13 सितंबर 2026 को मुंबई में भाजपा के “सेवा संकल्प अभियान” की शुरुआत के मौके पर पत्रकारों से बातचीत करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) द्वारा शासित सभी 21 राज्यों में वर्ष 2029 से पहले समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू कर दी जाएगी। उन्होंने कहा कि इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की दिशा में जरूरी प्रयास किए जाएंगे। शाह ने तीन तलाक कानून को मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार देने की दिशा में एक बड़ा कदम बताते हुए यह भरोसा जताया कि अगले लोकसभा चुनाव (2029) से पहले यह लक्ष्य पूरा हो जाएगा।
गौरतलब है कि यह बयान पीएम मोदी के जन्मदिन (17 सितंबर) से ठीक पहले आया है, जब भाजपा एक महीने तक चलने वाले बड़े सेवा अभियान की भी शुरुआत कर रही है। पार्टी की रणनीति साफ दिखती है — एक तरफ यूसीसी को राज्यों तक विस्तार देने की योजना, दूसरी तरफ जनसेवा के जरिए जनसंपर्क बढ़ाने की कोशिश।
यूसीसी क्या है?
समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) एक ऐसा प्रस्तावित कानून है जो विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार (विरासत) और भरण-पोषण जैसे व्यक्तिगत मामलों (पर्सनल लॉ) में सभी धर्मों, जातियों और समुदायों के नागरिकों पर एक समान कानून लागू करने की बात करता है। मौजूदा व्यवस्था में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी आदि समुदायों के अपने-अपने पर्सनल लॉ हैं, जो इन्हीं पारिवारिक और व्यक्तिगत मामलों को अलग-अलग तरीके से नियंत्रित करते हैं। यूसीसी का मकसद इन सबको हटाकर एक साझा, धर्मनिरपेक्ष कानूनी ढांचा बनाना है, जो देश के हर नागरिक पर समान रूप से लागू हो।
संविधान में यूसीसी का जिक्र अनुच्छेद 44 में मिलता है, जो राज्य के नीति निदेशक तत्वों (Directive Principles of State Policy – DPSP) का हिस्सा है। इसमें कहा गया है कि “राज्य भारत के समूचे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।” चूंकि यह डायरेक्टिव प्रिंसिपल है, इसलिए यह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है — यानी सरकार को इसे लागू करना संवैधानिक तौर पर अनिवार्य नहीं है, लेकिन यह शासन की दिशा तय करने वाला एक मार्गदर्शक सिद्धांत जरूर है।
भारत में मौजूदा स्थिति
भारत में यूसीसी का मुद्दा आजादी के बाद से ही राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय रहा है। संविधान सभा में इस पर लंबी चर्चा हुई थी, लेकिन तब इसे तुरंत लागू करने की बजाय एक भविष्य के लक्ष्य के रूप में रखा गया।
- गोवा: भारत का इकलौता राज्य है जहां पुर्तगाली शासनकाल से चली आ रही “गोवा सिविल कोड” के रूप में एक समान नागरिक संहिता पहले से लागू है। यह 1867 के पुर्तगाली सिविल कोड पर आधारित है और आजादी के बाद भी यहां जारी रही।
- उत्तराखंड: देश का पहला ऐसा राज्य बना जिसने आजादी के बाद विशेष रूप से यूसीसी कानून बनाकर लागू किया। इसे 26 जनवरी 2025 से पूरे राज्य में लागू किया गया। इसके तहत विवाह, तलाक, लिव-इन रिलेशनशिप और उत्तराधिकार से जुड़ी अनिवार्य पंजीकरण व्यवस्था बनाई गई। हालांकि इस कानून में अनुसूचित जनजातियों (ST) को दायरे से बाहर रखा गया है।
- अन्य राज्य: गुजरात, असम, मध्य प्रदेश जैसे कुछ भाजपा शासित राज्यों ने यूसीसी पर समितियां गठित कर मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की है, लेकिन अभी तक इन राज्यों में इसे पूर्ण रूप से लागू नहीं किया गया है।
- केंद्र स्तर पर: राष्ट्रीय स्तर पर यूसीसी अभी तक लागू नहीं हुई है। 22वें विधि आयोग ने इस विषय पर जनता और संगठनों से राय मांगी थी, लेकिन कोई अंतिम मसौदा या कानून अभी संसद में पेश नहीं हुआ है।
इस तरह देखा जाए तो फिलहाल व्यवहारिक रूप से सिर्फ दो राज्यों — गोवा और उत्तराखंड — में यूसीसी जैसी व्यवस्था असल में लागू है।
अमित शाह के ऐलान का दायरा
शाह के बयान के मुताबिक लक्ष्य है कि भाजपा-एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में 2029 (अगले लोकसभा चुनाव) से पहले यूसीसी लागू कर दी जाए। यह एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य है क्योंकि अभी तक सिर्फ एक राज्य (उत्तराखंड) में ही इसे पूरी तरह लागू किया जा सका है, वह भी करीब चार साल की तैयारी और एक विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के बाद। बाकी 19-20 राज्यों में अभी यह प्रक्रिया शुरुआती चरण में है या शुरू ही नहीं हुई है।
संवैधानिक चुनौतियां
- राज्य सूची बनाम समवर्ती सूची का मसला: विवाह, तलाक, उत्तराधिकार जैसे विषय संविधान की समवर्ती सूची (कॉन्करेंट लिस्ट) में आते हैं, जिस पर राज्य और केंद्र दोनों कानून बना सकते हैं। इसी वजह से उत्तराखंड जैसे राज्य अपने स्तर पर यूसीसी बना पाए। लेकिन इससे यह जोखिम भी बनता है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रावधानों वाली “यूसीसी” बन सकती हैं, जो असल में समान संहिता के मूल विचार के ही खिलाफ है।
