हिमालय की गोद में बसा नेपाल इस समय अपने इतिहास की सबसे भयावह प्राकृतिक आपदाओं में से एक से जूझ रहा है। नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित रसुवा जिले में अचानक आई जलप्रलय ने कुछ ही मिनटों में सैकड़ों बस्तियों, पुलों, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं को मलबे में बदल दिया। यह आपदा इतनी अचानक और इतनी तेज रफ्तार से आई कि लोगों को भागने तक का मौका नहीं मिला। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर हुआ क्या, कब हुआ, कितनी जानें गईं, इसका कारण क्या था, और आगे किस तरह के खतरे मंडरा रहे हैं।
कब और कैसे शुरू हुई तबाही?
यह हादसा 26 अगस्त 2026, बुधवार की सुबह हुआ। स्थानीय समयानुसार सुबह करीब 8:37 बजे नेपाल के रसुवा जिले में, तिब्बत सीमा के पास लांगतांग ल्रिरुंग पर्वत के निकट अचानक एक बड़ी हलचल दर्ज हुई। कुछ ही मिनटों बाद सुबह करीब 9 बजे भोटेकोशी नदी में जबरदस्त सैलाब उमड़ पड़ा, जो देखते ही देखते त्रिशूली नदी की धारा में मिलकर करीब 72 किलोमीटर लंबे इलाके में तबाही मचाता चला गया। रसुवा के अलावा न्हुवाकोट, धादिंग, गोरखा, तनहूं, नवलपरासी और चितवन जिलों तक इसका असर पहुंचा। महज 20 से 25 मिनट के भीतर कई गांव, बाजार, पुल और पावर स्टेशन मलबे में तब्दील हो गए। न तो तेज बारिश हुई थी, न बादल फटा था, और न ही मौसम विभाग ने कोई पूर्व चेतावनी दी थी—इसीलिए यह हादसा और भी ज्यादा भयावह और अप्रत्याशित साबित हुआ।
मौतों का बढ़ता आंकड़ा
हादसे के तुरंत बाद मृतकों की संख्या करीब 160 आंकी गई थी, लेकिन जैसे-जैसे बचाव दल दूरदराज और दुर्गम इलाकों तक पहुंचे, यह संख्या लगातार बढ़ती चली गई। नेपाल पुलिस और राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक अब तक करीब 680 से ज्यादा शव बरामद किए जा चुके हैं, जिनमें तिब्बत की तरफ मारे गए सात लोग भी शामिल हैं। सबसे ज्यादा शव नवलपरासी पूर्वी, नुवाकोट, गोरखा, धादिंग, तनहूं और रसुवा जिलों से मिले हैं। कुछ शव तो नदी की धारा में बहते हुए करीब 240 किलोमीटर दूर भारतीय सीमा तक पहुंच गए, जहां उत्तर प्रदेश के महराजगंज और कुशीनगर जिलों में गंडक नदी के किनारे कई शव बरामद हुए।
हजारों लोग अब भी लापता
मौतों से भी ज्यादा चिंताजनक आंकड़ा लापता लोगों का है। शुरुआत में करीब 750 से 1,500 लोगों के लापता होने की बात कही गई थी, लेकिन जांच आगे बढ़ने पर यह संख्या 2,400 से 2,500 के बीच पहुंच गई है। इनमें बड़ी संख्या नेपाल में काम कर रहे विदेशी नागरिकों और जलविद्युत परियोजनाओं में कार्यरत मजदूरों की है। लापता लोगों में करीब 500 से ज्यादा विदेशी नागरिक और 100 से ज्यादा प्रवासी नेपाली नागरिक भी शामिल हैं। भारत के भी सैकड़ों नागरिकों से संपर्क टूट गया था, जिनमें बड़ी संख्या कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए तीर्थयात्रियों की थी—करीब 215 भारतीय श्रद्धालु इस यात्रा पर तिब्बत जा रहे थे, वहीं बाकी त्रिशूली-1 जलविद्युत परियोजना में काम करने वाले मजदूर थे। राहत की बात यह रही कि भारत सरकार अब तक 80 से ज्यादा भारतीयों को सुरक्षित निकाल चुकी है।
