उत्तर प्रदेश देश की कुल आबादी का 16.51 प्रतिशत हिस्सा रखता है, जबकि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में उसकी हिस्सेदारी महज 7.3 प्रतिशत है। इतनी बड़ी आबादी और अपेक्षाकृत सीमित भूभाग वाले इस राज्य में इन दिनों एक्सप्रेसवे, औद्योगिक गलियारों और अन्य बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का जाल तेजी से फैल रहा है। गंगा एक्सप्रेसवे के लिए करीब 9,500 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया गया, जिसमें 519 गांवों के किसान प्रभावित हुए। इसके किनारे विकसित होने वाले औद्योगिक गलियारे के लिए 300 हेक्टेयर से अधिक अतिरिक्त भूमि प्रस्तावित है। विंध्य एक्सप्रेसवे के लिए प्रयागराज में अकेले करीब 210 हेक्टेयर भूमि और गोरखपुर-शामली एक्सप्रेसवे के किनारे बिजनौर में करीब आठ हजार किसानों की लगभग 500 हेक्टेयर भूमि चिह्नित किए जाने की बात सामने आई है। आने वाले समय में यह सूची और लंबी होने की संभावना है। विकास की यह रफ्तार निश्चित रूप से प्रभावशाली है, लेकिन इसके बीच एक बुनियादी सवाल लगातार खड़ा होता है—इस विकास की कीमत आखिर कौन चुका रहा है?
राजधानी लखनऊ इसका सबसे नज़दीकी उदाहरण है। गोमतीनगर विस्तार, सुल्तानपुर रोड, रायबरेली रोड, कानपुर रोड, मोहनलालगंज और सरोजनीनगर जैसी पट्टियों में जो ज़मीन कल तक राजस्व अभिलेखों में विशुद्ध कृषि भूमि थी, आज वह निवेशकों की नज़र में “भविष्य के शहर” का हिस्सा बन चुकी है। हाल के महीनों में लखनऊ के आसपास के गांवों में कृषि भूमि के बैनामों में भारी उछाल देखा गया, और सर्किल रेट कहीं-कहीं 200 प्रतिशत तक बढ़ाए जाने के प्रस्ताव पर काम चल रहा है। जो खेत कभी 20 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर के भाव पर बिकते थे, वे अब 90-98 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक पहुंच रहे हैं। ज़मीन की कीमत बढ़ना बुरी बात नहीं, पर यह भी सच है कि हर बढ़ी हुई कीमत के पीछे एक खेत कम हो जाता है।
आंकड़े जो चेतावनी दे रहे हैं
उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का आधार आज भी खेती ही है। राज्य की करीब 65 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, जबकि राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों का योगदान लगभग एक-चौथाई (24-25 प्रतिशत के आसपास) है। यानी लगभग दो-तिहाई आबादी, अर्थव्यवस्था के महज़ एक-चौथाई हिस्से पर निर्भर है — यह असंतुलन खुद बताता है कि कृषि क्षेत्र में प्रच्छन्न बेरोज़गारी (यानी ज़रूरत से ज़्यादा लोगों का खेती पर निर्भर होना, जबकि वास्तविक उत्पादक योगदान सीमित है) कितनी गहरी है। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो देश के कुल खाद्यान्न भंडार में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुकी है और गेहूं उत्पादन में तो राज्य देश में नंबर एक है। यानी यह प्रदेश केवल अपने लिए नहीं, पूरे देश की खाद्य सुरक्षा के लिए भी ज़िम्मेदार है।