- अनुच्छेद 25, 26 से टकराव: संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार देता है। यूसीसी को लेकर यह तर्क दिया जाता रहा है कि अगर पर्सनल लॉ में एकरूपता थोपी जाए तो यह इन मौलिक अधिकारों से टकरा सकती है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में यह भी स्पष्ट किया है कि धार्मिक स्वतंत्रता असीमित नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता एवं अन्य मौलिक अधिकारों (जैसे समानता का अधिकार) के अधीन है।
- अनुच्छेद 14 और 15 का पहलू: दूसरी तरफ यूसीसी समर्थक यह तर्क देते हैं कि अलग-अलग पर्सनल लॉ के चलते महिलाओं और कुछ समुदायों के साथ भेदभाव होता है, जो अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (धर्म, जाति, लिंग के आधार पर भेदभाव न होना) के विरुद्ध है। यह तनाव — धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता का अधिकार — यूसीसी पर होने वाली अधिकांश संवैधानिक बहस का केंद्र है।
- आदिवासी और जनजातीय अधिकार: संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची के तहत आदिवासी क्षेत्रों और जनजातीय समुदायों को अपने रीति-रिवाजों और परंपरागत कानूनों के संरक्षण की विशेष गारंटी मिली है। उत्तराखंड यूसीसी में एसटी समुदाय को इसीलिए बाहर रखा गया। किसी भी राष्ट्रव्यापी या बहु-राज्यीय यूसीसी को इस संवैधानिक सुरक्षा कवच से टकराए बिना लागू करना एक बड़ी कानूनी चुनौती होगी।
वैधानिक (कानूनी) चुनौतियां
- मौजूदा पर्सनल लॉ का जटिल जाल: हिंदू विवाह अधिनियम, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत एप्लीकेशन एक्ट), भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, पारसी विवाह और तलाक अधिनियम जैसे कई अलग-अलग कानून दशकों से चले आ रहे हैं। इन सबको एक समान ढांचे में लाना विधायी दृष्टि से बेहद जटिल और समय लेने वाला काम है।
- मसौदा तैयार करने की जटिलता: उत्तराखंड में यूसीसी का मसौदा बनाने में जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति को करीब दो साल लगे। अगर 20 और राज्यों में इसी स्तर की गहन समीक्षा और मसौदा-निर्माण प्रक्रिया अपनानी हो, तो यह एक बहुत बड़ा प्रशासनिक और कानूनी उपक्रम होगा।
- न्यायिक समीक्षा का जोखिम: किसी भी राज्य में लागू यूसीसी कानून को अदालत में चुनौती दी जा सकती है, खासकर अगर यह किसी समुदाय के धार्मिक अधिकारों से सीधे टकराता दिखे। उत्तराखंड यूसीसी को भी लागू होने के तुरंत बाद कुछ याचिकाओं के जरिए अदालत में चुनौती दी गई थी।
- एकरूपता का अभाव: चूंकि हर राज्य अपना अलग यूसीसी कानून बना रहा है (राज्य सूची/समवर्ती सूची के दायरे में), इसलिए संभावना है कि उत्तराखंड, गुजरात, असम आदि के यूसीसी कानूनों में प्रावधान अलग-अलग हों। इससे “समान नागरिक संहिता” का मूल उद्देश्य — पूरे देश में एकरूपता — आंशिक रूप से ही पूरा हो पाएगा, जब तक केंद्र स्तर पर कोई राष्ट्रीय कानून नहीं आता।
- क्रियान्वयन की व्यावहारिक दिक्कतें: कानून बनाना एक बात है, उसे जमीन पर लागू करना दूसरी। लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य पंजीकरण जैसे प्रावधानों को लेकर उत्तराखंड में ही निजता के अधिकार से जुड़े सवाल उठे हैं। बड़ी आबादी वाले और सामाजिक विविधता से भरे राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश) में इसे लागू करना प्रशासनिक तौर पर कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होगा।
राजनीतिक-सामाजिक आयाम
यूसीसी का मुद्दा शुरू से ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है। भाजपा इसे अपने चुनावी एजेंडे और वैचारिक प्रतिबद्धता (अनुच्छेद 370 हटाने और राम मंदिर निर्माण के साथ) के तीसरे बड़े स्तंभ के तौर पर पेश करती रही है। दूसरी ओर, कई मुस्लिम संगठन, कुछ विपक्षी दल और आदिवासी समूह इसे धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता पर हमले के रूप में देखते हैं। कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि यूसीसी का क्रियान्वयन राज्य-दर-राज्य होने से यह राजनीतिक रूप से आसान तो हो जाता है, लेकिन इसका दीर्घकालिक असर संघीय ढांचे और कानूनी एकरूपता, दोनों पर पड़ सकता है।
अमित शाह का यह बयान भाजपा की यूसीसी को लेकर स्पष्ट और समयबद्ध रणनीति को दिखाता है — 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले 21 एनडीए शासित राज्यों में इसे लागू करने का लक्ष्य। लेकिन अनुच्छेद 44 का गैर-बाध्यकारी स्वरूप, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच का टकराव, आदिवासी समुदायों को मिली विशेष संवैधानिक सुरक्षा, और हर राज्य में अलग मसौदा-प्रक्रिया जैसी वास्तविकताएं बताती हैं कि यह लक्ष्य जितना राजनीतिक रूप से महत्वाकांक्षी है, उतना ही कानूनी और प्रशासनिक रूप से जटिल भी है। उत्तराखंड का अनुभव आगे के राज्यों के लिए एक मॉडल बन सकता है, लेकिन बड़ी आबादी और अधिक सामाजिक विविधता वाले राज्यों में इसकी राह उतनी सीधी नहीं होगी।
