उत्तर प्रदेश में महिला सरकारी कर्मियों के लिए मातृत्व अवकाश के नियमों में बड़ा बदलाव किया गया है। यूपी कैबिनेट ने अब मातृत्व अवकाश के लिए दो बच्चों की उम्र में दो साल का अंतर अनिवार्य होने की शर्त को समाप्त कर दिया है।
मातृत्व अवकाश का आधार — सहायक नियम 153
उत्तर प्रदेश में सरकारी महिला कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश देने की व्यवस्था मूल नियम 101 के तहत बनाई गई है, जिसके अंतर्गत राज्यपाल ने सहायक नियम 153 (Subsidiary Rule 153) बनाया है। यही नियम प्रदेश में सभी सरकारी और परिषदीय महिला कर्मचारियों — जैसे शिक्षिकाओं, बेसिक शिक्षा परिषद की कर्मचारियों और अन्य विभागों की महिला कर्मियों — के मातृत्व अवकाश का मुख्य आधार है।
किसे मिलता है मातृत्व अवकाश
- यह अवकाश किसी भी महिला सरकारी कर्मचारी को मिलता है, चाहे वह स्थायी हो या अस्थायी।
- अस्थायी महिला कर्मचारी के मामले में एक शर्त यह है कि प्रसूति अवकाश की अवधि उसकी नियुक्ति की संभावित अवधि से अधिक नहीं हो सकती।
- अवकाश पूरे वेतन (फुल पे) पर दिया जाता है — यानी अवकाश पर जाने के समय जो वेतन कर्मचारी को मिल रहा हो, वही अवकाश के दौरान भी मिलता रहता है।
कितने दिन का मिलता है मातृत्व अवकाश
- सामान्य प्रसव (डिलीवरी) के मामले में — अवकाश की अवधि पहले 135 दिन थी, जिसे वर्ष 2008 में जारी शासनादेश के जरिए बढ़ाकर 180 दिन कर दिया गया। यह अवधि अवकाश शुरू होने की तारीख से गिनी जाती है।
- गर्भपात या गर्भस्राव (मिसकैरेज/एबॉर्शन) के मामले में — कुल छह सप्ताह (42 दिन) का अवकाश मिलता है। इसके लिए आवेदन के साथ प्राधिकृत चिकित्सक का प्रमाण-पत्र देना अनिवार्य है। ऐसे अवकाश में यह नहीं देखा जाता कि महिला के कितने जीवित बच्चे हैं।
कितनी बार मिलता है यह अवकाश
- मातृत्व अवकाश किसी भी महिला सरकारी कर्मचारी को उसके पूरे सेवाकाल (स्थायी और अस्थायी सेवा को मिलाकर) में अधिकतम तीन बारही दिया जा सकता है।
- सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह रही है कि यदि किसी महिला कर्मचारी के दो या उससे अधिक जीवित संतान हैं, तो उसे मातृत्व अवकाश अनुमन्य नहीं होता — भले ही उसने पहले इस अवकाश का लाभ न लिया हो।
- हालांकि, गर्भपात/गर्भस्राव के मामलों में यह अवकाश तीन बार से अधिक भी स्वीकृत किया जा सकता है, क्योंकि इसमें जीवित संतानों की संख्या को आधार नहीं बनाया जाता।
दो साल के अंतर वाला पुराना नियम क्या था
अब तक व्यवहार में यह नियम लागू था कि किसी महिला कर्मचारी को दूसरा मातृत्व अवकाश तभी दिया जाता था, जब उसके पहले और दूसरे बच्चे की उम्र में कम से कम दो साल का अंतर हो। यदि यह अंतराल दो साल से कम होता था, तो संबंधित महिला कर्मचारी को मातृत्व अवकाश के लिए अक्सर आपत्तियों और विवादों का सामना करना पड़ता था, और कई मामलों में उन्हें अदालत तक जाना पड़ता था।
अदालत के फैसले से आया बदलाव
यह बदलाव इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक अहम फैसले के बाद हुआ है। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने स्पष्ट किया कि पहले मातृत्व अवकाश के दो साल के भीतर दूसरी बार मातृत्व अवकाश लेने पर कोई रोक नहीं है, और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अपनाया गया मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 वित्तीय हस्तपुस्तिका के नियमों पर प्रभावी होगा। कोर्ट ने इससे जुड़े एक मामले में एक महिला कर्मचारी को 180 दिन का मातृत्व अवकाश तथा सभी सेवा लाभ देने का निर्देश भी दिया।
अब क्या बदलेगा
इस फैसले के बाद यूपी कैबिनेट ने औपचारिक रूप से दो साल के अंतराल की बाध्यता को खत्म करने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया है। अब दो बच्चों के बीच उम्र का अंतर दो साल से कम होने पर भी पात्र महिला कर्मचारी को मातृत्व अवकाश मिलने का रास्ता साफ हो गया है — बशर्ते वह ऊपर बताई गई अन्य शर्तें (जैसे जीवित संतानों की संख्या दो से अधिक न होना, और सेवाकाल में अवकाश तीन बार से अधिक न लिया गया हो) पूरी करती हो।
अन्य जुड़ी सुविधाएं
- बाल्य देखभाल अवकाश (Child Care Leave) — विशेष परिस्थितियों जैसे संतान की बीमारी या परीक्षा आदि के दौरान 18 वर्ष की आयु तक देखभाल हेतु महिला सरकारी कर्मचारी को पूरे सेवाकाल में अधिकतम दो वर्ष (730 दिन) का बाल्य देखभाल अवकाश भी मिल सकता है।
- क्रेश सुविधा — मातृत्व अवकाश संशोधन अधिनियम 2017 के तहत 50 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों को निर्धारित दूरी के भीतर क्रेश की सुविधा देना अनिवार्य है, जहां महिला कर्मचारी दिन में चार बार जा सकती हैं।
- वर्क फ्रॉम होम का विकल्प — यदि काम की प्रकृति ऐसी हो कि वह घर से भी किया जा सके, तो नियोक्ता और महिला कर्मचारी की आपसी सहमति से घर से काम करने की अनुमति भी दी जा सकती है।
इस तरह, दो साल के अंतराल की बाध्यता खत्म होने से यह नियम अब कहीं अधिक व्यावहारिक और महिला कर्मचारियों के अनुकूल हो गया है, जिससे मातृत्व अवकाश को लेकर होने वाले अनावश्यक विवाद कम होंगे।
