एक पैटर्न, कई राज्य
अरावली की पहाड़ियाँ हों, अंडमान-निकोबार का वर्षावन, देहरादून-ऋषिकेश का हाईवे, बिहार का कैमूर अभयारण्य या लद्दाख की नाज़ुक हिमालयी पारिस्थितिकी — पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों से एक जैसी कहानी बार-बार सामने आई है: बड़ी बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ आगे बढ़ती हैं, हज़ारों पेड़ कटते हैं, स्थानीय लोग और पर्यावरणविद विरोध करते हैं, अदालतें हस्तक्षेप करती हैं — और तब तक जंगल का बड़ा हिस्सा जा चुका होता है। यह लेख इन सभी मामलों को एक साथ रखकर यह सवाल उठाता है कि क्या “विकास” के नाम पर पर्यावरण को व्यवस्थित रूप से पीछे धकेला जा रहा है।
आंकड़े क्या कहते हैं
पर्यावरण मंत्रालय अक्सर बढ़ते हरित आवरण के आंकड़े पेश करता है, लेकिन ज़मीनी तस्वीर कहीं ज़्यादा जटिल है। वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के बनने के बाद से अब तक देश में सवा दस लाख हेक्टेयर से ज़्यादा वन भूमि को गैर-वनीय उपयोग के लिए स्थानांतरित किया जा चुका है, और अकेले पिछले पाँच वर्षों में ही लगभग 90,000 हेक्टेयर वन भूमि इस तरह डायवर्ट की गई है। वैश्विक स्तर पर भी तस्वीर चिंताजनक है — ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के अनुसार 2000 के बाद से भारत ने 2.33 मिलियन हेक्टेयर वृक्ष क्षेत्र गंवाया है, जो कुल वृक्ष क्षेत्र में छह प्रतिशत की कमी दर्शाता है, और 2015-2020 के बीच भारत वनों की कटाई की दर में दुनिया में दूसरे स्थान पर रहा।
सरकार खुद अपने आंकड़ों को लेकर विवादों में रही है। कई पर्यावरण विशेषज्ञों — जिनमें केरल की पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की पूर्व सदस्य शामिल हैं — ने आरोप लगाया कि सरकार ने बांस के बागान, नारियल के पेड़ और बाग़ों को भी वन आवरण में गिनकर आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए, जबकि ऐसे क्षेत्र जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण नहीं होते। यानी जिस “हरियाली” का श्रेय लिया जा रहा है, उसका बड़ा हिस्सा असली जंगल नहीं, बल्कि व्यावसायिक बागान है — जबकि असली, घने प्राकृतिक जंगल लगातार कटते जा रहे हैं।
अरावली: सदियों पुरानी पहाड़ी, खनन माफिया के निशाने पर
दिल्ली-एनसीआर की हवा और भूजल को बचाए रखने वाली अरावली पर्वतमाला वर्षों से अवैध खनन और अतिक्रमण का शिकार रही है। मामला इतना गंभीर हो चुका था कि सुप्रीम कोर्ट को खुद हस्तक्षेप करना पड़ा। नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की एक समान परिभाषा स्वीकार करते हुए दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के क्षेत्रों में नए खनन पट्टे देने पर रोक लगा दी, और जनवरी 2026 में कोर्ट ने राजस्थान में जारी खनन पट्टों और पेड़ों की कटाई पर सख्त टिप्पणी करते हुए अवैध खनन रोकने के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति बनाने का संकेत दिया। दिल्ली में भी हालात कम गंभीर नहीं — सुप्रीम कोर्ट ने राजधानी के अरावली मॉर्फोलॉजिकल रिज इलाके में 473 और पेड़ काटने की अनुमति माँगने वाली DDA की याचिका पर सख्त रुख़ अपनाया।
यह ग़ौर करने वाली बात है कि यह सुरक्षा सरकार की पहलक़दमी से नहीं, बल्कि अदालत के दबाव से आई। जब तक न्यायपालिका ने कड़ा रुख़ नहीं अपनाया, नए खनन पट्टे और पेड़ों की कटाई बेरोकटोक जारी रही।
अंडमान-निकोबार: लगभग दस लाख पेड़ों की कीमत पर एक “मेगा प्रोजेक्ट”