ऐसे में जब हर साल हज़ारों हेक्टेयर उपजाऊ ज़मीन सड़कों, औद्योगिक गलियारों और शहरी विस्तार की भेंट चढ़ती है, तो यह केवल किसी एक गांव या ज़िले का नुकसान नहीं रह जाता, बल्कि राज्य और देश की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा से जुड़ा सवाल बन जाता है। सरकार खुद यह मानती है कि हर साल बड़ी मात्रा में कृषि भूमि खेती के दायरे से बाहर हो रही है — इसी वजह से हाल में 43,850 हेक्टेयर बंजर और अनुपयोगी भूमि को दोबारा खेती लायक बनाने की योजना शुरू करनी पड़ी है, ताकि घटती कृषि भूमि की भरपाई हो सके। यह प्रयास स्वागतयोग्य है, पर यह इस बात का भी सबूत है कि समस्या कितनी वास्तविक है।
SCR यानी एक और शहर, एक और गांवों का समर्पण
राज्य सरकार ने दिल्ली-एनसीआर की तर्ज़ पर लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, बाराबंकी, हरदोई और सीतापुर को मिलाकर राज्य राजधानी क्षेत्र (State Capital Region – SCR) का गठन किया है, जिसका कुल क्षेत्रफल लगभग 27,826 वर्ग किलोमीटर और आबादी सवा दो करोड़ के आसपास है। SCR के तहत सड़क, मेट्रो, आवास और औद्योगिक निवेश की योजनाएं बनेंगी। यह अवधारणा प्रदेश के आर्थिक विकास की दृष्टि से बेशक जायज़ ठहराई जा सकती है — निवेश आएगा, रोज़गार के औपचारिक अवसर बढ़ेंगे, बुनियादी ढांचा मज़बूत होगा।
पर सवाल यही है कि इतने बड़े भूभाग को “राजधानी क्षेत्र” के सांचे में ढालने का मतलब क्या हुआ? इसका सीधा अर्थ है — छह ज़िलों के सैकड़ों गांवों की कृषि भूमि, आने वाले वर्षों में चरणबद्ध ढंग से आवासीय, औद्योगिक और वाणिज्यिक उपयोग में बदल दी जाएगी। एनसीआर का अनुभव हमारे सामने है — दिल्ली के आसपास के गांव आज न पूरी तरह गांव रहे, न ठीक से शहर बन पाए। खेत कंक्रीट में बदल गए, पर बहुसंख्य मूल निवासियों को स्थायी, कुशल रोज़गार नहीं मिल सका। क्या SCR के छह ज़िलों में भी यही दोहराया जाएगा?
किसान से मज़दूर तक का सफर
ज़मीन अधिग्रहण की कहानियां अक्सर मुआवज़े की बड़ी रकम के इर्द-गिर्द घूमती हैं — कोई किसान करोड़पति बन गया, किसी गांव में ज़मीन के भाव आसमान छू गए। यह सच है, पर अधूरा सच है। मुआवज़े की रकम एक बार मिलती है; आजीविका रोज़ चाहिए होती है। जिस किसान की पहचान सदियों से “अपनी ज़मीन का मालिक” रही, वह मुआवज़े की रकम खर्च होने के बाद अक्सर उसी औद्योगिक परिसर में मज़दूर या चौकीदार बनकर रह जाता है, जो कभी उसके खेत पर बना था। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी गहरा असर छोड़ता है — आत्मनिर्भर उत्पादक से आश्रित मज़दूर बनने की यह यात्रा शायद ही कभी नीति-निर्माताओं के आंकड़ों में दर्ज होती है।
हवा-पानी की कीमत
विकास की इस दौड़ में पर्यावरणीय कीमत भी कम नहीं। औद्योगिक गलियारों और घनी होती आबादी के साथ राज्य के कई औद्योगिक व शहरी हिस्सों में वायु गुणवत्ता लगातार खराब स्तर पर बनी रहती है, और नदियों-भूजल में औद्योगिक व शहरी कचरे का दबाव बढ़ता जा रहा है। जो गांव कभी अपने कुओं और तालाबों के साफ पानी और खुली हवा के लिए जाने जाते थे, वे अब औद्योगिक गलियारों की सीमा में समा जाने के बाद उसी प्रदूषण के सबसे नज़दीकी शिकार बनते हैं, जिससे शहर परेशान रहते हैं। यानी गांव को “विकसित” करने के नाम पर, उसे शहर की सबसे बड़ी समस्याएं भी विरासत में मिल जाती हैं।
