगा।