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में 81,000 करोड़ रुपये की ग्रेट निकोबार मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना — जिसमें ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट, टाउनशिप, हवाई अड्डा और पावर प्लांट शामिल हैं — पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों को लेकर देश की सबसे विवादित परियोजनाओं में से एक बन चुकी है। इस परियोजना में लगभग 10 लाख वृक्षों की कटाई शामिल है। जनहित याचिका में यह भी कहा गया कि करीब 9.6 लाख पेड़ों की कटाई के ज़रिए 130 वर्ग किलोमीटर वर्षावन का विनाश होगा — कुछ विशेषज्ञों के अनुसार यह आँकड़ा लगभग 10 लाख के करीब है — और सरकार पर पेड़ों की संख्या कम आँकने, ग़लत पर्यावरणीय प्रभाव आकलन करने, स्थानीय समुदायों के विरोध को नज़रअंदाज़ करने तथा वन अधिकार अधिनियम जैसे कानूनों को दरकिनार करने के आरोप लगाए गए। इस याचिका पर दो लाख से ज़्यादा नागरिकों ने हस्ताक्षर किए, जिनमें जीवविज्ञानी, समाजशास्त्री, पर्यावरण संरक्षक और रिटायर्ड सरकारी अधिकारी तक शामिल हैं।
परियोजना क्षेत्र संवेदनशील वन्यजीव आवासों के बेहद क़रीब है — यह गैलाथिया बे और कैंपबेल बे नेशनल पार्क के 10 किलोमीटर के दायरे में स्थित है, और लेदरबैक समुद्री कछुए, निकोबार मेगापोड, निकोबार मकाक जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ इससे प्रभावित होंगी। कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी माना कि यह परियोजना चाहे कितनी भी बड़ी या महत्वपूर्ण क्यों न हो, वह न्यायिक समीक्षा से परे नहीं हो सकती, और अंडमान-निकोबार की जनजातियाँ बेहद संवेदनशील व कमज़ोर समूह हैं, जो सामान्यतः अदालत तक पहुँचने की स्थिति में नहीं होतीं। इसके बावजूद केंद्र सरकार परियोजना को आगे बढ़ाने पर अड़ी रही, और विपक्ष के दौरे व सवालों को राजनीति क़रार देकर टाल दिया गया।
देहरादून-ऋषिकेश: चिपको आंदोलन की धरती पर हर दिन पाँच हेक्टेयर जंगल की बलि
जिस उत्तराखंड ने दुनिया को पेड़ों को बचाने के लिए गले लगाने वाला चिपको आंदोलन दिया, वहीं आज हालात उलट हैं। राज्य गठन से लेकर जून 2026 तक उत्तराखंड में कुल 46,203.76 हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित की जा चुकी है — यानी औसतन हर दिन लगभग 5 हेक्टेयर जंगल किसी न किसी परियोजना की भेंट चढ़ रहा है। ताज़ा मामला देहरादून-ऋषिकेश हाईवे चौड़ीकरण का है, जहाँ भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश खंड पर सड़क चौड़ी करने के लिए 4,369 पेड़ हटाए जा रहे हैं।
सरकार की भरपाई-योजनाओं पर भी भरोसा कम है, क्योंकि इलाके में पहले हुए वृक्ष प्रत्यारोपण (ट्रांसप्लांटेशन) प्रयोग असफल रह चुके हैं। स्थानीय लोगों के विरोध को दबाने का आरोप भी लग रहा है — उत्तराखंड हाईकोर्ट को पेड़ कटाई की शिकायत करने वालों के सामाजिक बहिष्कार के मामले में राज्य सरकार से जवाब तलब करना पड़ा। यह सिर्फ स्थानीय ठेकेदारों की लापरवाही नहीं, बल्कि एक व्यापक अवैध खनन और कटाई नेटवर्क का संकेत है — राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को देहरादून में पेड़ कटाई और अवैध खनन के आरोपों की जाँच के लिए अलग से समिति गठित करनी पड़ी, जिसमें एक डेवलपर पर 2014 में काम रोकने का नोटिस जारी होने के बावजूद अवैध कटाई और खनन जारी रखने का आरोप है। जनआक्रोश इतना बढ़ा कि स्थानीय लोगों, पर्यावरण प्रेमियों और युवाओं ने “ब्लैक हरेला” मनाकर विरोध दर्ज कराया, यह कहते हुए कि एक तरफ़ हज़ारों पेड़ों पर आरी चल रही है और दूसरी तरफ़ पौधरोपण अभियानों का प्रचार हो रहा है।
बिहार: वन विभाग की ज़मीन पर ही रजिस्ट्री का घोटाला
