सिविल जज बनने की तैयारी कर रहे कानून स्नातकों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक सेवा भर्ती के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अदालत ने प्रवेश स्तर की न्यायिक सेवा यानी सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की परीक्षा में शामिल होने के लिए जरूरी तीन साल की वकालत के अनुभव को घटाकर अब एक साल कर दिया है। हालांकि अदालत ने यह साफ रखा है कि न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों के लिए व्यावहारिक अनुभव जरूरी है। इसी वजह से चयन के बाद एक साल की न्यायिक अकादमी ट्रेनिंग और एक साल की संरचित लॉ क्लर्कशिप की व्यवस्था की गई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की तीन सदस्यीय पीठ ने 21 अगस्त 2026 को यह फैसला 2:1 के बहुमत से सुनाया। अदालत ने मई 2025 के अपने उस फैसले की समीक्षा से इनकार किया, जिसमें प्रवेश स्तर की न्यायिक सेवा परीक्षा के लिए तीन साल की वकालत को अनिवार्य किया गया था। हालांकि, बहुमत ने उस व्यवस्था में बदलाव करते हुए तीन साल की जगह एक साल की वास्तविक वकालत और चयन के बाद प्रशिक्षण-क्लर्कशिप का नया मॉडल तय किया है।
31 मार्च 2027 तक बिना वकालत अनुभव के भी आवेदन
इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा उन कानून स्नातकों को मिलेगा, जो तीन साल की वकालत पूरी नहीं कर पाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने संक्रमण अवधि के तहत 20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 तक जारी होने वाली न्यायिक सेवा भर्ती अधिसूचनाओं में उम्मीदवारों को पूर्व वकालत अनुभव की शर्त से छूट दी है।
इसका मतलब है कि इस अवधि में कानून स्नातक बिना तीन साल की वकालत पूरी किए न्यायिक सेवा परीक्षा के लिए आवेदन कर सकेंगे। अदालत ने ऐसे उम्मीदवारों को आवेदन के उद्देश्य से एक साल की सक्रिय वकालत पूरी मानने की व्यवस्था की है और इसके लिए अलग से वकालत प्रमाणपत्र देने की जरूरत नहीं होगी।
हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि चयन के बाद उम्मीदवार सीधे अदालत में जज की कुर्सी संभाल लेंगे। चयनित अभ्यर्थियों को पहले प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी के रूप में निर्धारित प्रशिक्षण से गुजरना होगा।
चयन के बाद दो साल का प्रशिक्षण और क्लर्कशिप
नई व्यवस्था में चयनित उम्मीदवारों के लिए एक साल की गहन ट्रेनिंग संबंधित राज्य की न्यायिक अकादमी में होगी। इस दौरान उन्हें न्यायालय की कार्यप्रणाली, न्यायिक प्रक्रिया और जज के रूप में आवश्यक व्यावहारिक कौशल से परिचित कराया जाएगा।
इसके बाद उन्हें एक साल की संरचित लॉ क्लर्कशिप करनी होगी। इसके पहले छह महीने प्रधान जिला न्यायाधीश या उच्चतर न्यायिक सेवा के किसी सदस्य की निगरानी में और अगले छह महीने संबंधित हाईकोर्ट के कार्यरत न्यायाधीश की देखरेख में काम करना होगा।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि न्यायिक सेवा में आने वाले युवा अधिकारियों को केवल कानून की किताबों का ज्ञान न हो, बल्कि उन्हें अदालत में होने वाली वास्तविक कार्यवाही, मामलों की तैयारी, दलीलों के परीक्षण और न्यायिक निर्णय प्रक्रिया की भी व्यावहारिक समझ हो।
ट्रेनिंग के दौरान मिलेगा भुगतान
सुप्रीम कोर्ट ने प्रशिक्षण अवधि के दौरान चयनित उम्मीदवारों के लिए भुगतान की भी व्यवस्था की है। न्यायिक अकादमी में प्रशिक्षण के दौरान उन्हें प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट को मिलने वाले सकल पारिश्रमिक के आधे के बराबर राशि दी जाएगी। लॉ क्लर्कशिप के दौरान भी प्रशिक्षण अवधि के अनुरूप पारिश्रमिक मिलेगा।
क्लर्कशिप पूरी होने के बाद संबंधित हाईकोर्ट के जिस न्यायाधीश की निगरानी में उम्मीदवार ने काम किया होगा, वह उसकी प्रगति और न्यायिक सेवा के लिए उपयुक्तता को लेकर मूल्यांकन रिपोर्ट देगा। संतोषजनक मूल्यांकन के बाद ही उम्मीदवार को नियमित न्यायिक सेवा में नियुक्त किया जाएगा।
1 अप्रैल 2027 के बाद क्या बदलेगा?
