गन कल्चर: उत्तर प्रदेश में तेजी से फल-फूल रहे ‘गन कल्चर’ और बाहुबलियों को मिले राजनीतिक व प्रशासनिक संरक्षण पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने प्रदेश के कई रसूखदार और प्रभावशाली नेताओं के शस्त्र लाइसेंसों की जांच के आदेश देते हुए उनकी पूरी आपराधिक कुंडली तलब कर ली है।
जिन प्रमुख चेहरों के असलहा लाइसेंस और उनके आपराधिक इतिहास की जांच के दायरे में आने की बात सामने आई है, उनमें पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह, पूर्व मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भइया, पूर्व सांसद धनंजय सिंह, सुशील सिंह और विनीत सिंह समेत कई अन्य प्रभावशाली नाम शामिल हैं।
जयशंकर की याचिका पर हाईकोर्ट का बड़ा एक्शन
यह ऐतिहासिक आदेश संतकबीर नगर के निवासी जयशंकर की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने दिया है। याचिकाकर्ता ने प्रदेश में नियमों को ताक पर रखकर बाहुबलियों और अपराधियों को शस्त्र लाइसेंस आवंटित किए जाने का मुद्दा उठाया था। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कोर्ट ने सरकार से इस पर जवाब मांगा था।
सरकारी हलफनामे के आंकड़ों से हैरान हुआ कोर्ट
इससे पहले की सुनवाई में प्रदेश सरकार द्वारा दाखिल किए गए हलफनामे के आंकड़ों ने कोर्ट को चौंका दिया था। सरकार ने अदालत को बताया था कि:
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उत्तर प्रदेश में इस समय 10 लाख से भी अधिक एक्टिव शस्त्र लाइसेंस हैं।
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इनमें से 6 हजार से ज्यादा लाइसेंस ऐसे लोगों के पास हैं, जिनका आपराधिक इतिहास (दागी छवि) है।
इस खुलासे पर कोर्ट ने गहरी चिंता व्यक्त की। अदालत ने पाया कि कई ऐसे बड़े नाम और बाहुबली हैं, जिनके खिलाफ दर्जनों आपराधिक मामले दर्ज हैं, लेकिन फिर भी उनके नाम इस सरकारी हलफनामे की सूची से गायब हैं। इसी बात का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने अब इन सभी प्रभावशाली लोगों की पूरी क्रिमिनल हिस्ट्री और उन्हें मिली सरकारी सुरक्षा (Security Cover) का पूरा ब्योरा तलब कर लिया है।
शस्त्र लाइसेंस पर क्या है हाईकोर्ट का कड़ा रवैया?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश में बढ़ते ‘गन कल्चर’ और हथियारों के प्रदर्शन की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता और नाराजगी जताई है। गन लाइसेंस को लेकर हाईकोर्ट का रुख निम्नलिखित बिंदुओं से साफ समझा जा सकता है:
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हथियार रखना स्टेटस सिंबल नहीं: कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि शस्त्र लाइसेंस कोई ‘स्टेटस सिंबल’ या समाज में धौंस जमाने का जरिया नहीं है। यह केवल आत्मरक्षा के लिए विशेष परिस्थितियों में दिया जाने वाला अधिकार है।
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लापरवाही और नियमों की अनदेखी पर नाराजगी: कोर्ट इस बात से बेहद गंभीर है कि आखिर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के शस्त्र लाइसेंसों का नवीनीकरण कैसे होता जा रहा है? नियमों की अनदेखी को लेकर कोर्ट ने सरकार और जिला प्रशासनों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।
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अपराधियों के पास हथियार होने से समाज को खतरा: कोर्ट का मानना है कि यदि रसूखदारों और अपराधियों के पास वैध हथियारों का जखीरा रहेगा, तो इससे गवाहों को डराना आसान हो जाता है, जिससे निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है।
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सरकारी सुरक्षा के दुरुपयोग पर रोक: कोर्ट ने बाहुबलियों को मिलने वाली सरकारी सुरक्षा के ऑडिट की बात भी कही है, ताकि जनता के पैसे का इस्तेमाल अपराधियों को वीआईपी ट्रीटमेंट देने में न हो।
अदालत का स्पष्ट संदेश: हाईकोर्ट का यह कड़ा रुख साफ संकेत देता है कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश में शस्त्र लाइसेंस जारी करने और उनके रिन्यूअल के नियमों को बेहद कड़ा किया जा सकता है, तथा दागी छवि वाले लोगों के लाइसेंस बड़े पैमाने पर निरस्त हो सकते हैं।