बिहार में समस्या केवल कटाई नहीं, बल्कि वन भूमि की सुरक्षा की पूरी व्यवस्था का लापरवाह होना है। कैमूर वन्यजीव अभयारण्य के मामले ने चौंका दिया, जहाँ वन विभाग की संरक्षित ज़मीन न केवल अवैध रूप से बेची गई, बल्कि अंचल कार्यालय से उसकी दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) भी करा ली गई — यानी सरकारी तंत्र की मिलीभगत के बिना यह संभव ही नहीं था। यह घटना दिखाती है कि जब निगरानी व्यवस्था ही कमज़ोर या भ्रष्ट हो, तो कानूनी संरक्षण केवल काग़ज़ों पर रह जाता है — चाहे अभयारण्य जैसा संवेदनशील इलाका ही क्यों न हो।
राज्यों में यह पैटर्न बार-बार दोहराया गया है, जहाँ ज़मीनी स्तर पर वन अधिकारी और स्थानीय प्रशासन अवैध कटाई और अतिक्रमण को या तो नज़रअंदाज़ करते हैं या उसमें शामिल पाए जाते हैं, जबकि केंद्र और राज्य सरकारें हरियाली बढ़ाने के दावे करती रहती हैं।
लद्दाख: नाज़ुक हिमालयी पारिस्थितिकी और कुचली जाती आवाज़ें
लद्दाख का मामला बाक़ी सबसे अलग इसलिए है क्योंकि यहाँ पर्यावरण की चिंता को दबाने का तरीका सीधे तौर पर एक कार्यकर्ता की आज़ादी छीनने तक पहुँच गया। 2019 में केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से लद्दाख के लोगों को डर है कि छठी अनुसूची का संवैधानिक संरक्षण न मिलने पर वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों, पर्यावरण और आदिवासी समाज का क्षरण होने लगेगा, क्योंकि जलवायु कार्यकर्ता ऊँचाई वाले रेगिस्तानों, ग्लेशियरों और अल्पाइन घास के मैदानों में खनन व औद्योगीकरण को लेकर गंभीर चिंता जता चुके हैं — ये पारिस्थितिकी तंत्र दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण आवास हैं।
इन्हीं मांगों को लेकर आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सोनम वांगचुक को पिछले साल राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत में लिया गया — उन्हें क़रीब सात महीने जेल में रहने के बाद रिहा किया गया, और उनकी रिहाई के महज़ दो दिन बाद ही लद्दाख में पूर्ण राज्य की माँग को लेकर फिर से प्रदर्शन और बंद का आयोजन हुआ। एक पर्यावरणविद और शिक्षाविद को, जिसका मुख्य एजेंडा हिमालय के ग्लेशियरों और नाज़ुक पारिस्थितिकी को बचाना रहा है, राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत बंद करना यह सवाल खड़ा करता है कि पर्यावरण की आवाज़ को कितनी बर्दाश्त की सीमा तक सहन किया जा रहा है।
विकास बनाम पर्यावरण नहीं, विकास के भीतर पर्यावरण
इन पाँचों मामलों को साथ रखकर देखने पर एक साफ़ पैटर्न उभरता है: बड़ी परियोजनाएँ पहले मंज़ूर होती हैं, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को औपचारिकता की तरह निपटाया जाता है, स्थानीय विरोध को या तो नज़रअंदाज़ किया जाता है या राजनीतिक रंग देकर खारिज कर दिया जाता है, और अक्सर तभी कोई रोक लगती है जब अदालतें हस्तक्षेप करती हैं — तब तक जंगल का बड़ा हिस्सा जा चुका होता है। सरकार बढ़ते हरित आवरण के आंकड़े गिनाती है, लेकिन विशेषज्ञ ख़ुद इन आंकड़ों पर सवाल उठा चुके हैं।
असली सवाल यह नहीं है कि देश को सड़कें, बंदरगाह या आर्थिक विकास चाहिए या नहीं — निस्संदेह चाहिए। असली सवाल यह है कि क्या यह विकास पर्यावरणीय संरक्षण की ठोस, पारदर्शी प्रक्रिया के साथ हो रहा है, या पर्यावरण को हर बार “बाधा” मानकर रास्ते से हटाया जा रहा है। जब कैमूर जैसे अभयारण्य की ज़मीन तक बिक जाए, जब चिपको आंदोलन की धरती पर हर दिन पाँच हेक्टेयर जंगल कटे, और जब पर्यावरण के लिए आवाज़ उठाने वाले को क़ैद कर दिया जाए — तो यह मान लेना मुश्किल है कि पर्यावरण संरक्षण को विकास की योजना में बराबर की जगह दी जा रही है।
