Clinical Establishments Act की वैधता पर केंद्र का जवाब; सरकार बोली- मरीजों की पहुंच और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता के बीच संतुलन जरूरी
निजी अस्पतालों में इलाज का कितना शुल्क लिया जाए और क्या सरकार इस पर कोई सीमा तय कर सकती है? यह सवाल अब सुप्रीम कोर्ट में चल रही एक अहम कानूनी लड़ाई का हिस्सा बन गया है। इस मामले में केंद्र सरकार ने क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स (सेंट्रल गवर्नमेंट) रूल्स, 2012 के Rule 9(ii) का बचाव किया है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 4 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में कहा है कि इस व्यवस्था का मकसद निजी अस्पतालों पर मनमाना नियंत्रण लगाना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं में गुणवत्ता, पारदर्शिता, सुरक्षा और मरीजों की पहुंच सुनिश्चित करना है।
यह मामला उत्तर प्रदेश के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यूपी उन राज्यों में शामिल है जिन्होंने Clinical Establishments (Registration and Regulation) Act, 2010 को संविधान के अनुच्छेद 252(1) के तहत अपनाया है। केंद्र सरकार की मौजूदा जानकारी के अनुसार यह केंद्रीय कानून अब 19 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लागू है, जिनमें उत्तर प्रदेश भी शामिल है।
आखिर विवाद किस बात पर है?
Clinical Establishments Act, 2010 का मूल उद्देश्य देश में अस्पतालों, क्लीनिकों, डायग्नोस्टिक सेंटरों और अन्य स्वास्थ्य संस्थानों का पंजीकरण और नियमन करना तथा उनके लिए न्यूनतम सुविधाओं और सेवाओं के मानक तय करना है।
इसी कानून के तहत 2012 में केंद्र सरकार ने नियम बनाए। Rule 9(ii) में कहा गया है कि क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स अलग-अलग प्रक्रियाओं और सेवाओं के लिए वही शुल्क लें जो केंद्र सरकार द्वारा राज्यों से परामर्श के बाद निर्धारित की जाने वाली दर की सीमा (range of rates) के भीतर हो।
यहीं से विवाद पैदा हुआ।
एक तरफ मरीजों और सार्वजनिक स्वास्थ्य के नजरिये से यह सवाल है कि एक ही तरह की चिकित्सा सेवा के लिए अलग-अलग अस्पतालों में बहुत बड़ा शुल्क अंतर क्यों हो। दूसरी तरफ निजी अस्पतालों का तर्क है कि आधुनिक चिकित्सा में इलाज की लागत हर जगह एक जैसी नहीं होती। अस्पताल की सुविधाएं, डॉक्टरों की विशेषज्ञता, उपकरण, तकनीक, इम्प्लांट और उपचार की जटिलता के कारण खर्च काफी अलग हो सकता है।
केंद्र ने क्या कहा?
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपने जवाब में संविधान के अनुच्छेद 47 का सहारा लिया है। अनुच्छेद 47 राज्य को सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार की दिशा में काम करने का दायित्व देता है।
सरकार का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं की कीमत इतनी अधिक नहीं होनी चाहिए कि आम व्यक्ति जरूरी इलाज से ही दूर हो जाए। लेकिन दूसरी ओर फीस इतनी कम भी नहीं होनी चाहिए कि अस्पतालों के लिए बेहतर उपकरण, तकनीक, डॉक्टर और अन्य जरूरी सुविधाओं को बनाए रखना मुश्किल हो जाए।
सरकार के मुताबिक, नियमों का उद्देश्य इसी संतुलन को बनाए रखना है।
दूसरे शब्दों में कहें तो केंद्र का तर्क है कि मरीज को इलाज की उचित कीमत पर सेवा मिले, लेकिन स्वास्थ्य संस्थानों की गुणवत्ता और आर्थिक व्यवहार्यता भी बनी रहे।
क्या सरकार पूरे देश में एक ही फीस तय करेगी?
