UPPCS Exam System: उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPCS) की परीक्षाओं को राज्य की सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवा का प्रवेश द्वार माना जाता है। हर साल लाखों युवा इस उम्मीद में दिन-रात एक करते हैं कि वे कल के नीति-निर्माता बनेंगे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आयोग के प्रशासनिक फैसलों—चाहे वह प्रारंभिक परीक्षा के केंद्रों का आवंटन हो, प्रश्नों की त्रुटियां हों, या मुख्य परीक्षा के केंद्रों की अव्यावहारिक नीति हो—ने अभ्यर्थियों को एक ऐसे चक्रव्यूह में धकेल दिया है जहाँ कई अभ्यर्थियों का मानना है कि परीक्षा प्रक्रिया से जुड़ी चुनौतियाँ उनकी तैयारी पर अतिरिक्त दबाव डालती हैं।
प्रारंभिक परीक्षा: दूर-दराज के केंद्र और ‘भ्रमित’ उत्तर कुंजी का दंश:
सेंटर आवंटन की अव्यावहारिकता
प्रारंभिक परीक्षा में लाखों की भीड़ को नियंत्रित करने के नाम पर अभ्यर्थियों के परीक्षा केंद्र गृह जनपद से 300 से 500 किलोमीटर दूर भेज दिए जाते हैं। परिवहन की बदहाली, ट्रेनों में पैर रखने की जगह न होना और परीक्षा की सुबह तक पहुंचने की जद्दोजहद में अभ्यर्थियों के लिए अतिरिक्त मानसिक और शारीरिक दबाव पैदा होता है।
त्रुटिपूर्ण प्रश्न और ‘गोपनीय’ संसोधित उत्तर कुंजी
सबसे बड़ा नीतिगत सवाल यह है कि विशेषज्ञों की उच्च-स्तरीय कमेटियों के बावजूद हर बार प्रारंभिक परीक्षा के प्रश्नपत्रों में गंभीर गलतियां क्यों होती हैं?
पारदर्शिता का अभाव: परीक्षा के बाद आपत्तियां तो मांगी जाती हैं, लेकिन ‘संशोधित उत्तर कुंजी’ (Revised Answer Key) को परिणाम से पहले या उसके साथ सार्वजनिक नहीं किया जाता।
संशय का माहौल: जब अभ्यर्थी को यह पता ही नहीं चलता कि आयोग ने किस प्रश्न को हटाया या किसका उत्तर बदला, तो पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया पर एक अदृश्य संशय खड़ा हो जाता है। यह सूचना के अधिकार (RTI) और सुशासन के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत है।
मुख्य परीक्षा का संकट: जहां नकल की गुंजाइश नहीं, वहां प्रशासनिक प्रताड़ना क्यों?:
मुख्य परीक्षा (Mains) में केवल गिने-चुने अभ्यर्थी (पदों के मुकाबले 13 गुना) ही शामिल होते हैं। यह परीक्षा पूरी तरह वर्णनात्मक (Descriptive) होती है, जहां कड़ी सुरक्षा के बीच कॉपियां लिखनी होती हैं। यहाँ प्रारंभिक परीक्षा की तरह सामूहिक नकल या ओएमआर (OMR) बदलने जैसी विकृतियों की संभावना लगभग शून्य होती है। इसके बावजूद मुख्य परीक्षा के केंद्र सीमित जिलों में बनाकर अभ्यर्थियों को मजबूर किया जाता है।
6-7 दिनों का मानसिक और आर्थिक निर्वासन
मुख्य परीक्षा एक या दो दिन में खत्म नहीं होती। यह लगातार 5 से 7 दिनों तक चलने वाली एक सघन प्रक्रिया है।
आर्थिक शोषण का चक्र: दूसरे शहर में 7 दिन रुकने का मतलब है—होटलों और लॉज के मनमाने दाम। परीक्षा के सीजन में कमरों के रेट आसमान छूने लगते हैं।
मानसिक दबाव: एक मध्यमवर्गीय या ग्रामीण पृष्ठभूमि का अभ्यर्थी, जो पहले से ही कोचिंग और किताबों के कर्ज तले दबा है, वह परीक्षा के ऐन वक्त पर रहने, खाने और आने-जाने के आर्थिक तनाव से जूझता है। क्या प्रशासनिक विफलता को छिपाने के लिए छात्रों को यह ‘आर्थिक दंड’ देना न्यायसंगत है?