आखिर आई कैसे यह भीषण बाढ़? असली वजह क्या थी
शुरुआत में नेपाल के विदेश मंत्रालय ने माना था कि भूकंप के झटके से हिमस्खलन (एवलांच) हुआ, जिससे यह बाढ़ आई। लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) की जांच में सामने आया कि यह भूकंप नहीं था। दरअसल लांगतांग ल्रिरुंग पर्वत के पास बर्फ का एक बड़ा टुकड़ा टूटकर गिरा, जिसने भोटेकोशी नदी की सहायक धारा लेंदे खोला को अस्थायी रूप से अवरुद्ध कर दिया। इस हिमखंड (ग्लेशियर) के टूटने और भारी मात्रा में चट्टान, बर्फ और मलबा गिरने से जो कंपन पैदा हुआ, वही भूकंपमापी यंत्रों में 5.2 से 5.7 तीव्रता के भूकंप जैसा दर्ज हो गया था—जबकि असल में यह धरती की परतों की हलचल नहीं, बल्कि हिमखंड के टूटने की ऊर्जा थी।
जब यह अस्थायी रुकावट बनी हुई नदी की धारा अचानक टूटी, तो जमा हुआ पानी और मलबा जबरदस्त वेग के साथ नीचे की ओर बहा—यही घटना भीषण फ्लैश फ्लड (अचानक आई बाढ़) का कारण बनी। शुरुआती दौर में इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) यानी हिमनद झील के फटने से जोड़कर भी देखा गया था, क्योंकि इस क्षेत्र में इस तरह की झीलें बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
जलवायु परिवर्तन का साया
वैज्ञानिकों के मुताबिक इस हादसे के पीछे प्रत्यक्ष कारण भले ही एक हिमखंड का टूटना रहा हो, लेकिन इसके पीछे की बड़ी वजह जलवायु परिवर्तन से जुड़ी मानी जा रही है। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे की जलवायु वैज्ञानिक एला गिल्बर्ट के मुताबिक धरती के गर्म होने से हिमालय के ग्लेशियर लगातार अस्थिर हो रहे हैं, और वर्ष 2000 के बाद से इनके पिघलने और टूटने की रफ्तार दोगुनी हो चुकी है। जब ग्लेशियरों की स्थिरता कमजोर पड़ती है, तो इसी तरह के अचानक हादसे होने की आशंका बढ़ जाती है। रीडिंग यूनिवर्सिटी की जलवायु जोखिम विशेषज्ञ लिज़ स्टीफंस के अनुसार हिमालय जैसे ऊंचे पर्वतीय इलाकों में फ्लैश फ्लड सिर्फ भारी बारिश से नहीं, बल्कि भूस्खलन, हिमस्खलन और हिमनद झीलों के फटने जैसी जटिल घटनाओं की कड़ी से भी पैदा होते हैं—और यही जटिलता समय रहते चेतावनी देना बेहद मुश्किल बना देती है।
गौरतलब है कि यह कोई अकेली घटना नहीं है। इससे पहले जुलाई 2025 में भी इसी क्षेत्र में एक हिमनद झील के फटने से बाढ़ आई थी, जिसमें कम से कम 11 लोगों की जान गई थी। अगस्त 2024 में सोलुखुंबू जिले के थामे गांव में भी दो हिमनद झीलें फट चुकी हैं। यानी हिमालयी क्षेत्र में इस तरह की घटनाओं की आवृत्ति लगातार बढ़ रही है, जो जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकेत की ओर इशारा करती है।
अभी टला नहीं है खतरा—नई झील ने बढ़ाई चिंता