यहां Rule 9(ii) की भाषा महत्वपूर्ण हो जाती है।
नियम में किसी सेवा के लिए पूरे देश के हर अस्पताल में एक ही कीमत तय करने की बात नहीं है। इसमें दर की एक सीमा तय करने का प्रावधान है।
यानी सरकार का पक्ष यह है कि एक न्यूनतम और अधिकतम सीमा जैसी व्यवस्था बनाई जा सकती है, जिसके भीतर क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट अपनी परिस्थितियों के अनुसार शुल्क तय करें।
हालांकि, इस सीमा को व्यवहार में किस तरह तय किया जाए, यही सबसे कठिन सवालों में से एक है।
2012 में नियम बनने के बावजूद विभिन्न चिकित्सा सेवाओं के लिए इस तरह की व्यापक दर-सीमा तय करने और लागू करने का मुद्दा अब तक विवाद का विषय रहा है। 2025 में सुप्रीम कोर्ट के सामने एक अलग याचिका में Rule 9(i) और 9(ii) को लागू कराने की मांग भी उठी थी।
निजी अस्पतालों की आपत्ति क्या है?
Association of Healthcare Providers (India) ने Rule 9(ii) की संवैधानिक वैधता को ही चुनौती दी है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मूल Clinical Establishments Act का मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य संस्थानों के लिए न्यूनतम मानक तय करना और उनका नियमन करना था। उनके मुताबिक कानून में चिकित्सा सेवाओं की कीमत नियंत्रित करने की शक्ति स्पष्ट रूप से नहीं दी गई है।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया है कि चिकित्सा क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। नई तकनीक, रोबोटिक सर्जरी, महंगे इम्प्लांट, आधुनिक मशीनें और विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाओं की लागत को एक समान दरों में बांधना व्यावहारिक नहीं होगा।
उनका कहना है कि अगर शुल्क पर बहुत सख्त सीमा लगा दी गई तो इससे अस्पतालों के निवेश और नई चिकित्सा तकनीक अपनाने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2024 में इस चुनौती पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। याचिका में Rule 9(ii) को संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 21 के खिलाफ भी बताया गया है।
उत्तर प्रदेश के लिए मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर प्रदेश ने Clinical Establishments Act को अपनाया है। केंद्र सरकार के अनुसार यूपी, बिहार, राजस्थान, झारखंड और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने संविधान के अनुच्छेद 252(1) के तहत इस केंद्रीय कानून को अपनाया था।
उत्तर प्रदेश में इसके लिए U.P. Clinical Establishments (Registration and Regulation) Rules, 2016 भी बनाए गए हैं। राज्य में क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स के नियमन के लिए स्टेट काउंसिल और जिला स्तर पर पंजीकरण व्यवस्था का प्रावधान किया गया है। India Code पर यूपी से संबंधित नियम और 2021 में State Council तथा District Registration Authority के गठन की अधिसूचनाएं भी दर्ज हैं।
इसका मतलब यह है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल दिल्ली या केंद्र सरकार के स्तर का मामला नहीं रहेगा। इसका असर उत्तर प्रदेश में पंजीकृत निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम, क्लीनिक, डायग्नोस्टिक सेंटर और अन्य संबंधित स्वास्थ्य संस्थानों पर भी पड़ सकता है।
यूपी के मरीजों के लिए क्या बदलेगा?
मान लीजिए किसी मरीज को किसी अस्पताल में एक सर्जरी, जांच या दूसरी चिकित्सा प्रक्रिया के लिए अलग-अलग शुल्क बताए जाते हैं। ऐसे में यदि भविष्य में Rule 9(ii) के तहत दरों की प्रभावी सीमा तय होती है तो मरीजों के लिए यह समझना आसान हो सकता है कि किसी सेवा के लिए अस्पताल किस सीमा में शुल्क ले सकता है।
लेकिन इसे सीधे-सीधे “सरकार निजी अस्पतालों की फीस तय कर देगी” कहना सही नहीं होगा।
असल सवाल यह है कि दरों की सीमा कैसे तय होगी और क्या उसमें अस्पताल के स्तर, शहर, उपलब्ध सुविधाओं, डॉक्टर की विशेषज्ञता, उपकरणों और उपचार की जटिलता जैसे अंतर को पर्याप्त जगह दी जाएगी।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि लखनऊ, नोएडा, कानपुर, वाराणसी जैसे बड़े शहरों के बड़े अस्पतालों और छोटे शहरों या जिलों के अस्पतालों की लागत और सुविधाओं में काफी अंतर हो सकता है।
