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Home»राज्य»उत्तरप्रदेश»बाल श्रम मुक्त उत्तर प्रदेश की ओर सरकार की प्रतिबद्धता
उत्तरप्रदेश

बाल श्रम मुक्त उत्तर प्रदेश की ओर सरकार की प्रतिबद्धता

News DriftBy News DriftJune 12, 2026No Comments7 Mins Read
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बाल श्रम मुक्त उत्तर प्रदेश की ओर सरकार की प्रतिबद्धता
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बाल श्रम: आज 12 जून 2026 है — विश्व बाल श्रम निषेध दिवस। दुनिया भर में इस दिन करोड़ों बच्चों के अधिकार की आवाज़ उठती है जो स्कूल की बजाय कारखानों, ढाबों, ईंट भट्टियों और खेतों में अपनी उम्र से कहीं बड़े बोझ तले दबे हुए हैं। उत्तर प्रदेश — जो देश का सबसे बड़ा राज्य है — आज इस दिन पर अपने संकल्प को दोहरा रहा है: 2027 तक बाल श्रम मुक्त राज्य बनना।

यह सिर्फ एक सरकारी घोषणा नहीं है। यह उन लाखों बच्चों के सपनों की बात है जो कभी क्लासरूम की बेंच पर बैठने के काबिल थे, लेकिन तकदीर ने उन्हें कहीं और बिठा दिया।

उत्तर प्रदेश का झांसी बना मॉडल जिला :
उत्तर प्रदेश के झांसी जिले ने अपने सभी 496 गांवों को बाल श्रम मुक्त (No Child Labour) घोषित करने की ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है, जिससे यह उपलब्धि हासिल करने वाला राज्य का पहला जिला बन गया है।

  • जिला प्रशासन ने “हर बच्चा स्कूल में” अभियान चलाया। ड्रॉप-आउट बच्चों की पहचान के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर सर्वे किया गया। स्कूलों में “बाल श्रम मित्र शिक्षक” नियुक्त किए गए जो वापस आए बच्चों की विशेष देखभाल करते हैं।
  • NGO नेटवर्क जैसे कि Bachpan Bachao Andolan , परमार्थ समाज सेवी संस्थान, ब्रिटिश एशियन ट्रस्ट आदि गैर सरकारी संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और स्थानीय संगठनों ने जागरूकता अभियान चलाया।
  • गाँवों में चौपाल करके माता-पिता को समझाया गया कि बच्चे का स्कूल जाना भविष्य में परिवार की आय का सबसे बड़ा ज़रिया बनेगा।

सभी जिलों में टास्क फोर्स का गठन
बहराइच, बलरामपुर, श्रावस्ती, फतेहपुर, सिद्धार्थनगर, चित्रकूट, चंदौली, सोनभद्र, कानपुर नगर, कानपुर देहात, कन्नौज, फर्रुखाबाद, औरैया, इटावा और गोंडा जिलों में दिसंबर 2026 तक पूरी तरह बाल श्रम मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए सभी जिलों में टास्क फोर्स का गठन किया जा चुका है।

बाल श्रम क्या है?

बाल श्रम (Child Labour) वह काम है जो बच्चों से उनकी उम्र, शारीरिक क्षमता और शिक्षा के अधिकार की अनदेखी करते हुए कराया जाता है।

भारत के बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 (2016 में संशोधित) के अनुसार:

  • 14 वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे से किसी भी प्रकार का काम कराना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
  • 14 से 18 वर्ष के किशोरों को खतरनाक उद्योगों (जैसे खदान, पटाखा उद्योग, रसायन कारखाने) में काम कराना प्रतिबंधित है।

बाल श्रम के प्रमुख स्वरूप

प्रकार उदाहरण
घरेलू श्रम घर में नौकर, बर्तन साफ़ करना
खतरनाक उद्योग पटाखा, बीड़ी, माचिस, कांच उद्योग
कृषि श्रम खेतों में काम, चाय बागान
ईंट भट्टी ईंट ढोना, आग के पास काम
होटल-ढाबा प्लेट उठाना, बर्तन धोना
बंधुआ श्रम कर्ज़ के बदले बच्चे को काम पर लगाना

भारत में बाल श्रम की स्थिति — एक चिंताजनक तस्वीर

भारत आज भी बाल श्रम की समस्या से जूझ रहा है। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े हैं:

2011 की जनगणना के अनुसार, 5 से 14 वर्ष की आयु के कुल 25.96 करोड़ बच्चों में से लगभग 1.01 करोड़ बच्चे बाल श्रमिक के रूप में दर्ज थे — यानी हर 25 बच्चों में से 1 बच्चा काम कर रहा था। हालाँकि 2001 से 2011 के बीच यह संख्या 26 लाख कम हुई, लेकिन शहरी क्षेत्रों में बाल श्रम बढ़ता रहा।

ILO (अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन) के अनुसार, भारत में 4.27 करोड़ से अधिक बच्चे अभी भी स्कूल से बाहर हैं — जो उन्हें बाल श्रम के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाता है।

2024-25 में देशभर में 53,000 से अधिक बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराया गया — जो पिछले वर्षों की तुलना में एक बड़ी छलांग है।

भारत में बाल श्रम के लिए क़ानून और नियम

1. बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 (CLPRA)

