अंडमान गैस खोज: 5 जून 2026 की शाम, केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने एक ट्वीट किया और भारत के ऊर्जा मानचित्र पर एक नया बिंदु उभर आया। अंडमान द्वीप के पूर्वी तट से महज 15 किलोमीटर दूर, 355 मीटर गहरे समुद्र में, ऑयल इंडिया के खोजी कुएं ‘श्री विजयपुरम-3’ से प्राकृतिक गैस की निरंतर लौ उठी। यह महज एक तकनीकी उपलब्धि नहीं थी — यह उस देश के लिए एक जवाब था जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दशकों से मिडिल ईस्ट की ओर ताकता रहा है।
वह कुआँ जिसने इतिहास बदला
ऑयल इंडिया ने अंडमान के पूर्वी तट से लगभग 15 किलोमीटर दूर, 355 मीटर की जल-गहराई पर स्थित विजयपुरम-3 खोजी कुएं में प्राकृतिक गैस की मौजूदगी की पुष्टि की है। मंत्री पुरी के अनुसार, 1,900 मीटर से अधिक गहराई पर इओसीन संरचना में प्रारंभिक उत्पादन परीक्षण के दौरान निरंतर फ्लेयरिंग के ज़रिए गैस की उपस्थिति साबित हुई।
यह खोज अकेली नहीं है। यह उस क्षेत्र में ऑयल इंडिया द्वारा ड्रिल किए गए तीन में से दूसरा सफल गैस-वाला कुआँ है। इससे पहले सितंबर 2025 में विजयपुरम-2 में भी गैस मिली थी। तीन में से दो कुओं में हाइड्रोकार्बन — यह आँकड़ा किसी भी भूवैज्ञानिक के लिए उत्साहजनक है।
विजयपुरम-2 में मिले गैस के नमूनों को जहाज से काकीनाडा लाया गया और परीक्षण में पाया गया कि उसमें 87 प्रतिशत मीथेन है — यानी उच्च गुणवत्ता वाली प्राकृतिक गैस, जिसे सीधे घरेलू और औद्योगिक उपयोग के लिए तैयार किया जा सकता है।
समुद्र मंथन — एक दृष्टि, एक मिशन
15 अगस्त 2025 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी: “देश को विकसित बनाने के लिए हम अब ‘समुद्र मंथन’ की ओर बढ़ रहे हैं। हम समुद्र के भीतर तेल और गैस भंडार खोजने के लिए मिशन मोड में काम करना चाहते हैं और इसीलिए भारत ‘नेशनल डीप वॉटर एक्सप्लोरेशन मिशन’ शुरू करने जा रहा है। यह ऊर्जा स्वतंत्रता की दिशा में हमारी महत्वपूर्ण घोषणा है।”
विजयपुरम-3 की खोज उसी मिशन की पहली बड़ी कामयाबी है। मंत्री पुरी ने बताया कि यह खोज Petrobras, TotalEnergies, BP, Shell और ExxonMobil जैसी अग्रणी वैश्विक गहरे समुद्री अन्वेषण कंपनियों के साथ मिलकर भारत की ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत करेगी।
ऑयल इंडिया ने विजयपुरम-2 की खोज के बाद एक विस्तृत मूल्यांकन कार्यक्रम शुरू किया, जिसमें मौजूदा भूकंपीय डेटा का पुनर्प्रसंस्करण और लगभग 600 वर्ग किलोमीटर नए 3D भूकंपीय डेटा का संग्रह शामिल था। विज्ञान की भाषा में कहें तो कंपनी ने पहले नक्शा बनाया, फिर खजाना खोजा।
वह संकट जो इस खोज को और महत्वपूर्ण बनाता है
अंडमान की यह खबर एक खास भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि में आई है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।
भारत की कच्चे तेल का लगभग 45 प्रतिशत, प्राकृतिक गैस का 60 प्रतिशत और LPG आयात का 90 प्रतिशत से अधिक मिडिल ईस्ट से आता है। यह निर्भरता केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। प्राकृतिक गैस अमोनिया उत्पादन के लिए जरूरी है जो यूरिया और अन्य उर्वरकों का आधार है। भारत के लगभग 40 प्रतिशत उर्वरक आयात मिडिल ईस्ट से आते हैं — इसका मतलब है कि ऊर्जा संकट सीधे कृषि आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करता है।
वित्त वर्ष मार्च 2026 में भारत ने कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर 174.9 अरब डॉलर खर्च किए, जो उसके कुल आयात का 22 प्रतिशत था। यह रकम भारत के रक्षा बजट से लगभग तीन गुना अधिक है।
हर बड़े वैश्विक ऊर्जा झटके — चाहे 2003 का खाड़ी युद्ध हो, 2008 की तेल कीमतों की उछाल हो या अब मिडिल ईस्ट का संकट — ने भारत की एक ही कमजोरी उजागर की है: आयातित जीवाश्म ईंधन पर गहरी और स्थायी निर्भरता।
अंडमान क्यों है खास?
भूगर्भ वैज्ञानिक लंबे समय से अंडमान बेसिन को एक होनहार हाइड्रोकार्बन क्षेत्र मानते रहे हैं। उत्तर में म्यांमार से लेकर दक्षिण में इंडोनेशिया तक इस पूरी भूगर्भीय पट्टी में गैस की खोजें हुई हैं। भारत का यह मानना था कि अंडमान बेसिन भी इसी संभावना-समृद्ध पट्टी का हिस्सा है। विजयपुरम-2 और विजयपुरम-3 ने इस विश्वास को तथ्य में बदल दिया है।
हालाँकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह अभी केवल हाइड्रोकार्बन की उपस्थिति की पुष्टि है। बेसिन वास्तव में व्यावसायिक उत्पादन देगा या नहीं — यह अभी अनिश्चित है, और यदि देता भी है तो व्यावसायिक उपयोग में एक दशक तक का समय लग सकता है। यानी उत्साह जरूरी है, पर अतिउत्साह नहीं।
आगे की राह
उद्योग जगत के विशेषज्ञ अंडमान बेसिन को भारत के भविष्य के तेल और गैस अन्वेषण के सबसे आशाजनक क्षेत्रों में से एक मानने लगे हैं। ड्रिल किए गए तीन में से दो कुओं में हाइड्रोकार्बन की उपस्थिति ने बेसिन की अन्वेषण संभावनाओं को काफी बेहतर किया है।
भारत के प्राकृतिक गैस भंडार 2014 के 1,427 BCM से घटकर 2025 में 1,073 BCM रह गए हैं — लगभग 25 प्रतिशत की गिरावट। ऐसे में अंडमान जैसी खोजें न केवल प्रतीकात्मक हैं, बल्कि राष्ट्रीय ऊर्जा संतुलन के लिए रणनीतिक रूप से अनिवार्य भी हैं।
समुद्र मंथन का अर्थ
पौराणिक समुद्र मंथन में देवताओं और असुरों ने मिलकर सागर को मथा था — और उसमें से अमृत निकला था। आधुनिक भारत का ‘समुद्र मंथन मिशन’ उसी भावना का विज्ञान-सम्मत रूप है। अंडमान का गैस भंडार अभी अमृत नहीं है — वह उस यात्रा का पहला चरण है जो देश को ऊर्जा में आत्मनिर्भर बना सकती है।
मिडिल ईस्ट जब भी जलता है, भारत की अर्थव्यवस्था काँपती है। अंडमान की लहरों के नीचे जो गैस मिली है, वह उस काँपन को रोकने की दिशा में एक ठोस कदम है। यह खोज जितनी भूगर्भीय है, उतनी ही भू-राजनीतिक भी।