कानून का दायरा सिर्फ निजी अस्पतालों तक सीमित नहीं
Clinical Establishments Act का दायरा केवल बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों तक सीमित नहीं है। केंद्र सरकार के अनुसार इसमें विभिन्न प्रकार के अस्पताल, क्लीनिक, डायग्नोस्टिक सेंटर, डेंटल क्लीनिक, डे-केयर सुविधाएं और अन्य चिकित्सा प्रतिष्ठान शामिल हो सकते हैं। यह कानून सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों के क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स पर लागू हो सकता है, जबकि सशस्त्र बलों द्वारा संचालित संस्थान इसके दायरे से बाहर हैं।
यही वजह है कि Rule 9(ii) पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
2026 में कानून में एक और बदलाव
इस पूरे विवाद के बीच जून 2026 में केंद्र सरकार ने Jan Vishwas reforms के तहत Clinical Establishments Act में कुछ प्रावधानों को तर्कसंगत बनाने के लिए संशोधन भी अधिसूचित किए हैं।
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार 22 जून 2026 को किए गए इन बदलावों का उद्देश्य अनुपालन का बोझ कम करना, नियमन को अधिक व्यावहारिक बनाना और मरीजों की सुरक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को बनाए रखते हुए proportionate enforcement सुनिश्चित करना है।
यानी एक तरफ सरकार स्वास्थ्य संस्थानों पर अनावश्यक अनुपालन बोझ कम करने की दिशा में कदम उठा रही है, वहीं दूसरी तरफ मरीजों से लिए जाने वाले शुल्क और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को लेकर Rule 9(ii) की कानूनी वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में बहस जारी है।
राज्यों की भूमिका भी अहम
स्वास्थ्य संविधान की राज्य सूची का विषय है। इसलिए केंद्र द्वारा बनाए गए Clinical Establishments Act को सभी राज्यों पर अपने आप लागू नहीं किया गया है।
केंद्र सरकार के अनुसार जिन राज्यों ने अनुच्छेद 252(1) के तहत इस कानून को अपनाया है, वहां यह लागू होता है। फिलहाल केंद्र की वेबसाइट पर 19 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में इसके लागू होने की जानकारी दी गई है।
इसलिए यदि केंद्र सरकार Rule 9(ii) के तहत दरों की व्यवस्था को आगे बढ़ाती है तो राज्यों के साथ परामर्श की भूमिका भी अहम रहेगी।
असली चुनौती दर तय करने की होगी
इस मामले में सबसे बड़ी चुनौती शायद यह नहीं होगी कि अस्पतालों की फीस को नियंत्रित किया जाए या नहीं। असली सवाल होगा कि दर तय किस आधार पर की जाए।
एक सरकारी अस्पताल, एक छोटे शहर के निजी अस्पताल और दिल्ली या लखनऊ जैसे शहर के अत्याधुनिक मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल की लागत एक जैसी नहीं होती। इसी तरह सामान्य सर्जरी और अत्याधुनिक रोबोटिक सर्जरी की लागत की तुलना भी आसान नहीं है।
इसलिए यदि दरों की सीमा तय होती है तो उसके लिए ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें मरीजों को अत्यधिक शुल्क से राहत मिले, लेकिन अस्पतालों को गुणवत्ता और आधुनिक तकनीक में निवेश करने से हतोत्साहित भी न किया जाए।
फैसला मरीज और अस्पताल दोनों के लिए अहम
Clinical Establishments Act को लागू हुए एक दशक से अधिक समय हो चुका है, लेकिन अस्पतालों की फीस की सीमा का सवाल अभी भी पूरी तरह सुलझा नहीं है। एक तरफ मरीजों के लिए इलाज की बढ़ती लागत चिंता का विषय है, दूसरी तरफ निजी स्वास्थ्य क्षेत्र अपने बढ़ते खर्च और तकनीकी निवेश का हवाला देता रहा है।
अब केंद्र सरकार ने Rule 9(ii) की संवैधानिक वैधता का मजबूती से बचाव किया है और सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा है। दूसरी ओर निजी स्वास्थ्य क्षेत्र इस प्रावधान को ही चुनौती दे रहा है।
10 अगस्त 2026 तक उपलब्ध स्थिति में इस विवाद का अंतिम फैसला नहीं आया है। इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि निजी अस्पतालों की फीस पर कोई नई राष्ट्रव्यापी सीमा लागू हो गई है। लेकिन इतना जरूर है कि सुप्रीम कोर्ट का आने वाला फैसला यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है कि भारत में निजी स्वास्थ्य सेवाओं की कीमतों और उनके नियमन का भविष्य किस दिशा में जाएगा—और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य पर इसका असर खास तौर पर देखने को मिलेगा।
