बांग्लादेश ने संकेत दिया है कि वह हाल ही में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच बने रक्षा गठबंधन में शामिल होने के लिए खुला है, हालांकि इस पर अंतिम फैसला देश के राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा। यह बात बांग्लादेश की सरकार में शामिल दो कनिष्ठ मंत्रियों ने कही है।
क्या है मक्का रक्षा समझौता:
7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब के शहर मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किए के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक ऐतिहासिक रक्षा समझौते — “मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट” (जिसे “मक्का संयुक्त निवारण समझौता” भी कहा जा रहा है) — पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के तहत तीनों देशों ने सामूहिक निवारण (कलेक्टिव डिटरेंस) की एक व्यवस्था बनाई है, जिसका सबसे अहम प्रावधान यह है कि तीनों में से किसी भी एक देश पर हुआ सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा — कुछ हद तक नाटो के “अनुच्छेद 5” जैसी व्यवस्था के समान, हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि इसे नाटो के बराबर मानना जल्दबाजी होगी।
यह समझौता वास्तव में सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रियाद में हुए द्विपक्षीय “स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट” (एसएमडीए) का विस्तार है, जिसमें अब तुर्किए को भी शामिल कर लिया गया है। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच सैन्य सहयोग का इतिहास दशकों पुराना है — पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी सेना को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देता रहा है, जबकि 2023 में सऊदी अरब ने तुर्किए से ड्रोन खरीदने का समझौता भी किया था।
समझौते के पीछे की वजह
यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया में अमेरिका और इजरायल के ईरान के साथ युद्ध के चलते तनाव चरम पर है। सऊदी अरब पर ईरानी ड्रोन हमले भी हुए थे, जिसने उसकी तेल आपूर्ति और आंतरिक स्थिरता को खतरे में डाला था। हालांकि तुर्किए और पाकिस्तान सीधे तौर पर इस लड़ाई से प्रभावित नहीं हुए, लेकिन क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता को लेकर दोनों देश चिंतित बताए जाते हैं। विश्लेषकों के मुताबिक बातचीत की शुरुआत असल में अक्टूबर 2023 में हमास के इजरायल पर हमले और उसके बाद गाजा युद्ध के दौरान ही हो गई थी, जो अमेरिका-इजरायल के ईरान युद्ध के बीच और तेज हो गई।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ 6 अगस्त को जेद्दा पहुंचे थे और उन्होंने मक्का में उमराह भी किया, उसके अगले दिन यह समझौता हुआ।
तीनों देशों की सैन्य ताकत
अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार तीनों देश मिलकर एक बड़ा सैन्य गठबंधन बनाते हैं — करीब 14 लाख सक्रिय सैनिक, 3,400 विमान, 6,000 टैंक और 340 से अधिक नौसैनिक संपत्तियां (2026 के ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स के अनुसार)। तीनों देशों का संयुक्त रक्षा बजट करीब 124.4 अरब डॉलर सालाना है, जिसमें सऊदी अरब सबसे आगे (63.9 अरब डॉलर), उसके बाद तुर्किए (51.4 अरब डॉलर) और पाकिस्तान (9.1 अरब डॉलर) है। सऊदी अरब एक प्रमुख तेल निर्यातक है, तुर्किए के पास नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना है, और पाकिस्तान इकलौता मुस्लिम-बहुल परमाणु शक्ति संपन्न देश है।
बांग्लादेश का रुख