संक्रमण अवधि खत्म होने के बाद यानी 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) परीक्षा में बैठने के लिए उम्मीदवार के पास कम से कम एक साल की वास्तविक वकालत का अनुभव होना जरूरी होगा।
इस अनुभव की बाकायदा पुष्टि की जाएगी। उम्मीदवार को ऐसा प्रमाणपत्र देना होगा, जिससे यह साबित हो सके कि उसने वास्तव में अदालत में प्रभावी न्यायिक कार्यवाही में हिस्सा लिया है। यानी केवल कागजों पर वकील के रूप में पंजीकरण होना पर्याप्त नहीं होगा।
इसके बाद चयनित उम्मीदवारों के लिए एक साल की न्यायिक अकादमी ट्रेनिंग और एक साल की संरचित लॉ क्लर्कशिप की व्यवस्था जारी रहेगी।
आखिर 3 साल की शर्त क्यों बदली गई?
सुप्रीम कोर्ट ने मई 2025 में तीन साल की वकालत को अनिवार्य करते हुए कहा था कि न्यायिक अधिकारी के लिए केवल कानून की पढ़ाई पर्याप्त नहीं है। अदालत की कार्यप्रणाली, न्यायिक प्रक्रिया और कोर्ट के वातावरण का व्यावहारिक अनुभव भी जरूरी है।
लेकिन तीन साल की शर्त अचानक लागू होने से बड़ी संख्या में युवा कानून स्नातक और नए वकील प्रभावित हुए। अदालत के सामने यह भी सवाल आया कि क्या तीन साल की पारंपरिक वकालत ही न्यायिक अनुभव हासिल करने का एकमात्र रास्ता है।
अब बहुमत ने माना है कि व्यावहारिक अनुभव जरूरी है, लेकिन इसे केवल तीन साल की पारंपरिक वकालत तक सीमित रखना जरूरी नहीं है। वास्तविक वकालत के साथ न्यायिक अकादमी में प्रशिक्षण और न्यायाधीशों की निगरानी में लॉ क्लर्कशिप भी उम्मीदवार को जरूरी व्यावहारिक अनुभव दे सकती है।
2002 से चली आ रही व्यवस्था में फिर बदलाव
न्यायिक सेवा में सीधी भर्ती के नियमों को लेकर यह बदलाव अचानक नहीं आया है। वर्ष 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने नए कानून स्नातकों को बिना पूर्व वकालत अनुभव के न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी थी। इसके बाद करीब दो दशक तक बिना अनिवार्य वकालत अनुभव के प्रवेश की व्यवस्था बनी रही।
फिर 20 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल की वकालत को अनिवार्य कर दिया। इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल हुईं। अब अदालत ने मूल फैसले के उस सिद्धांत को बरकरार रखा है कि न्यायिक सेवा में आने से पहले उम्मीदवार को अदालत और कानूनी पेशे का व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए, लेकिन तीन साल की अनिवार्यता को घटाकर एक साल कर दिया है।
नए कानून स्नातकों के लिए क्या मायने रखता है?
इस फैसले से न्यायिक सेवा की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए रास्ता निश्चित रूप से आसान हुआ है। खासकर 31 मार्च 2027 तक जारी होने वाली भर्तियों में तीन साल की वकालत पूरी करने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
लेकिन अदालत ने साथ ही यह भी सुनिश्चित किया है कि न्यायिक सेवा में प्रवेश केवल लिखित परीक्षा और चयन तक सीमित न रहे। प्रशिक्षण और क्लर्कशिप के जरिए उम्मीदवारों को अदालत की वास्तविक कार्यप्रणाली समझने का अवसर मिलेगा।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ युवा कानून स्नातकों के लिए प्रवेश की बाधा कम की है, तो दूसरी तरफ न्यायिक सेवा की गुणवत्ता और व्यावहारिक अनुभव की जरूरत को भी बनाए रखा है। नई व्यवस्था की प्रभावशीलता का मूल्यांकन आगे किया जाएगा और अदालत ने योजना को पांच साल तक लागू रखने के बाद उसके परिणामों की समीक्षा की संभावना भी रखी है।
