आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने राज्य में तेजी से घट रही जन्म दर के मद्देनज़र एक ऐतिहासिक और चर्चित फैसला लिया है। नरसन्नापेटा में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने घोषणा की कि राज्य सरकार तीसरे बच्चे के जन्म पर ₹30,000 और चौथे बच्चे के जन्म पर ₹40,000 की प्रोत्साहन राशि देगी।
इससे पहले विधानसभा में ‘पोषण-शिक्षा-सुरक्षा’ पैकेज के तहत तीसरे बच्चे पर ₹25,000, हर महीने ₹1,000 (पांच साल तक) और 18 वर्ष तक निःशुल्क शिक्षा की घोषणा भी की जा चुकी है।
नायडू का बयान: “जनसंख्या वृद्धि अब बोझ नहीं, बल्कि वरदान है। हम इसे प्राथमिकता देकर बढ़ावा देंगे। जो राज्यों ने पहले परिवार नियोजन में अच्छा काम किया, उन्हें आज राजनीतिक नुकसान नहीं उठाना चाहिए।”
संकट की जड़: आंध्र में गिरती प्रजनन दर
किसी भी समाज में जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए एक महिला का औसतन 2.1 बच्चों को जन्म देना ज़रूरी होता है — इसे प्रतिस्थापन दर (Replacement Rate) कहा जाता है। लेकिन आंध्र प्रदेश में यह दर गिरकर मात्र 1.5 पर आ गई है।
इसका सीधा अर्थ है कि नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की जगह नहीं ले पा रही। युवाओं की संख्या घट रही है और वृद्धों की संख्या बढ़ रही है — यह समाज के लिए एक गंभीर आर्थिक और सामाजिक संकट है।
- आर्थिक प्रभाव – कम युवा = कम कार्यबल = कम उत्पादकता। सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर बोझ बढ़ेगा।
- राजनीतिक प्रभाव – कम जनसंख्या = परिसीमन में कम अनुपात = लोकसभा में कम प्रभावी प्रतिनिधित्व।
लैंसेट का अनुमान: एक अध्ययन के अनुसार भारत की प्रजनन दर 2050 तक 1.29 तक गिर सकती है — प्रतिस्थापन दर से बहुत नीचे। दक्षिण के राज्यों में यह प्रक्रिया पहले से शुरू हो चुकी है।
दक्षिण भारत के राज्यों — तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना — की असली आशंका यह नहीं है कि उनकी सीटें संख्या में घटेंगी, बल्कि यह है कि कुल सदन में उनका अनुपात (percentage) कम रह जाएगा, जबकि उत्तर भारत का अनुपात बढ़ जाएगा।
| राज्य | अभी की सीटें | प्रस्तावित सीटें | वृद्धि |
|---|---|---|---|
| तमिलनाडु | 39 | 59 | +20 |
| कर्नाटक | 28 | 42 | +14 |
| आंध्र प्रदेश | 25 | 38 | +13 |
| तेलंगाना | 17 | 26 | +9 |
| केरल | 20 | 30 | +10 |
| दक्षिण कुल | 129 | 195 | 23.76% → 23.97% |
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में परिसीमन विधेयक 2026 पर चर्चा के दौरान दक्षिण की आशंकाओं को सीधे नकारा। उन्होंने कहा कि सदन में दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व 23.76% से बढ़कर 23.97% हो जाएगा — यानी न केवल सीटें बढ़ेंगी, बल्कि अनुपात भी सुरक्षित रहेगा।
जनसंख्या को प्रोत्साहित करने की नीति आंध्र प्रदेश के लिए नई नहीं है — और भारत अकेला नहीं है। दुनिया के कई देश इस संकट से जूझ रहे हैं:
- दक्षिण कोरिया: दुनिया की सबसे कम TFR (~0.72)। सरकार ने बच्चे के जन्म पर भारी नकद प्रोत्साहन, मातृत्व अवकाश और चाइल्ड केयर सब्सिडी दी — फिर भी दर नहीं बढ़ी।
- जापान: घटती जनसंख्या से जूझ रहा है, विदेशी श्रमिकों को बुला रहा है। TFR 1.2 के करीब।
- चीन: दशकों की एक-बच्चा नीति के बाद अब तीन बच्चों को प्रोत्साहित कर रहा है — लेकिन परिणाम धीमे हैं।
- हंगरी, इटली, फिनलैंड: यूरोप के कई देश जन्म दर बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन योजनाएं चला रहे हैं।
- भारत: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी प्रत्येक परिवार से तीन बच्चे पैदा करने की अपील की है।
- असमानता का खतरा: प्रोत्साहन राशि मुख्यतः उन परिवारों को लुभाएगी जो पहले से आर्थिक दबाव में हैं — बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी बिना संसाधन के और बढ़ सकती है।
- महिलाओं पर बोझ: अधिक बच्चे पैदा करने की अपील महिलाओं की शिक्षा, करियर और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
- राजनीतिक प्रेरणा का सवाल: आलोचकों का कहना है कि यह नीति वास्तव में सामाजिक ज़रूरत से कम और राजनीतिक परिसीमन की चिंता से अधिक प्रेरित है।
- पर्यावरणीय दबाव: जनसंख्या वृद्धि से संसाधनों — पानी, भूमि, ऊर्जा — पर दबाव बढ़ेगा।
आंध्र प्रदेश का यह फैसला एक बड़े और जटिल जनसांख्यिकीय संकट की ओर इशारा करता है। जो राज्य परिवार नियोजन में अग्रणी रहे, आज उन्हें परिसीमन में अपना हिस्सा कम होते देखने की आशंका सता रही है — यह विडंबना ही है।
नायडू की प्रोत्साहन योजना एक प्रयोग है — और उसका परिणाम दशकों में ही दिखेगा। लेकिन असली सवाल यह है: क्या केवल पैसे देने से जन्म दर बढ़ेगी, या इसके लिए समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक ढांचे में गहरे बदलाव की ज़रूरत है?