बांग्लादेश सरकार में विदेश मामलों के नवनियुक्त राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने कहा कि बांग्लादेश सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए से जुड़े किसी आर्थिक या रक्षा ढांचे में शामिल होने की संभावना को लेकर सकारात्मक रुख रखता है, बशर्ते इसमें देश के अपने हित और वैश्विक अर्थव्यवस्था व व्यापार की बदलती गतिशीलता को ध्यान में रखा जाए। राज्य संचालित बीएसएस की बांग्ला सेवा को दिए एक साक्षात्कार में कबीर ने कहा कि सरकार “बांग्लादेश फर्स्ट” नीति और राष्ट्रीय हितों को केंद्र में रखने वाली संतुलित विदेश नीति अपना रही है, जो ढाका को इस रक्षा समझौते में शामिल होने की दिशा में ले जा सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लादेश सामान्य कूटनीतिक जुड़ाव के जरिए पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करेगा, जिसमें व्यापार और लोगों के बीच आपसी संपर्क पर जोर होगा। कबीर ने बताया कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के निमंत्रण पर रियाद जाना है, और दौरे का कार्यक्रम गर्मियों के बाद अंतिम रूप लेने की उम्मीद है।
विदेश मामलों की एक अन्य राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने भी शुक्रवार को एक अलग मीडिया बातचीत में कबीर की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि इस समझौते में शामिल होने पर बांग्लादेश का रुख उसके राष्ट्रीय हित और जनता के हितों से ही तय होगा। जब उनसे पूछा गया कि क्या बांग्लादेश इस त्रिपक्षीय ढांचे का हिस्सा बनेगा, तो उन्होंने कहा कि किसी भी समझौते या बहुपक्षीय संगठन में शामिल होने का फैसला मुख्यतः इस आधार पर होगा कि उससे बांग्लादेश और बांग्लादेशी जनता के हित सुरक्षित रहते हैं या नहीं।
इन दोनों मंत्रियों की टिप्पणी बांग्लादेश के वित्त एवं योजना सलाहकार प्रोफेसर रशीद अल महमूद तितुमीर के उस बयान के दो दिन बाद आई है, जिसमें उन्होंने “बांग्लादेश फर्स्ट” नीति को देश की विदेश नीति में एक “बड़ा बदलाव” बताया था। तितुमीर के अनुसार यह नीति राष्ट्रीय हित, संप्रभुता, आपसी सम्मान और क्षेत्रीय सद्भाव को बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव के केंद्र में रखती है, जबकि सभी देशों के साथ रचनात्मक और परस्पर लाभकारी संबंध बनाए रखने पर जोर देती है। तितुमीर ने कहा, “बांग्लादेश फर्स्ट नीति का मतलब है बांग्लादेश के हितों को पहले रखना, लेकिन बांग्लादेश सबके लिए है।”
अन्य देशों के जुड़ने की संभावना
तुर्किए के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने भी संकेत दिया है कि अंकारा चाहता है कि यह समझौता तीन देशों तक सीमित न रहकर और देशों को भी इसमें शामिल किया जाए। तुर्क सरकारी समाचार एजेंसी अनादोलू को दिए बयान में फिदान ने राष्ट्रपति एर्दोआन के हवाले से कहा कि इस गठबंधन को बढ़ाकर जरूरत पड़ने पर अन्य देशों को भी इस छतरी के नीचे लाया जाना चाहिए।
समझौते का वैश्विक असर
विश्लेषकों के अनुसार यह समझौता मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया में बनती एक बहुध्रुवीय (मल्टीपोलर) व्यवस्था का संकेत है। अटलांटिक काउंसिल के विशेषज्ञों के मुताबिक तुर्किए के लिए यह पहले से कतर, सीरिया और लीबिया तक फैले उसके सहयोगी दायरे को और मजबूती और नए संसाधन देता है, जो एक तरह से मुस्लिम देशों की सामूहिक रक्षा व्यवस्था के रूप में उभर रहा है। सऊदी अरब के लिए यह समझौता अमेरिका पर अपनी सुरक्षा निर्भरता को कम करने और अपने रक्षा सहयोगियों में विविधता लाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
कुछ टिप्पणीकारों का मानना है कि यह समझौता अमेरिका और इजरायल के लिए एक तरह का झटका है। तुर्किए के इजरायल से रिश्ते पहले ही बेहद तनावपूर्ण हैं, और सऊदी अरब के इस कदम को “अब्राहम समझौते” (Abraham Accords) में शामिल होकर इजरायल से रिश्ते सामान्य करने की अमेरिकी उम्मीदों को दरकिनार करने के तौर पर भी देखा जा रहा है।
