प्रजनन दर: कुछ दशक पहले जब भारत में हर दो-चार साल पर बच्चे होना आम बात थी, तब सरकार की सबसे बड़ी चिंता थी — ‘जनसंख्या विस्फोट’। रेडियो पर, दीवारों पर, स्कूल की किताबों में — हर जगह एक ही नारा गूंजता था: “हम दो, हमारे दो।”
और अब, 2026 में, वही सरकार — और वही समाज — एक बिल्कुल उलटी समस्या के सामने खड़ा है।
भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate — TFR) पहली बार ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ यानी 2.1 से नीचे आ गई है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की ताजा रिपोर्ट 2024 के अनुसार यह दर अब 1.9 प्रति महिला पर आ गई है। यह आंकड़ा बताता है कि भारतीय महिलाएं अपने पूरे जीवनकाल में औसतन दो से भी कम बच्चे पैदा कर रही हैं।
यह खबर सुनकर पहली प्रतिक्रिया हो सकती है — ‘अच्छा हुआ, आबादी कम होगी।’ लेकिन असलियत उससे कहीं ज्यादा पेचीदा है।
ऐतिहासिक परिदृश्य: आजादी से अब तक का सफर
1947-1952: आजाद भारत, और एक विरासत में मिली चुनौती
जब 1947 में भारत आजाद हुआ, तब देश की आबादी करीब 33 करोड़ थी और प्रजनन दर 6 से ऊपर थी। यानी एक महिला अपने जीवन में औसतन 6 से अधिक बच्चों को जन्म देती थी।
नेहरू सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी — इतनी बड़ी आबादी को खाना खिलाना, शिक्षित करना और रोजगार देना। इसी दबाव में 1952 में भारत दुनिया का पहला देश बना जिसने सरकारी स्तर पर परिवार नियोजन कार्यक्रम लागू किया।
शुरुआत धीमी थी। जागरूकता फैलाना, गर्भनिरोधक उपाय उपलब्ध कराना — ये काम स्वैच्छिक आधार पर थे।
1962-1977: लक्ष्य-आधारित जनसंख्या नीति और विवाद
1960 के दशक में नीति और आक्रामक हुई। 1966 से सरकारी स्वास्थ्यकर्मियों को नसबंदी के लक्ष्य दिए जाने लगे। लेकिन इस दौर की सबसे काली याद जुड़ी है 1975-77 के आपातकाल से।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 में इमरजेंसी लगाई। उनके बेटे संजय गांधी ने — बिना किसी सरकारी पद के — जनसंख्या नियंत्रण को अपना ‘मिशन’ बना लिया। जो हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक शर्मनाक अध्याय है।
अकेले 1976 में करीब 62 लाख पुरुषों की जबरन नसबंदी की गई। पुलिस अधिकारियों, जिला प्रशासन और डॉक्टरों को लक्ष्य पूरे न करने पर नौकरी जाने का डर था। इतने बड़े पैमाने पर हुई खराब सर्जरियों में 2000 से ज्यादा मौतें हुईं। कहा जाता है कि उस दौर में ग्रामीण इलाकों में पुरुष त्योहारों पर भी सार्वजनिक जगहों पर जाने से डरते थे।
1977 में चुनाव हुए, इंदिरा गांधी हार गईं। जनसंख्या नीति कई दशकों के लिए राजनीतिक रूप से ‘टॉक्सिक’ बन गई।
1977-2000: स्वैच्छिक नीति की ओर वापसी
आपातकाल के बाद 1977 में नीति पूरी तरह बदली। जबरदस्ती की जगह स्वैच्छिकता आई। महिला नसबंदी धीरे-धीरे पुरुष नसबंदी से ज्यादा प्रचलित हुई — एक ऐसी प्रवृत्ति जो आज भी जारी है।
1990 के दशक में शिक्षा का प्रसार, शहरीकरण और आर्थिक सुधारों ने प्रजनन दर गिराने में स्वाभाविक भूमिका निभानी शुरू की।
2000-2024: रिप्लेसमेंट लेवल के नीचे
इस सदी की शुरुआत में प्रजनन दर 3.1 थी। तब से हर दशक में गिरावट का सिलसिला जारी रहा। 2019 में पहली बार यह 2.1 के करीब पहुंची और 2024 में 1.9 पर आ गई — रिप्लेसमेंट लेवल के नीचे।
प्रजनन दर का ऐतिहासिक सफर:
| वर्ष | प्रजनन दर (TFR) |
|---|---|
| 1971 | 5.2 |
| 1981 | 4.5 (ग्रामीण: 5.4) |
| 1991 | 3.6 |
| 2001 | 3.1 |
| 2011 | 2.4 |
| 2018 | 2.2 |
| 2024 | 1.9 |
आज की तस्वीर: राज्य-दर-राज्य जमीनी हकीकत
रिपोर्ट की सबसे दिलचस्प बात है राज्यों के बीच का जमीन-आसमान का फर्क।
