इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से नकदी बरामद होने के करीब डेढ़ साल बाद इस मामले की जांच कर रही तीन-सदस्यीय संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट बुधवार को लोकसभा और राज्यसभा में पेश कर दी। 126 पन्नों की इस रिपोर्ट में समिति ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे तीनों आरोपों को सही और सिद्ध पाया है, हालांकि नकदी के मालिकाना हक को लेकर पुख्ता सबूत न होने की बात भी स्वीकार की है।
पूरा मामला शुरू कैसे हुआ
14 मार्च 2025 की होली की रात दिल्ली में जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर आग लग गई थी। मौके पर पहुंचे दमकलकर्मियों ने कथित तौर पर एक स्टोर रूम में नोटों की बड़ी मात्रा में अधजली गड्डियां बरामद कीं। यह घटना सामने आते ही न्यायपालिका में भूचाल आ गया और तत्कालीन दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय ने 25 पन्नों की एक शुरुआती जांच रिपोर्ट तैयार की, जिसमें बताया गया कि आग बुझाने के दौरान चार से पांच अर्ध-जली नोटों की गड्डियां मिलीं। इस रिपोर्ट को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक भी कर दिया था।
आंतरिक जांच समिति और इसके निष्कर्ष
घटना के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने 22 मार्च 2025 को तीन सदस्यीय आंतरिक जांच समिति गठित की, जिसमें पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की न्यायाधीश अनु शिवरामन शामिल थीं। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट 3 मई 2025 को CJI को सौंपी, जिसमें कहा गया कि जस्टिस वर्मा का उस विशेष स्टोर रूम पर ‘सक्रिय या मौन नियंत्रण’ था, जहां कथित तौर पर नकदी रखी गई थी। समिति ने प्रत्यक्ष व इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के आधार पर यह भी पाया कि उनके दो घरेलू सहायकों ने जली हुई नकदी को स्टोर रूम से हटाने में मदद की थी।
जस्टिस वर्मा ने शुरू से ही इन आरोपों से इनकार किया और इसे अपने खिलाफ एक साज़िश करार दिया। उन्होंने कहा था कि न तो उन्होंने और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य ने कभी उस स्टोर रूम में कोई नकदी रखी। हालांकि उनका यह स्पष्टीकरण समिति को संतोषजनक नहीं लगा, और CJI खन्ना ने उन्हें इस्तीफा देने या संवैधानिक हटाने की कार्रवाई का सामना करने के लिए कहा।
जस्टिस वर्मा के इस्तीफा देने से इनकार करने के बाद, CJI खन्ना ने रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेज दी — जो कि इस बात का संकेत माना गया कि उन्होंने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश कर दी है। इसके बाद जस्टिस वर्मा ने आंतरिक समिति के निष्कर्षों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी, लेकिन अगस्त 2025 में शीर्ष अदालत ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि आंतरिक जांच प्रक्रिया में हिस्सा लेने के बाद वे उसके निष्कर्षों को चुनौती नहीं दे सकते।
संसद में महाभियोग प्रस्ताव और वैधानिक जांच समिति
जुलाई 2025 में रविशंकर प्रसाद सहित सत्तापक्ष और विपक्ष के 200 से अधिक सांसदों ने जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संविधान के अनुच्छेद 124(4), 217 व 218 और जज (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3 के तहत यह प्रस्ताव स्वीकार करते हुए 12 अगस्त 2025 को आरोपों की जांच के लिए तीन-सदस्यीय वैधानिक न्यायिक जांच समिति गठित की।
इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अरविंद कुमार ने की, जबकि इसमें मद्रास हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश मनिंदर मोहन श्रीवास्तव और वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य भी शामिल थे। इस समिति ने पूरे मामले की गहन जांच करने के बाद अपनी रिपोर्ट मई 2026 में लोकसभा अध्यक्ष को सौंपी।
समिति ने क्या-क्या पाया
समिति ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे सभी तीन आरोपों को सही और सिद्ध पाया। रिपोर्ट के मुताबिक, वे अपने आवास के स्टोर रूम में मिली नकदी और उसके स्वामित्व को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहे, और उनका स्पष्टीकरण टालमटोल वाला व असंतोषजनक रहा। समिति ने यह भी कहा कि घटनास्थल से जुड़े अहम साक्ष्य संरक्षित नहीं किए गए, और आवास के स्टोर रूम में भी कुछ फेरबदल किया गया था।
हालांकि समिति ने इस बात पर ज़ोर दिया कि उसके पास इतने पुख्ता सबूत नहीं हैं जिनसे यह साबित हो सके कि बरामद नकदी सीधे तौर पर जस्टिस वर्मा की निजी संपत्ति थी। इसके बावजूद समिति ने उनके इस बचाव को खारिज कर दिया कि उन्हें नकदी की मौजूदगी की कोई जानकारी नहीं थी और वे उसके अंजाम के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। समिति की रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे प्रकरण के पीछे जस्टिस वर्मा के खिलाफ किसी सुनियोजित साज़िश का कोई सबूत नहीं मिला। साथ ही, नोटों के बंडल, उनके स्रोत और मालिकाना हक को लेकर स्पष्ट व संतोषजनक जवाब देने में भी वे नाकाम रहे। जांच में यह भी सामने आया कि स्टोर रूम से जुड़े साक्ष्यों को वैध तरीके से सील किए जाने से पहले उनके साथ छेड़छाड़ की गई थी, और बाद में कुछ नोट वहां से गायब भी मिले।
जस्टिस वर्मा का इस्तीफा और अब आगे क्या
महाभियोग के ज़रिए हटाए जाने की आशंका के बीच जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया, जिससे संसद में उनके खिलाफ चल रही महाभियोग की कार्यवाही औपचारिक रूप से निरर्थक (इनफ्रक्चुअस) हो गई। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के मुताबिक, जब कोई न्यायाधीश राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंप देता है और उसकी प्रति सार्वजनिक (परिचालित) कर देता है, तो उसे ‘इस्तीफा दे चुका’ माना जाता है — राष्ट्रपति की औपचारिक स्वीकृति ज़रूरी नहीं होती।
हालांकि सूत्रों के मुताबिक, चूंकि जस्टिस वर्मा का इस्तीफा हटाने की संसदीय प्रक्रिया शुरू होने के बाद भेजा गया था, इसलिए कानून मंत्रालय ने अब तक इसे औपचारिक रूप से अधिसूचित नहीं किया है। केंद्र सरकार शीतकालीन सत्र में महाभियोग प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर विचार कर सकती है, क्योंकि सूत्रों का कहना है कि सरकार एक मिसाल कायम करना चाहती है ताकि यह संदेश जाए कि गंभीर अनियमितताओं में शामिल कोई भी न्यायाधीश केवल इस्तीफा देकर हटाने की प्रक्रिया से बच नहीं सकता।
इस मामले की व्यापक अहमियत
विशेषज्ञों का मानना है कि समिति की रिपोर्ट में आरोप सिद्ध पाए जाने के बाद इस मामले का असर न्यायिक जवाबदेही और न्यायपालिका की संस्थागत पारदर्शिता को लेकर लंबे समय तक महसूस किया जाएगा। रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर भविष्य में किसी अन्य न्यायाधीश के खिलाफ वैधानिक अथवा जांच संबंधी कार्रवाई की संभावनाओं पर भी चर्चा हो सकती है — खासकर इस सवाल पर कि क्या कोई न्यायाधीश महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने के बाद इस्तीफा देकर उससे बच सकता है, या नहीं।
