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Home»राज्य»उत्तरप्रदेश»दुनिया की सबसे महंगी मछलियों को टक्कर देगी कुशीनगर की ‘चेपुआ’
उत्तरप्रदेश

दुनिया की सबसे महंगी मछलियों को टक्कर देगी कुशीनगर की ‘चेपुआ’

News DriftBy News DriftJuly 27, 2026Updated:July 27, 2026No Comments3 Mins Read
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दुनिया की सबसे महंगी मछलियों को टक्कर देगी कुशीनगर की ‘चेपुआ’
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उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले की बड़ी गंडक (नारायणी) नदी में प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली दुर्लभ ‘चेपुआ’  मछली जल्द ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की नई पहचान बन सकती है। उत्तर प्रदेश मत्स्य विभाग ने इसके घटते प्राकृतिक स्टॉक को बचाने, इसके संरक्षण और कृत्रिम ब्रीडिंग  की संभावनाएं तलाशने के लिए वैज्ञानिकों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की एक विशेष टीम को मैदान में उतारा है।

यदि यह शोध सफल रहता है, तो ‘चेपुआ’ न केवल स्वाद और पौष्टिकता के मामले में दुनिया की मशहूर सैल्मन मछली को पीछे छोड़ेगी, बल्कि स्थानीय मछुआरों की आय को कई गुना बढ़ाकर पूर्वांचल की अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देगी।

मुख्य बिंदु:

  • मुख्य स्थल: बड़ी गंडक (नारायणी) नदी, कुशीनगर (उत्तर प्रदेश)।

  • खासियत: दुनिया भर के मीठे और खारे पानी में मिलने वाली मशहूर सैल्मन मछली से भी अधिक पौष्टिक होने का दावा।

  • सबसे बड़ी चुनौती: नदी के पानी से बाहर आते ही बहुत कम समय में दम तोड़ देना; लाइव सैंपलिंग में कठिनाई।

  • मुख्य उद्देश्य: हैचरी तैयार कर कृत्रिम प्रजनन को सफल बनाना।

  • वैश्विक मांग: शोध सफल होते ही चेपुआ ‘लोकल से ग्लोबल’ ब्रांड बनेगी।

वैज्ञानिकों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की टीम तैनात

कुशीनगर के जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर ने जानकारी दी कि ‘वर्ल्ड फिशरीज’ के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ अरुण पाडियार और ‘नेशनल ब्यूरो ऑफ फिश जेनेटिक रिसोर्सेज’ (NBFGR) के वैज्ञानिक चेपुआ के प्राकृतिक आवास, पानी की गुणवत्ता, शिकार पद्धति और इसके प्रजनन काल पर गहन शोध कर रहे हैं।

वैज्ञानिकों की टीम स्थानीय मछुआरों की मदद से विशेष जल-मापक यंत्रों के जरिये बड़ी गंडक नदी के पानी का ऑन-स्पॉट परीक्षण कर चुकी है। शोध के अनुसार, नवंबर से मार्च के बीच चेपुआ मछली का मुख्य प्रजनन काल होता है।

सैल्मन से भी अधिक पौष्टिक, लेकिन संवेदनशीलता सबसे बड़ी बाधा

शोध से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार, चेपुआ मछली केवल अपने अद्वितीय स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि बेजोड़ पौष्टिकता के लिए भी जानी जाती है। तुलनात्मक अध्ययनों में इसे दुनिया की मशहूर सैल्मन मछली से भी अधिक पौष्टिक पाया गया है।

लाइव सैंपलिंग और हैचरी की चुनौती:

चेपुआ मछली की सबसे बड़ी कमजोरी और चुनौती यह है कि यह नदी के पानी से बाहर आते ही बेहद कम समय में दम तोड़ देती है। वर्तमान में इसका 100% उत्पादन केवल बड़ी गंडक नदी से प्राकृतिक शिकार पर ही निर्भर है। इसी कारण इसकी ‘लाइव सैंपलिंग’ (जीवित पकड़ना और ले जाना) वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी पहेली बनी हुई है। वैज्ञानिकों का प्राथमिक लक्ष्य ऐसी हैचरी विकसित करना है जहाँ इसे कृत्रिम रूप से पाला और प्रजनन कराया जा सके।

लोकल से ग्लोबल’ बनेगी चेपुआ: सरकार की संजीदगी

खड्डा विधायक विवेकानंद पांडेय के अनुसार, प्रदेश सरकार इस परियोजना को लेकर बेहद संजीदा है। तीन वर्ष पूर्व मत्स्य विकास मंत्री संजय निषाद ने खड्डा प्रवास के दौरान चेपुआ मछली को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने का मुद्दा सरकार के समक्ष रखा था, जिस पर अब अमल शुरू हो चुका है।

जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर ने बताया कि वैज्ञानिक जैसे ही इसके कृत्रिम प्रजनन और नियंत्रित वातावरण में जीवित रखने में सफलता प्राप्त कर लेंगे, देश और दुनिया के सी-फूड (Sea Food) व मछली बाजारों में चेपुआ की भारी मांग पैदा होगी।

मछुआरों की चमकेगी किस्मत

कुशीनगर और गंडक नदी के तटीय इलाकों में रहने वाले हज़ारों मछुआरे पीढ़ियों से चेपुआ के सीमित शिकार पर निर्भर रहे हैं। यदि वैज्ञानिक इसकी हैचरी तकनीक तैयार कर लेते हैं, तो कमर्शियल फार्मिंग के ज़रिए यह स्थानीय युवाओं और निषाद समुदाय के लिए एक बड़ा रोज़गार का साधन बनेगी। चेपुआ का ‘लोकल से ग्लोबल’ सफर उत्तर प्रदेश के कृषि और मत्स्य निर्यात परिदृश्य में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।

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