विकास का मतलब गांव को शहर बनाना नहीं
यहीं पर सोच बदलने की ज़रूरत है। विकास का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कितने गांव शहर में तब्दील हुए, बल्कि यह होना चाहिए कि कितने गांवों को गांव बने रहते हुए बेहतर जीवन-स्तर मिला। चौड़ी सड़कें और ऊंची इमारतें बनाने की बजाय, गांवों को स्मार्ट विलेज के रूप में विकसित करना कहीं अधिक टिकाऊ और न्यायसंगत रास्ता है। सरकार की स्वामित्व योजना के तहत राज्य के करीब 90 हज़ार गांवों का ड्रोन सर्वेक्षण होकर संपत्ति के डिजिटल रिकॉर्ड बनाए जाना इसी दिशा में एक अच्छी शुरुआत है, पर यह पर्याप्त नहीं।
स्मार्ट विलेज की अवधारणा का मतलब है — गांव अपनी मूल पहचान, अपनी खेती-किसानी और अपने सामाजिक ताने-बाने के साथ बना रहे, पर उसमें बुनियादी सुविधाएं शहर जैसी हों: निर्बाध बिजली, शुद्ध पेयजल, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाएं, डिजिटल कनेक्टिविटी, कृषि उपज के भंडारण व प्रसंस्करण की स्थानीय सुविधाएं, और सबसे ज़रूरी — गांव में ही रोज़गार के वास्तविक अवसर। खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां, कृषि-आधारित लघु उद्योग, डेयरी व पशुपालन, हस्तशिल्प और कौशल-विकास केंद्र — यह सब गांव के भीतर या उसके नज़दीक स्थापित हों, ताकि युवाओं को रोज़गार के लिए शहर की ओर पलायन न करना पड़े और खेती पर आबादी का दबाव भी कम हो।
प्रच्छन्न बेरोज़गारी की जो समस्या दशकों से प्रदेश के गांवों में बनी हुई है, उसका समाधान गांव उजाड़ने में नहीं, बल्कि गांव के भीतर वैकल्पिक व स्वरोज़गार के अवसर वास्तविक ज़मीन तक पहुंचाने में है। योजनाएं कागज़ों में बहुत हैं — कौशल विकास से लेकर मुद्रा लोन तक — पर जब तक ये योजनाएं गांव के हर उस युवा तक व्यवहारिक रूप में नहीं पहुंचतीं, जो खेत में सिर्फ इसलिए मज़दूरी कर रहा है क्योंकि कोई और विकल्प नहीं है, तब तक कागज़ी विकास और ज़मीनी हकीकत के बीच का फासला बना रहेगा।
चेतावनी अनदेखी न हो
अगर यही रफ्तार जारी रही — हर साल हज़ारों हेक्टेयर उपजाऊ भूमि का गैर-कृषि उपयोग में बदलना, गांवों का शहरी विस्तार में विलय, और साथ ही रोज़गार व स्वरोज़गार के वास्तविक अवसरों की कमी — तो आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश एक साथ दो संकटों का सामना कर सकता है: घटती कृषि भूमि और बढ़ती आबादी के कारण खाद्य सुरक्षा पर दबाव, और शहरों में बिना कुशल रोज़गार के पहुंचे विस्थापित ग्रामीण युवाओं की भीड़ के रूप में बेरोज़गारी का नया संकट।
विकास ज़रूरी है, एक्सप्रेसवे और उद्योग भी ज़रूरी हैं — इनसे इनकार नहीं किया जा सकता। पर विकास की परिभाषा में यह भी शामिल होना चाहिए कि गांव अपनी जगह पर, अपनी पहचान के साथ, बेहतर सुविधाओं और स्वरोज़गार के अवसरों के साथ बना रहे। सड़क चौड़ी करने से पहले यह सोचना ज़रूरी है कि उस सड़क के किनारे खड़ा किसान, कल कहां खड़ा होगा — अपने खेत में, या किसी और की फैक्ट्री के गेट पर मज़दूरी की तलाश में?