2016 में संशोधित इस अधिनियम में:

  • 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से किसी भी काम पर पूर्ण प्रतिबंध
  • उल्लंघन पर 6 महीने से 2 वर्ष तक की जेल और 20,000 से 50,000 रुपये जुर्माना
  • 14-18 वर्ष के किशोरों को 18 खतरनाक उद्योगों में काम पर प्रतिबंध

2. शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE)

6 से 14 वर्ष के हर बच्चे को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का संवैधानिक अधिकार।

3. बंधुआ मज़दूर उन्मूलन अधिनियम, 1976

बच्चों सहित किसी भी व्यक्ति को कर्ज़ के बदले बंधक बनाकर काम कराने पर सख़्त दंड।

4. संविधान के अनुच्छेद 24

14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को खदानों, कारखानों और खतरनाक नौकरियों में काम पर लगाना संविधान की मूल भावना के विरुद्ध।

5. POCSO अधिनियम, 2012

बच्चों के यौन शोषण के खिलाफ, जिसमें बाल तस्करी के मामले भी आते हैं।

उत्तर प्रदेश का “बाल श्रम मुक्त” अभियान — 2026 की राह पर

उत्तर प्रदेश सरकार ने 2027 तक राज्य को बाल श्रम मुक्त बनाने का लक्ष्य तय किया है। इस दिशा में कई ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।

पहला चरण: दिसंबर 2026 तक 10 क्षेत्र

पहले चरण में 8 अति-संवेदनशील जिलों — बहराइच, बलरामपुर, चंदौली, चित्रकूट, फतेहपुर, श्रावस्ती, सिद्धार्थनगर और सोनभद्र — के साथ कानपुर और देवीपाटन मंडल को दिसंबर 2026 तक बाल श्रम मुक्त घोषित करने का लक्ष्य है।

बाल श्रमिक विद्या योजना:

यह योजना सभी 75 जिलों में लागू की जा रही है। इसके तहत बचाए गए बच्चों को स्कूल वापस लाने के लिए छात्रवृत्ति, किताबें और यूनिफ़ॉर्म दी जाती है।

वन स्टॉप सेंटर :

बचाए गए बच्चों के लिए तत्काल राहत केंद्र — आश्रय, चिकित्सा, काउंसलिंग और पुनः समाज में मिलाने की सुविधा।

तकनीकी निगरानी

बाल श्रम की निगरानी के लिए नया ऐप और सॉफ्टवेयर विकसित किया जा रहा है। UNICEF मंडल स्तरीय कार्यशालाओं में सहयोग कर रहा है।

बहु-विभागीय समन्वय

शिक्षा, पंचायती राज, महिला कल्याण, स्वास्थ्य, समाज कल्याण और कौशल विकास विभाग मिलकर काम कर रहे हैं। पंचायत स्तर पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, ग्राम सचिव और स्कूल प्रबंधन समिति बच्चों की पहचान में जुटी हैं।

अब तक की उपलब्धियाँ (2017–2025)

  • 12,426 बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कर शिक्षा में वापस लाया गया
  • 10,336 बाल श्रमिक पहचाने गए (चालू अभियान में)
  • 1,408 बंधुआ मज़दूरों का पुनर्वास, साथ में ₹18.17 करोड़ की सहायता
  • 1,089 आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवारों को सहायता — ताकि वे अपने बच्चों को काम पर न भेजें
  • श्रम कल्याण परिषद के ₹40 करोड़ के कोष से संगठित क्षेत्र के 309 मज़दूरों को ₹1.32 करोड़ की राहत

आगे की राह — क्या करना बाकी है?

  • उत्तर प्रदेश ने यात्रा शुरू की है, लेकिन मंज़िल अभी दूर है। कुछ बड़ी चुनौतियाँ अभी भी बाकी हैं:
  • डेटा की कमी – बहुत से बच्चे अभी भी अदृश्य हैं, खासकर घरेलू काम में लगे बच्चे।
  • पुनः श्रम में जाने का खतरा – कई बचाए गए बच्चे आर्थिक दबाव में फिर से काम पर लौट जाते हैं।
  • प्रवासन – दूसरे राज्यों से आए प्रवासी बच्चे सबसे कमज़ोर हैं।
  • जागरूकता – ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी कई लोग नहीं जानते कि बाल श्रम क़ानूनन अपराध है।
  • शहरी क्षेत्र : ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में इसे समाप्त करना एक बड़ी चुनौती है , झांसी में भी अभी शहरी बाद श्रम का उन्मूलन नहीं हो सका है।

2 जून 2026 — यह दिन सिर्फ एक औपचारिक दिवस नहीं है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हर बच्चे का बचपन उसका अधिकार है — खेलना, पढ़ना, हँसना और सपने देखना।

उत्तर प्रदेश सरकार का 2027 का संकल्प सराहनीय है। झाँसी जैसे जिले यह साबित कर रहे हैं कि जब सरकार, समाज और नागरिक मिलकर काम करें तो बदलाव संभव है।

लेकिन असली सफलता तब मानी जाएगी जब उत्तर प्रदेश का आखिरी बच्चा भी ईंट की जगह किताब थामे, और भट्टी की गर्मी की जगह उसके चेहरे पर सीखने की रोशनी हो।


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