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Home»राष्ट्रीय»SIR पर चुनाव आयोग में मतभेद, दो आयुक्तों ने 10 माह में 14 बार दर्ज कराई आपत्ति
राष्ट्रीय

SIR पर चुनाव आयोग में मतभेद, दो आयुक्तों ने 10 माह में 14 बार दर्ज कराई आपत्ति

NDMBy NDMSeptember 24, 2026No Comments4 Mins Read
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SIR पर चुनाव आयोग में मतभेद, दो आयुक्तों ने 10 माह में 14 बार दर्ज कराई आपत्ति
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द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार उन फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई, जो उनके मुताबिक उनकी जानकारी या सलाह के बिना लिए गए। इन आपत्तियों का संबंध मुख्य रूप से फॉर्म-6 में बदलाव, वोटर नाम हटाने-जोड़ने, अपीलों और वोटर डेटाबेस के नियंत्रण से था। ये सब विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मुद्दे हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यशैली पर उठे सवाल

1. सामूहिक निर्णय की भावना। संविधान और कानून की व्याख्या के अनुसार CEC “बराबरों में पहले” हैं, आयोग के एकमात्र निर्णायक नहीं। 1995 के टीएन शेषन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि CEC की बात हमेशा अंतिम मानने से चुनाव आयुक्तों की भूमिका केवल सजावटी रह जाएगी। अगर आरोप सही हैं कि फैसलों की जानकारी या सलाह ही नहीं ली गई, तो यह उसी भावना के खिलाफ जाता है।

2. संवेदनशील विषयों में केंद्रीकरण। आपत्तियाँ सबसे नाजुक मुद्दों पर हैं: कौन वोटर बनेगा, किसका नाम कटेगा और वोटर डेटा पर नियंत्रण किसका होगा। लोकतांत्रिक वैधता इन्हीं पर टिकी है, इसलिए यहाँ प्रक्रिया की पारदर्शिता सबसे ज़रूरी है।

3. सार्वजनिक भरोसे की समस्या। विपक्ष लंबे समय से आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाता रहा है। अब आरोप भीतर से आते दिख रहे हैं, इसलिए ये आरोप और भारी पड़ते हैं। विपक्ष ने तुरंत तीखी प्रतिक्रिया दी:

  • एमके स्टालिन ने CEC को तुरंत हटाने और SIR रोकने की मांग की।
  • ममता बनर्जी ने उनकी गिरफ्तारी की मांग की।
  • कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने आरोप लगाया कि फॉर्म 6 के दुरुपयोग, सॉफ्टवेयर के गलत इस्तेमाल और बिना पारदर्शिता के फैसलों के दस्तावेज सामने आए हैं।

आयोग का पक्ष

बुधवार को जारी सफाई में चुनाव आयोग ने कहा कि विचार-विमर्श में अलग-अलग राय और टिप्पणियाँ सामान्य हैं। उसके अनुसार 10 महीनों के कुछ चुनिंदा आंतरिक नोट उजागर करना और बड़ी संख्या में स्वीकृत निर्णयों को अनदेखा करना तस्वीर का एक ही पहलू दिखाता है। आयोग का दावा है कि SIR समेत सभी फैसले पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का नतीजा हैं। आयोग ने लगभग 40 नई पहलों का भी हवाला दिया

अन्य चुनाव आयुक्तों का पक्ष

मुझे संधू या जोशी का कोई सार्वजनिक बयान नहीं मिला। उनकी राय अब तक सिर्फ रिपोर्ट में बताए गए आंतरिक नोटों के ज़रिये सामने आई है। इसलिए उनकी आपत्तियों का ब्योरा और उन पर CEC की प्रतिक्रिया अभी एकतरफा, यानी रिपोर्ट और विपक्ष के हवाले से ही उपलब्ध है।

कसौटी: क्या साबित है और क्या नहीं

  • असहमति अपने आप में गलत नहीं। कानून के अनुसार आयोग का काम यथासंभव सर्वसम्मति से हो, पर मतभेद की स्थिति में बहुमत का फैसला चलता है। तीन सदस्यीय आयोग में असहमति व्यवस्था का हिस्सा है, संकट का प्रमाण नहीं। AajTak
  • असली सवाल प्रक्रिया का है। क्या आपत्तियाँ सुनी गईं, दर्ज हुईं और उन पर विचार करके निर्णय हुआ? या फैसले पहले हो गए और जानकारी बाद में दी गई? आयोग की “सर्वसम्मत” वाली बात और आपत्तियों की रिपोर्ट एक साथ सही भी हो सकती हैं, क्योंकि आपत्ति दर्ज होने के बाद भी अंतिम फैसला सर्वसम्मति से हो सकता है। इसे परखने के लिए पूरे रिकॉर्ड की ज़रूरत है (यह इस नोट का विश्लेषण है)।
  • रिपोर्ट अभी अपुष्ट है। आँकड़े और ब्योरे एक अखबार की रिपोर्ट पर आधारित हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि मुझे नहीं मिली। गिरफ्तारी या हटाने जैसी मांगें राजनीतिक हैं और अभी किसी कानूनी निष्कर्ष पर आधारित नहीं हैं। CEC को हटाने की प्रक्रिया भी संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी कठिन है।

निष्कर्ष

CEC पर सबसे जायज़ सवाल यही बनता है कि निर्णय-प्रक्रिया कितनी सहभागी और दर्ज-योग्य रही। इसका समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, पारदर्शिता से होगा: आपत्तियों और उन पर लिए गए फैसलों का रिकॉर्ड सामने आए, या कोई स्वतंत्र समीक्षा हो। जब तक ऐसा नहीं होता, आयोग की साख पर सवाल बने रहेंगे, चाहे अंतिम तथ्य जो भी निकलें।

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