तबाही के बाद तिब्बत की तरफ छोचेन खोला और पुरेपु त्सांग्पो नदियों के संगम पर भारी मलबा जमा होने से एक नई “बैरियर झील” (प्राकृतिक रुकावट से बनी झील) बन गई। कुछ ही दिनों में इसमें करीब 20 से 25 लाख घन मीटर पानी जमा हो गया, जिसे देखते हुए चीन ने अलर्ट जारी किया और नेपाल में बचाव अभियान करीब चार घंटे के लिए रोकना पड़ा। हालांकि झील का एक किनारा टूटने से पानी नियंत्रित ढंग से बाहर निकलने लगा और बड़ा खतरा फिलहाल टल गया, लेकिन चीनी और नेपाली वैज्ञानिकों ने इस पर लगातार निगरानी की जरूरत बताई है क्योंकि झील के दोबारा फटने की आशंका अभी पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती। एक चीनी भूवैज्ञानिक विशेषज्ञ ने यह भी चेतावनी दी है कि इस क्षेत्र में बिखरी सैकड़ों अन्य हिमनद झीलें भी संभावित खतरा बनी हुई हैं।
भारत में भी खतरे की घंटी
इस हादसे ने भारत के हिमालयी राज्यों में भी अलार्म बजा दिया है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) की रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल से सटे उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार में हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (जीएलओएफ) का खतरा लगातार बढ़ रहा है। हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में 25 हजार से ज्यादा ग्लेशियर मौजूद हैं, और उत्तराखंड में ही 219 “हैंगिंग ग्लेशियर” चिन्हित किए जा चुके हैं। कोसी और गंडक नदी बेसिन में करीब 45 झीलें संभावित खतरनाक श्रेणी में आती हैं, और इनमें से किसी एक झील के फटने का सीधा असर बिहार व उत्तर प्रदेश के घनी आबादी वाले मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है। सतलुज नदी बेसिन पर हुए एक अध्ययन में भी सामने आया है कि साल 2019 में जहां हिमाचल प्रदेश और उससे सटे ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में करीब 560 हिमनद झीलें थीं, वहीं 2023 तक यह संख्या बढ़कर 1,048 हो चुकी है—यानी झीलों की संख्या करीब दोगुनी हो गई है।
वैज्ञानिकों की गहरी चिंता
नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में करीब 1.5 करोड़ लोग हिमनद झील बाढ़ के खतरे में रहते हैं। नेपाल के आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ बिशाल उप्रेती का कहना है कि हिमालय क्षेत्र में सिर के ऊपर मंडराते सैकड़ों “हैंगिंग ग्लेशियर” कभी भी फट सकते हैं। वैज्ञानिकों की चिंता सिर्फ ग्लेशियरों तक सीमित नहीं है—धरती के गर्म होने से जो बारिश पहले बर्फ के रूप में गिरती थी, वह अब ज्यादा ऊंचाई पर भी बारिश के रूप में गिरने लगी है, जिससे भूस्खलन और मिट्टी कटाव का खतरा और बढ़ गया है। यही वजह है कि दुनिया भर के वैज्ञानिक अब बार-बार यह चेतावनी दे रहे हैं कि हिमालय जैसे ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लाखों-करोड़ों लोगों का जीवन दिनोंदिन ज्यादा अनिश्चित और खतरनाक होता जा रहा है।
कितना बड़ा है नुकसान?