एक तरफ बिहार है, जहाँ प्रजनन दर 2.9 — देश में सबसे ज्यादा। बिहार के बाद उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान का नंबर है। इन राज्यों में महिलाओं में साक्षरता दर अपेक्षाकृत कम है और शिशु मृत्यु दर ज्यादा।
दूसरी तरफ दिल्ली में प्रजनन दर महज 1.2 है। केरल और तमिलनाडु जैसे शिक्षित राज्यों में यह 1.3 है।
शहरों और गांवों में भी गहरा फर्क है। शहरी भारत की प्रजनन दर 1.5 है, जबकि ग्रामीण भारत की दर ठीक 2.1 — यानी अभी रिप्लेसमेंट लेवल पर।
यह आंकड़ा एक बड़ी सच्चाई बताता है: शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक अवसर ही सबसे बड़े ‘गर्भनिरोधक’ हैं।
क्यों घट रही है प्रजनन दर? — असली कारण
1. शिक्षित और कामकाजी महिलाएं
जैसे-जैसे महिलाएं ज्यादा पढ़ रही हैं, करियर बना रही हैं और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही हैं — शादी की उम्र बढ़ रही है और बच्चों की संख्या घट रही है। यह दुनिया के हर देश में हुआ है — भारत में भी हो रहा है।
2. बच्चे पालना महंगा हो गया है
स्कूल फीस, कोचिंग, स्वास्थ्य खर्च, खाना-कपड़ा — एक बच्चे को ‘अच्छी जिंदगी’ देने का खर्च पिछले दो दशकों में कई गुना बढ़ा है। कई दंपति एक या दो बच्चों के बाद रुक जाते हैं।
3. टूटते संयुक्त परिवार
जब पति-पत्नी दोनों काम करते हों, और घर पर दादा-दादी न हों, तो बच्चे की देखभाल एक बड़ी समस्या बन जाती है। क्रेच और डेकेयर की सुविधाएं अभी भी देश में बहुत कम हैं।
4. शिशु मृत्यु दर में गिरावट
2019 में भारत में शिशु मृत्यु दर 30 प्रति हजार थी, जो 2024 में घटकर 24 हो गई। जब बच्चे बचते हैं, तो लोग ज्यादा बच्चे पैदा करने की जरूरत नहीं समझते।
5. CHILDFREE की सोच
शहरों में एक नई पीढ़ी उभर रही है जो जानबूझकर बच्चे न पैदा करने का फैसला कर रही है। जीवनशैली की प्राथमिकताएं, पर्यावरण की चिंता, या बस ‘हम दोनों खुश हैं’ — ये कारण पहले से कहीं ज्यादा प्रचलित हैं।
क्या सच में चिंता की जरूरत है? — विश्लेषण
यहाँ दो नजरिए हैं, और दोनों के अपने ठोस तर्क हैं।
नजरिया 1: फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं
भारत की आबादी अभी भी बढ़ रही है। ‘The Lancet’ में प्रकाशित वाशिंगटन यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की आबादी 2048 तक बढ़कर 1.6 अरब तक पहुंचेगी — और उसके बाद घटनी शुरू होगी।
भारत की औसत आयु (Median Age) अभी 29.2 वर्ष है। यानी देश की आधी आबादी 30 साल से कम उम्र की है। यह ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ — यानी बड़ी कामकाजी आबादी का आर्थिक लाभ — 2055 तक बना रहेगा।
इस नजरिए से देखें तो अभी तत्काल संकट नहीं है। दो-तीन दशक हैं तैयारी के लिए।
नजरिया 2: अभी नहीं सोचे तो बाद में पछताना पड़ेगा
जापान और दक्षिण कोरिया ने यही गलती की। जब प्रजनन दर गिर रही थी, तब उन्होंने ध्यान नहीं दिया। आज दक्षिण कोरिया में प्रजनन दर 0.75 है — दुनिया में सबसे कम। जापान में बुजुर्गों की देखभाल सबसे बड़ा आर्थिक बोझ बन चुकी है।
EPW (Economic and Political Weekly) के मुताबिक, भारत की TFR पांचवें लगातार साल रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे है और गिरावट की रफ्तार पूर्वानुमान से तेज है।
विशेषज्ञों की चेतावनी: अगले 30-40 वर्षों में यदि यही रफ्तार रही, तो बुजुर्गों की संख्या कामकाजी लोगों से ज्यादा हो सकती है। इसका मतलब होगा:
- पेंशन और स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में भारी बढ़ोतरी
- टैक्स देने वाले कम, सुविधाएं लेने वाले ज्यादा
- श्रम बाजार में संकट — मजदूर कम, काम ज्यादा
- आर्थिक विकास की गति धीमी
जनसंख्या नीति की जरूरत है — और कैसी होनी चाहिए?