प्रशासनिक विफलता या छात्रों की परेशानी: असली सवाल क्या है?
आयोग का तर्क होता है कि परीक्षा की शुचिता और नकल माफिया को रोकने के लिए कड़े कदम और दूर के केंद्र जरूरी हैं। लेकिन सुशासन के नजरिए से यह तर्क दोषपूर्ण है:
“यदि राज्य का आधुनिक प्रशासनिक तंत्र, एसटीएफ (STF) और डिजिटल निगरानी तंत्र मिलकर भी अपने ही जिलों में नकल विहीन परीक्षा आयोजित नहीं करा पा रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता है। इस विफलता की सजा उन अभ्यर्थियों को क्यों दी जा रही है जो ईमानदारी से तैयारी कर रहे हैं?”
पारदर्शिता और कड़े नियम स्वागत योग्य हैं, लेकिन वे ‘कल्याणकारी और छात्र-हितैषी’ होने चाहिए, न कि उनके लिए प्रताड़ना का सबब।
हालिया विवाद: प्राप्तांकों और कॉपियों के मूल्यांकन पर गहराता संशय:
हाल ही में 2024 की मुख्य परीक्षा के अंकपत्र को लेकर अभ्यर्थियों के बीच जो संशय और चिंता की लहर दौड़ी है, उसने आग में घी का काम किया है। जब मेधावी छात्रों को उम्मीद के मुताबिक अंक नहीं मिलते या प्रक्रिया में अस्पष्टता दिखती है, तो युवाओं का उस पूरी संस्था से भरोसा डगमगाने लगता है जिस पर राज्य के भविष्य की जिम्मेदारी है।
निष्कर्ष और सुधारात्मक रोडमैप :
यदि आयोग वास्तव में उत्तर प्रदेश के अंतिम युवा तक न्याय पहुंचाना चाहता है, तो उसे अपनी व्यवस्था में निम्नलिखित तीन क्रांतिकारी सुधार तुरंत करने होंगे:
संशोधित उत्तर कुंजी अनिवार्य रूप से जारी हो: प्रारंभिक परीक्षा के परिणाम के साथ ही प्रत्येक छात्र को यह जानने का हक है कि किस प्रश्न पर क्या निर्णय लिया गया।
मुख्य परीक्षा के केंद्रों का विकेंद्रीकरण: संभागीय स्तर या कम से कम परीक्षार्थियों की संख्या के आधार पर नजदीकी सुरक्षित जिलों में मुख्य परीक्षा केंद्र बनाए जाएं, ताकि 7 दिनों का आर्थिक शोषण रुके।
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आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए परिवहन व आवास व्यवस्था: यदि केंद्र दूर भेजना मजबूरी भी हो, तो रोडवेज बसों में मुफ्त यात्रा और परीक्षा वाले शहरों में सरकारी भवनों/कम्युनिटी हॉलों में छात्रों के रुकने की रियायती व्यवस्था प्रशासन को स्वयं करनी चाहिए।
आखिरी शब्द: परीक्षा की शुचिता केवल केंद्रों को दूर भेजने या पारदर्शिता के अभाव से नहीं आती; वह प्रशासनिक पारदर्शिता, त्रुटिहीन प्रश्नपत्रों और छात्रों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण से आती है। उम्मीद है कि आयोग और शासन इस अदृश्य युवा संकट को गंभीरता से समझेंगे।