हालांकि पाकिस्तान के इस्लामाबाद स्थित रक्षा विश्लेषक अब्दुल्लाह खान जैसे कई जानकार इस बात पर सतर्क करते हैं कि इस समझौते को ईरान या किसी अन्य देश के खिलाफ निर्देशित नहीं माना जाना चाहिए, और पाकिस्तानी अधिकारियों ने भी इसे “विशुद्ध रूप से रक्षात्मक” (purely defensive) करार दिया है, साथ ही यह भी कहा है कि यह भविष्य में अन्य देशों के लिए भी खुला है।
भारत पर क्या असर:
भारत के विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया सतर्क लेकिन संयमित रही है। मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि भारत इस समझौते के “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “क्षेत्रीय शांति व स्थिरता” पर पड़ने वाले प्रभावों की समीक्षा कर रहा है, और भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करेगा।
भारतीय रणनीतिक हलकों में इसे लेकर चिंता और संशय दोनों देखे जा रहे हैं। कुछ विश्लेषक इसे पाकिस्तान की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता मान रहे हैं, क्योंकि इससे उसे एक धनी खाड़ी सहयोगी (सऊदी अरब) और एक मजबूत सैन्य-औद्योगिक साझेदार (तुर्किए) दोनों का साथ मिलता दिख रहा है। सबसे संवेदनशील सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान की परमाणु क्षमता — जिसे कभी “इस्लामिक बम” भी कहा गया — इस समझौते के दायरे में सऊदी अरब को भी सुरक्षा कवच के तौर पर उपलब्ध होगी। हालांकि इसकी औपचारिक पुष्टि किसी पक्ष ने नहीं की है, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ पहले यह कह चुके हैं कि जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम सऊदी अरब के लिए भी उपलब्ध कराया जाएगा।
भारतीय रणनीतिकारों के लिए दो सवाल सबसे अहम माने जा रहे हैं। पहला — अगर भविष्य में भारत आतंकी ढांचे या सैन्य ठिकानों पर पाकिस्तान में कोई कार्रवाई करता है, तो क्या इस्लामाबाद इस समझौते के सामूहिक रक्षा प्रावधान को आधार बनाकर इसे भुनाने की कोशिश करेगा? दूसरा — क्या यह समझौता आगे चलकर तुर्किए-पाकिस्तान के बीच एक दीर्घकालिक सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ की नींव रखेगा, जिसे सऊदी अरब के पैसे का साथ मिले? गौरतलब है कि मई 2025 में भारत के “ऑपरेशन सिंदूर” के दौरान पाकिस्तान को ज्यादातर सैन्य साजो-सामान और तकनीकी मदद चीन से मिली थी, लेकिन तुर्किए ने भी ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरण देकर पाकिस्तान का साथ दिया था — जो भारत के लिए एक चेतावनी संकेत माना जा रहा है।
हालांकि कई विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भारत को इस समझौते से घबराने की जरूरत नहीं है। उनका तर्क है कि यह समझौता मूल रूप से रक्षात्मक है, इसका कोई सीधा निशाना नहीं है, और इसका जोर रणनीतिक आत्मनिर्भरता पर ज्यादा है। इस तर्क के समर्थन में यह उदाहरण भी दिया जाता है कि सितंबर 2025 में हुए सऊदी-पाकिस्तान समझौते के बावजूद, जब फरवरी 2026 में शुरू हुए अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध के दौरान ईरान ने सऊदी अरब पर हमला किया, तो पाकिस्तान ने अपने सहयोगी की सैन्य मदद के लिए कोई हस्तक्षेप नहीं किया था। इससे संकेत मिलता है कि निकट भविष्य में इस समझौते से किसी ठोस सैन्य कार्रवाई की उम्मीद कम ही है।
फिलहाल यह समझौता अपने शुरुआती चरण में है और इसके ब्योरे — जैसे परमाणु छतरी का दायरा, संयुक्त कमान ढांचा और सैन्य समन्वय की सीमाएं — अभी स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन इतना तय है कि यह समझौता पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की सुरक्षा संरचना में एक नई इबारत लिख रहा है, जिसमें अमेरिका की पारंपरिक भूमिका को चुनौती मिलती दिख रही है। बांग्लादेश जैसे और देशों की दिलचस्पी यह भी दिखाती है कि आने वाले समय में यह गठबंधन सिर्फ तीन देशों तक सीमित नहीं रह सकता। भारत के लिए यह जरूरी होगा कि वह इस बदलते समीकरण पर करीबी नजर रखे, खासकर पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन के लिहाज से।
