Lucknow: राजधानी के ग्रामीण इलाकों में बुनियादी समस्याओं और प्रशासनिक उपेक्षा को लेकर किसानों का गुस्सा एक बार फिर सड़कों पर देखने को मिला। शनिवार को बख्शी का तालाब (बीकेटी) तहसील रोड पर सैकड़ों की संख्या में जुटे किसानों ने अनिश्चितकालीन ‘महापड़ाव’ डालते हुए चक्का जाम कर दिया। इस विरोध प्रदर्शन के कारण न सिर्फ बीकेटी बल्कि इससे जुड़ने वाले कई प्रमुख मार्गों पर यातायात की रफ्तार थम गई। ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और बैनर-पोस्टरों के साथ सड़क पर बैठे किसानों के इस कदम से स्थानीय प्रशासन और पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है।
चक्का जाम: थमी रफ्तार, राहगीर बेहाल
किसानों के अचानक सड़क पर बैठ जाने से बीकेटी तहसील मार्ग और आसपास के इलाकों में देखते ही देखते वाहनों की कई किलोमीटर लंबी कतारें लग गईं।
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प्रभावित वर्ग: इस जाम का सबसे बुरा असर स्कूली बच्चों, एम्बुलेंस, दैनिक यात्रियों और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने वाले वाहनों पर पड़ा।
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रूट डायवर्जन: स्थिति की गंभीरता को देखते हुए यातायात पुलिस को तुरंत हरकत में आना पड़ा। प्रशासन ने मुख्य मार्ग पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए कई जगह रूट डायवर्जन लागू किया और आम जनता से वैकल्पिक मार्गों (लिंक रोड) का उपयोग करने की अपील की।
किसानों की मांगें: क्यों उग्र हुआ आंदोलन?
इस महापड़ाव का नेतृत्व कर रहे किसान नेताओं का आरोप है कि स्थानीय प्रशासन को कई बार लिखित शिकायतें देने के बावजूद उनकी मांगों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। किसानों के इस आक्रोश के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. सरकारी जमीनों और चकमार्गों पर अवैध कब्जे
किसानों का सबसे बड़ा आरोप भू-माफियाओं और स्थानीय रसूखदारों पर है। उनका कहना है कि बीकेटी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सरकारी चकमार्गों और ग्राम समाज की जमीनों (चारागाह, तालाब आदि) पर अवैध निर्माण और कब्जे हो चुके हैं। इसके कारण किसानों को अपने खेतों तक जाने में भारी परेशानी होती है। राजस्व विभाग की ढीली कार्रवाई से नाराज किसानों ने इसे भ्रष्टाचार और प्रशासनिक मिलीभगत का नतीजा बताया है।
2. बिजली संकट और सिंचाई की किल्लत
खेती-किसानी के सीजन में ग्रामीण क्षेत्रों में अघोषित बिजली कटौती ने किसानों की कमर तोड़ दी है। ट्यूबवेल चलाने के लिए पर्याप्त बिजली नहीं मिल रही है। इसके साथ ही, सिंचाई विभाग की लापरवाही के कारण नहरों के अंतिम छोर तक पानी नहीं पहुंच पा रहा है, जिससे फसलें सूखने की कगार पर हैं।
3. प्रशासनिक उदासीनता और जनसुनवाई का अभाव
किसानों ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि ‘तहसील दिवस’ (सम्पूर्ण समाधान दिवस) महज एक औपचारिकता बनकर रह गया है। शिकायतों का निस्तारण केवल कागजों पर हो रहा है, जमीनी स्तर पर किसान आज भी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
प्रशासन की कवायद और सुरक्षा व्यवस्था
जैसे ही चक्का जाम और महापड़ाव की सूचना मुख्यालय पहुंची, बीकेटी के सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) भारी पुलिस बल, प्रांतीय रक्षक दल (PRD) के जवानों और पीएसी (PAC) की टुकड़ियों के साथ मौके पर पहुंचे।
“कानून-व्यवस्था को हाथ में लेने की इजाजत किसी को नहीं है। हम किसानों के प्रतिनिधियों से लगातार बातचीत कर रहे हैं। हमारा प्रयास है कि शांतिपूर्ण ढंग से उनकी जायज मांगों का समाधान निकाला जाए और यातायात को जल्द से जल्द सुचारू किया जाए।” — स्थानीय पुलिस प्रशासन
राजस्व अधिकारियों और पुलिस ने किसान नेताओं के साथ कई दौर की वार्ता की, लेकिन किसान किसी भी खोखले आश्वासन पर उठने को तैयार नहीं दिखे। किसान नेताओं ने साफ कर दिया है कि जब तक संबंधित विभागों (राजस्व, बिजली और सिंचाई) के उच्च अधिकारी मौके पर आकर ठोस और समयबद्ध कार्रवाई का लिखित भरोसा नहीं देते, तब तक यह महापड़ाव जारी रहेगा।
आखिर क्यों बार-बार बनते हैं ऐसे हालात?
बीकेटी में हुआ यह प्रदर्शन कोई एकलौती घटना नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण विकास और प्रशासनिक तंत्र के बीच की खाई को दर्शाता है:
