भारत इस साल सर्दियों में दुनिया का पहला जीन-एडिटेड (जीनोम-संपादित) चावल उगाने जा रहा है। फिलहाल यह बुवाई बीज गुणन यानी सीड मल्टीप्लिकेशन के मकसद से की जाएगी, ताकि आने वाले वर्षों में देशभर के किसानों तक पर्याप्त मात्रा में प्रमाणित बीज पहुंचाए जा सकें। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव घटाकर खेती को ज़्यादा टिकाऊ बनाने में मदद करेगी — और इसी वजह से इसे “दूसरी हरित क्रांति” की शुरुआत बताया जा रहा है।
इस उपलब्धि का महत्व क्या है
आगामी रबी सीजन में पूसा डीएसटी राइस-1 की बुवाई से इस जीन-एडिटेड किस्म का बड़े पैमाने पर बीज गुणन संभव होगा, जिससे 2027 के खरीफ सीजन में इसकी व्यापक बुवाई की तैयारी हो सकेगी। इसके अलावा दिसंबर 2026 से शुरू होने वाले रबी सीजन में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी जैसे राज्यों में उपलब्ध बीजों के साथ खेत-प्रदर्शन (ऑन-फार्म डेमो) भी किए जा सकेंगे। ये वे इलाके हैं जहां इस किस्म की मूल प्रजाति एमटीयू-1010 पहले से व्यापक रूप से उगाई जाती है और जलवायु व मिट्टी के हिसाब से अच्छी तरह ढली हुई है।
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) द्वारा विकसित पूसा डीएसटी राइस-1 समुद्र-तटीय और भीतरी दोनों क्षेत्रों में लवणता (सैलिनिटी) और क्षारीयता (एल्कलिनिटी) के प्रति उच्च सहनशीलता रखता है, और सबसे ज़्यादा तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी यह पारंपरिक किस्मों के मुकाबले 10 से 30 प्रतिशत तक अधिक पैदावार दे सकता है।
जीनोम-एडिटिंग तकनीक आखिर है क्या
जीनोम एडिटिंग एक आधुनिक पादप प्रजनन तकनीक है, जिसके ज़रिए पौधे के अपने प्राकृतिक जीन में सटीक और लक्षित बदलाव किए जाते हैं — जैसे किसी खास जीन को हटाना, जोड़ना या बदलना — ताकि उपज बढ़े, कीट-रोगों से बचाव हो, सूखे व लवणता सहने की क्षमता बने और पोषण गुणवत्ता बेहतर हो।
परंपरागत जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीकों से इसका बुनियादी फर्क यह है कि जीएम फसलों में हमेशा के लिए बाहरी डीएनए शामिल हो जाता है, जबकि जीनोम एडिटिंग से तैयार अंतिम फसल किस्म पारंपरिक तरीके से विकसित की गई किस्म से अलग नहीं दिखती। यही वजह है कि यह तकनीक पहले से मौजूद और अच्छी तरह अपनाई जा चुकी लोकप्रिय किस्मों के गुणों को बरकरार रखते हुए भी फसल सुधार का रास्ता खोलती है, जिससे टिकाऊ खेती और खाद्य सुरक्षा दोनों को रफ्तार मिलती है।
दुनिया में और कौन से देश इसका इस्तेमाल कर रहे हैं
दुनियाभर में करीब 60 देश लगभग 70 पादप प्रजातियों में जीनोम-एडिटिंग तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, ताकि पैदावार बढ़ाने, खाद्य व चारे की गुणवत्ता सुधारने, खरपतवारनाशकों के प्रति सहनशीलता विकसित करने और बीमारियों, सूखे व अत्यधिक तापमान जैसी चुनौतियों से निपटने जैसे गुण फसलों में लाए जा सकें। इस मामले में सबसे आगे रहने वाले शीर्ष दस देशों में चीन, अमेरिका, दक्षिण कोरिया, जापान, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, भारत, इटली और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।
वैश्विक स्तर पर जिन जीनोम-एडिटेड फसलों को व्यावसायिक रूप से अपनाया जा चुका है उनमें अमेरिका में हाई-ओलिक सोयाबीन व कड़वाहट-रहित सरसों के पत्ते, और जापान में बढ़ी हुई गामा-अमीनोब्यूटीरिक एसिड (GABA) मात्रा वाला टमाटर तथा हाई-स्टार्च मक्का शामिल हैं। इसके अलावा ब्रिटेन में लेट ब्लाइट प्रतिरोधी आलू व पोटैटो-वायरस प्रतिरोधी आलू, अमेरिका में सिट्रस ग्रीनिंग रोग प्रतिरोधी खट्टे फलों की जड़ें, और भारत में कम ग्लूकोसिनोलेट वाली कैनोला-गुणवत्ता सरसों, ऊंची उपज देने वाला सुगंधित व रोग-प्रतिरोधी चावल तथा बीटा-कैरोटीन युक्त केला जैसी फसलें विकास के विभिन्न चरणों में हैं या मंज़ूरी की प्रक्रिया में हैं।
नई किस्में पैदावार बढ़ाने में कैसे मददगार होंगी
मई 2025 में भारत ने दुनिया की पहली दो जीनोम-एडिटेड चावल किस्में — पूसा डीएसटी राइस-1 और डीआरआर राइस-100 (कमला) — विकसित की थीं, जो क्रमशः व्यापक रूप से उगाई जाने वाली एमटीयू-1010 और सांबा मसूरी किस्मों पर आधारित हैं।
जहां पूसा डीएसटी राइस-1 लवणता व क्षारीयता के तनाव में उल्लेखनीय पैदावार बढ़ोतरी देता है, वहीं हैदराबाद स्थित आईसीएआर-भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित डीआरआर राइस-100 (कमला) प्रति बाली दानों की संख्या काफी बढ़ा देता है, अपनी मूल किस्म के मुकाबले 19 प्रतिशत अधिक उपज देता है, और 20-25 दिन पहले पककर तैयार हो जाता है। अपनी कम अवधि की वजह से यह किस्म पानी व उर्वरक दोनों की बचत करेगी, साथ ही दक्षिणी राज्यों में रबी सीजन के दौरान होने वाले अत्यधिक तापमान के तनाव से भी फसल को काफी हद तक बचाएगी — जो जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के साथ-साथ अगली फसल के लिए खेत तैयार करने में भी मददगार साबित होगा।
अनुमान है कि ये दोनों किस्में मिलकर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 20 प्रतिशत तक कमी ला सकती हैं और सिंचाई में इस्तेमाल होने वाले पानी में करीब 7,500 मिलियन घन मीटर की बचत कर सकती हैं।
इन्हें कहां और कब उगाया जाएगा
दोनों जीन-एडिटेड चावल किस्मों को ज़ोन-VII के लिए चिन्हित किया गया है, जिसमें आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी शामिल हैं — यानी वही इलाके, जहां इनकी मूल किस्में एमटीयू-1010 और बीपीटी 5204 (सांबा मसूरी) परंपरागत रूप से उगाई जाती रही हैं।
आईपी क्लीयरेंस पूरी होने और बड़े पैमाने पर बीज गुणन के बाद, शुरुआत में दोनों किस्मों को 2027 के खरीफ सीजन के दौरान करीब 1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में उगाए जाने की योजना है। आगे चलकर इनके अंतर्गत खेती का रकबा 60 लाख हेक्टेयर से अधिक तक बढ़ने की संभावना है — यानी करीब उतना ही क्षेत्र, जितने में परंपरागत रूप से इनकी मूल किस्में उगाई जाती रही हैं।
