लखनऊ महापौर सुषमा खर्कवाल के अधिकार फ्रीज : राजधानी लखनऊ नगर निगम से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने लखनऊ की महापौर सुषमा खर्कवाल के सभी वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार अगले आदेश तक फ्रीज कर दिए हैं। अदालत ने यह सख्त फैसला वार्ड संख्या-73 (फैजुल्लागंज तृतीय) से निर्वाचित पार्षद ललित किशोर तिवारी को 5 महीने बाद भी पद एवं गोपनीयता की शपथ न दिलाए जाने पर सुनाया।
कोर्ट के आदेश के बाद अब नगर निगम का प्रशासनिक और वित्तीय कामकाज जिला मजिस्ट्रेट (DM) और नगर आयुक्त की निगरानी में संचालित होगा।
हाईकोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी
यह आदेश न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति एसक्यूएच रिजवी की खंडपीठ ने पार्षद ललित किशोर तिवारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया।
बृहस्पतिवार (21 मई 2026) को सुनवाई के दौरान लखनऊ के जिलाधिकारी और नगर आयुक्त अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। हाईकोर्ट ने पिछली सुनवाई में स्पष्ट निर्देश दिया था कि 21 मई तक निर्वाचित पार्षद को शपथ दिलाई जाए, अन्यथा अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा।
कोर्ट ने आदेश का पालन न होने पर नाराजगी जताते हुए महापौर के अधिकार फ्रीज करने का आदेश जारी कर दिया।
क्या है पूरा मामला?
नगर निकाय चुनाव 2023 में फैजुल्लागंज तृतीय वार्ड-73 से भाजपा प्रत्याशी प्रदीप कुमार शुक्ला उर्फ टिंकू शुक्ला और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी ललित किशोर तिवारी के बीच मुकाबला हुआ था।
मतगणना के बाद भाजपा प्रत्याशी प्रदीप शुक्ला को विजयी घोषित किया गया था। उन्हें 4,972 वोट मिले थे, जबकि सपा प्रत्याशी ललित तिवारी को 3,298 मत प्राप्त हुए थे।
क्यों रद्द हुआ बीजेपी पार्षद का चुनाव?
चुनाव परिणाम के बाद सपा प्रत्याशी ललित तिवारी ने अदालत में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि भाजपा प्रत्याशी प्रदीप शुक्ला ने नामांकन के दौरान अपने हलफनामे में जरूरी जानकारियां छिपाई थीं।
याचिका में आरोप लगाया गया कि प्रत्याशी ने:
- संपत्ति का पूरा विवरण नहीं दिया,
- पत्नी और बच्चों की जानकारी छिपाई, (आरोप था की इनकी दो पत्नियाँ हैं लेकिन एक पत्नी से सम्बंधित जानकारी छुपाई )
- और निर्वाचन संबंधी जरूरी सूचनाएं अधूरी प्रस्तुत कीं।
करीब ढाई साल चली सुनवाई के बाद 19 दिसंबर 2025 को अपर जिला जज (निर्वाचन न्यायाधिकरण) ने इसे गंभीर चुनावी अनियमितता मानते हुए प्रदीप शुक्ला का निर्वाचन रद्द कर दिया था। अदालत ने ललित किशोर तिवारी को निर्वाचित पार्षद घोषित किया था।
सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत
मामला बाद में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, लेकिन 20 मई 2026 को शीर्ष अदालत से भी राहत नहीं मिली। इसके बावजूद नए निर्वाचित पार्षद को शपथ नहीं दिलाई गई, जिस पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया।
कोर्ट के आदेश की बड़ी बातें
- लखनऊ महापौर सुषमा खर्कवाल के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार फ्रीज
- नगर निगम का कामकाज अब DM और नगर आयुक्त देखेंगे
- निर्वाचित पार्षद को शपथ न दिलाने पर हाईकोर्ट सख्त
- अदालत ने प्रशासनिक लापरवाही पर नाराजगी जताई
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
नगर निगम प्रशासन से जुड़े मामलों में यह बेहद दुर्लभ स्थिति मानी जा रही है, जब अदालत ने सीधे किसी निर्वाचित महापौर के अधिकारों पर रोक लगाई हो। इस फैसले के बाद लखनऊ नगर निगम और उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है।