हाँ, जरूरत है — लेकिन पुरानी वाली नहीं।
आपातकाल की जबरन नसबंदी वाली सोच अब ना सिर्फ अनैतिक है, बल्कि बेकार भी है। आज समस्या उलटी है — अब ज्यादा बच्चे पैदा करने को प्रोत्साहित करना है।
क्या किया जा सकता है?
1. आर्थिक प्रोत्साहन (Financial Incentives) आंध्र प्रदेश सरकार ने तीसरे बच्चे पर ₹30,000 और चौथे पर ₹40,000 देने का एलान किया है। यह एक शुरुआत है। राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी नीति की जरूरत है — जैसा हंगरी, फ्रांस और दक्षिण कोरिया कर रहे हैं।
2. मातृत्व और पितृत्व अवकाश की नीति मजबूत करें कई महिलाएं बच्चे के बाद नौकरी छोड़ती हैं क्योंकि Maternity Leave के बाद वापसी मुश्किल हो जाती है। लचीले काम के घंटे और बेहतर Maternity-Paternity Leave नीतियां जरूरी हैं।
3. सस्ते और गुणवत्तापूर्ण क्रेच और डेकेयर कामकाजी माता-पिता का सबसे बड़ा डर है — ‘बच्चे की देखभाल कौन करेगा?’ अगर सरकार सस्ते या मुफ्त क्रेच उपलब्ध कराए, तो कई दंपति दूसरा-तीसरा बच्चा करने पर विचार करेंगे।
4. IVF और Assisted Reproduction को सुलभ बनाएं आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और गोवा ने सरकारी IVF केंद्र खोले हैं। यह एक अच्छी पहल है। बहुत से दंपति चाहते तो हैं बच्चे, पर शारीरिक कारणों से नहीं हो पाते।
5. बुजुर्गों के लिए राष्ट्रीय नीति अभी से बनाएं प्रजनन दर बढ़ाना एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। लेकिन बुजुर्ग तो अगले 20-30 साल में ही बढ़ेंगे। इसलिए पेंशन, स्वास्थ्य सुविधाएं और Social Security की राष्ट्रीय नीति अभी से बनाना जरूरी है।
6. प्रवासन नीति पर सोचना होगा दुनिया के कई देशों ने घटती आबादी की भरपाई प्रवासियों से की है — जर्मनी, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया इसके उदाहरण हैं। भारत में यह राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा है, लेकिन इस पर बात होनी चाहिए।
क्षेत्रीय असंतुलन: एक अलग चुनौती
एक पेचीदा सवाल यह भी है — अगर दक्षिण और पश्चिम भारत में प्रजनन दर तेजी से गिर रही है, जबकि उत्तर और पूर्व में वह अभी ऊपर है, तो इसका लोकसभा सीटों के परिसीमन पर क्या असर होगा?
यह एक राजनीतिक बम है। दक्षिणी राज्यों में पहले से डर है कि 2026 के बाद होने वाले परिसीमन में उनकी सीटें कम हो जाएंगी क्योंकि उनकी आबादी कम है — भले ही उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में ज्यादा सफलता पाई हो। यह ‘सजा मिलने’ जैसा होगा उन राज्यों को जिन्होंने सरकारी नीतियों का पालन किया।
इतिहास से सबक, भविष्य की तैयारी
भारत ने जनसंख्या नीति के मामले में दो चरम देखे हैं — पहले जबरन आबादी घटाने की कोशिश, और अब आबादी घटना खुद हो रही है।
इतिहास एक बात साफ बताता है: जब भी सरकारों ने जबरदस्ती की, उल्टा नतीजा मिला। और जब शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक अवसर दिए गए, तो प्रजनन दर स्वाभाविक रूप से संतुलन में आई।
आज जरूरत है एक संतुलित, दीर्घकालिक और मानवीय जनसंख्या नीति की। न डंडे से, न नारे से — बल्कि यह समझकर कि जब नागरिकों को बेहतर जीवन मिलता है, तो वे खुद तय करते हैं कितने बच्चे पैदा करने हैं।
1.9 का आंकड़ा घबराहट का नहीं, जागने का संकेत है। और समय अभी है।
