झारखंड में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं का गुस्सा आखिरकार सरकार को सुनना पड़ा। करीब 16 दिनों से चल रहे छात्र आंदोलन के बीच राज्य सरकार ने तीन JPSC परीक्षाओं को रद्द करने पर सहमति जताई है। हालांकि, आंदोलन अभी खत्म नहीं हुआ है। JSSC-CGL परीक्षा को रद्द करने और कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच की मांग पर छात्र अब भी अड़े हुए हैं।
रविवार को छात्र प्रतिनिधियों और सरकार के बीच करीब छह घंटे तक बातचीत चली। इसके बाद सरकार ने JPSC बैकलॉग 2023, JPSC बैकलॉग 2025 और 14वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा को रद्द करने पर सहमति जताई।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब परीक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर छात्रों का भरोसा लगातार सवालों के घेरे में है।
सवाल उठे तो JPSC के तीन सदस्यों ने भी दिया इस्तीफा
छात्र आंदोलन के बीच JPSC के तीन सदस्यों अजीता भट्टाचार्य, अनिमा हांसदा और जमाल अहमद ने इस्तीफा दे दिया। राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने इन इस्तीफों को स्वीकार कर लिया है।
एक तरफ सरकार परीक्षा व्यवस्था में सुधार और पारदर्शिता की बात कर रही है, दूसरी तरफ आयोग के सदस्यों के इस्तीफे ने पूरी प्रक्रिया पर स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े कर दिए हैं।
आखिर वह कौन-सी परिस्थितियां थीं, जिनमें एक के बाद एक परीक्षाओं को रद्द करने की नौबत आई?
यह सवाल अब केवल आंदोलन कर रहे छात्रों का नहीं, बल्कि उन लाखों अभ्यर्थियों का है जो वर्षों तक तैयारी करके एक सरकारी नौकरी की उम्मीद में परीक्षा देते हैं।
JSSC-CGL पर सरकार और छात्रों के बीच टकराव जारी
तीन परीक्षाओं को रद्द करने पर सहमति बनने के बावजूद सबसे बड़ा गतिरोध JSSC-CGL को लेकर है।
छात्र इस परीक्षा को भी रद्द करने की मांग कर रहे हैं। सरकार ने इसके लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय न्यायिक जांच समिति बनाने का प्रस्ताव दिया है।
सरकार का तर्क है कि CGL की प्रक्रिया न्यायालयों की निगरानी में हुई थी और कई अभ्यर्थी नियुक्त होकर काम भी शुरू कर चुके हैं। ऐसे में पूरी परीक्षा रद्द करने का फैसला कानूनी चुनौती का सामना कर सकता है।
लेकिन छात्रों का सवाल सीधा है—अगर परीक्षा प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं तो सिर्फ जांच से उनका भरोसा कैसे लौटेगा?
जांच के वादे से आगे बढ़ेगा मामला या फिर मामला दब जाएगा?
छात्रों के अनुसार सरकार ने आपराधिक पहलुओं की जांच CID और आर्थिक पहलुओं की जांच ED से कराने की बात कही है। साथ ही परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए नई SOP तैयार करने और छात्रों से सुझाव लेने की बात भी सामने आई है।
छात्र संगठन निजी परीक्षा एजेंसी TDPL से जुड़ी परीक्षाओं की भी जांच की मांग कर रहे हैं।
यही वह बिंदु है जहां सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—सिर्फ परीक्षा रद्द करना समाधान है या यह पता लगाना भी जरूरी है कि गड़बड़ी हुई तो कैसे हुई, किसकी जिम्मेदारी थी और उसके लिए कौन जवाबदेह है?
छात्र बोले—CBI जांच के बिना आंदोलन खत्म नहीं होगा
छात्र नेताओं का कहना है कि उनकी कई मांगें सरकार ने मान ली हैं, लेकिन वे CBI जांच की मांग से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। सोमवार को विधानसभा तक मार्च का ऐलान भी किया गया है।
यानी सरकार ने आंदोलन को खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम जरूर उठाया है, लेकिन छात्रों का भरोसा अभी वापस नहीं आया है।
मुख्यमंत्री का संवाद का भरोसा
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आंदोलनरत युवाओं को न्याय का भरोसा दिया है और संवाद को समस्या के समाधान का रास्ता बताया है।
लेकिन अब असली परीक्षा सरकार की है।
सरकारी नौकरी की परीक्षा सिर्फ एक परीक्षा नहीं होती। इसके पीछे किसी युवा के कई साल की मेहनत, परिवार की उम्मीद और भविष्य का सवाल जुड़ा होता है। परीक्षा रद्द होने का मतलब सिर्फ एक नया पेपर नहीं, बल्कि हजारों-लाखों युवाओं के लिए महीनों और वर्षों की तैयारी फिर से शुरू करना भी है।
इसलिए बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार अब ऐसी व्यवस्था बना पाएगी जिसमें परीक्षा हो तो उस पर सवाल न उठें, परिणाम आए तो अभ्यर्थियों को अदालत का दरवाजा न खटखटाना पड़े और नौकरी मिले तो उसकी निष्पक्षता पर संदेह न हो?
झारखंड सरकार के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यही है—परीक्षा रद्द करने से ज्यादा जरूरी है परीक्षा व्यवस्था पर खोया हुआ भरोसा वापस लाना।