इस आपदा से हुए नुकसान का दायरा बेहद व्यापक है। एक दर्जन से ज्यादा जलविद्युत परियोजनाएं पूरी तरह तबाह हो गईं, जिनमें करीब 430 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई—यह नेपाल की कुल स्थापित क्षमता का करीब आठवां हिस्सा है। कई स्थायी और अस्थायी पुल बह गए, ऐतिहासिक त्रिशूली बाजार लगभग पूरी तरह डूब गया, और नेपाल-चीन सीमा पर व्यापार व पर्यटन का प्रमुख प्रवेश द्वार माना जाने वाला ग्यारोंग बंदरगाह परिसर पूरी तरह नष्ट हो गया। 90 हजार से ज्यादा लोग इस आपदा से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए हैं। नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले के मुताबिक पुनर्निर्माण पर करीब 4 से 5 अरब डॉलर का खर्च आ सकता है, जो नेपाल की कुल अर्थव्यवस्था के करीब दसवें हिस्से के बराबर है।
दुनिया ने बढ़ाया मदद का हाथ
इस त्रासदी के बाद दुनिया भर के देशों ने नेपाल की मदद के लिए हाथ बढ़ाया:
- भारत ने वायुसेना के विमानों से राहत सामग्री की कई खेप भेजीं और बचाव दल भी रवाना किए।
- दक्षिण कोरिया ने राहत दल भेजने के साथ आपदा राहत टीम और करीब 10 लाख डॉलर की आर्थिक मदद देने की घोषणा की।
- ब्रिटेन ने बचावकर्मी भेजने की पेशकश के साथ करीब 6.79 करोड़ रुपये (लाखों पाउंड) की सहायता राशि जारी की।
- यूरोपीय संघ ने राहत और बचाव के लिए सहायता जुटाने की बात कही।
- अमेरिका ने आपदा प्रतिक्रिया सलाहकार भेजने के साथ करीब पांच लाख डॉलर की आर्थिक मदद का ऐलान किया।
- चीन ने आपातकालीन राहत सामग्री भेजने के साथ आर्थिक सहायता की व्यवस्था की।
- संयुक्त राष्ट्र ने अपनी टीमों और सहयोगी संगठनों के जरिए राहत सामग्री व जरूरी कर्मियों की व्यवस्था की।
भारत की भूमिका: “असाधारण उदारता”
भारत ने इस आपदा में नेपाल का साथ बेहद तेजी से दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह से फोन पर बात कर हर संभव मदद का भरोसा दिलाया। इसके कुछ ही घंटों बाद भारतीय वायुसेना के सी-130जे विमान से 10 टन मानवीय सहायता और आपदा राहत (एचएडीआर) सामग्री की पहली खेप गाजियाबाद के हिंडन एयरबेस से काठमांडू रवाना की गई। इसके बाद सी-17 विमान से 37.5 टन राहत सामग्री की दूसरी खेप भी भेजी गई। भारत ने एक बैली ब्रिज भी नेपाल भेजा है, ताकि टूटे हुए पुलों के कारण ठप पड़े आवागमन को बहाल किया जा सके। गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार के मुख्यमंत्री से बात कर संभावित खतरे से निपटने में केंद्र सरकार की पूरी मदद का भरोसा दिलाया, वहीं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नेपाल के प्रति गहरी संवेदना जताई। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बताया कि नेपाल की मदद के लिए जरूरी दवाइयां भी भेजी गई हैं। नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले ने खुद स्वीकार किया कि भारत ने इस त्रासदी के समय “असाधारण रूप से उदार” रुख दिखाया है।
आगे की राह
फिलहाल नेपाल में राहत और तलाश अभियान जारी है, लेकिन खराब मौसम, घना कोहरा और नई झील का खतरा बार-बार इसमें रुकावट डाल रहा है। हजारों लोग अब भी लापता हैं, और उनकी तलाश एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इस बीच यह आपदा पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक चेतावनी की तरह सामने आई है—जहां जलवायु परिवर्तन के चलते ग्लेशियर तेजी से पिघल और टूट रहे हैं, वहीं करोड़ों लोग इन पहाड़ों की तलहटी में बसे हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते हिमनद झीलों की निगरानी, चेतावनी प्रणाली और आपदा तैयारियों को मजबूत नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में इस तरह की घटनाएं और ज्यादा बार-बार तथा और ज्यादा विनाशकारी हो सकती हैं।
