एक समय था जब उत्तर प्रदेश की पहचान सिर्फ भीषण गर्मी में बिजली कटौती, वीआईपी जिलों और सामान्य जिलों के लिए तय रोस्टर प्रणाली, और मांग-आपूर्ति के भारी अंतर से हुआ करती थी। लेकिन बीते 12 वर्षों (2014-15 से 2025-26) का सफर उत्तर प्रदेश के ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक क्रांतिकारी बदलाव का गवाह बना है।
संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश अब अपनी मांग से भी ज्यादा बिजली पैदा करने की स्थिति में आ चुका है, और राज्य में मांग व आपूर्ति का अंतर घटकर ‘शून्य’ हो गया है।
1. 1.14 से 1.77 लाख मिलियन यूनिट: उत्पादन में डेढ़ गुना का उछाल
वर्ष 2014-15 में उत्तर प्रदेश में सभी स्रोतों (तापीय, जल और नवीकरणीय ऊर्जा) से कुल बिजली उत्पादन 1,14,994.74 मिलियन यूनिट (MU) था।
बीते 12 वर्षों में नई बिजली इकाइयों की स्थापना, बंद पड़े पावर प्लांटों के आधुनिकीकरण और सोलर एनर्जी पर जोर देने के कारण वर्ष 2025-26 तक राज्य का कुल उत्पादन बढ़कर 1,77,225.06 मिलियन यूनिट हो गया। यानी केवल 12 सालों में उत्पादन लगभग 54% (करीब डेढ़ गुना) बढ़ा है।
चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (1 अप्रैल 2026 से 30 जून 2026) के आंकड़े दिखाते हैं कि केवल तीन महीनों में ही राज्य 50,641.98 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन कर चुका है।
2. मांग और आपूर्ति का अंतर हुआ ‘शून्य’
उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ सबसे राहत की बात यह रही है कि बिजली की जरूरत और उसकी उपलब्धता का अंतर खत्म हो गया है:
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वर्ष 2014-15 की स्थिति: राज्य को 1,03,179 मिलियन यूनिट बिजली की जरूरत थी, लेकिन उपलब्धता मात्र 87,062 मिलियन यूनिट की ही थी। यानी 16,117 मिलियन यूनिट की सीधी किल्लत थी, जिसकी भरपाई कटौती और रोस्टर से की जाती थी।
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वर्ष 2024-25 की स्थिति: जरूरत बढ़कर 1,65,090 मिलियन यूनिट पहुंची, तो उपलब्धता भी 1,64,786 मिलियन यूनिट दर्ज की गई।
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वर्ष 2025-26 की स्थिति: राज्य की जरूरत 1,63,501 मिलियन यूनिट थी और इसके मुकाबले उपलब्धता 1,63,475 मिलियन यूनिट रही। केंद्र सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, अब जरूरत के अनुपात में बिजली की उपलब्धता 100% हो चुकी है और घाटा शून्य हो चुका है।
3. वर्षवार आंकड़ों पर एक नज़र
(A) कुल बिजली उत्पादन (सभी स्रोत)
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2014-15: 1,14,994.74 MU
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2016-17: 1,23,819.86 MU
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2018-19: 1,28,467.21 MU
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2020-21: 1,32,668.65 MU
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2022-23: 1,63,447.06 MU
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2024-25: 1,75,196.84 MU
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2025-26: 1,77,225.06 MU
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2026-27 (30 जून तक): 50,641.98 MU
(B) जरूरत बनाम उपलब्धता
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2014-15: जरूरत 1,03,179 MU | उपलब्ध 87,062 MU (किल्लत)
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2017-18: जरूरत 1,20,052 MU | उपलब्ध 1,18,303 MU
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2021-22: जरूरत 1,29,448 MU | उपलब्ध 1,28,310 MU
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2025-26: जरूरत 1,63,501 MU | उपलब्ध 1,63,475 MU (शून्य अंतर)
4. इस बड़े बदलाव के मुख्य कारक
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सुपरक्रिटिकल पावर प्रोजेक्ट्स: ओबरा-सी, जवाहरपुर और घाटमपुर जैसी आधुनिक तापीय परियोजनाओं से ग्रिड को भारी मात्रा में बेसलोड पावर मिली।
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सौर ऊर्जा (Solar Energy) की ओर कदम: बुंदेलखंड रीजन में मेगा सोलर पार्क और रूफटॉप सोलर नीतियों ने पीक-आवर डिमांड को संभालने में मदद की।
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ट्रांसमिशन एवं डिस्ट्रीब्यूशन सुदृढ़ीकरण: 765 KV और 400 KV के नए सब-स्टेशनों और ट्रांसमिशन लाइनों के नेटवर्क ने बिजली चोरी और लाइन लॉस (AT&C losses) को काफी हद तक कम किया।
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रोस्टर प्रणाली का खात्मा: भेदभावपूर्ण बिजली रोस्टर व्यवस्था को खत्म कर ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में निर्बाध आपूर्ति का ढांचा तैयार किया गया।
5. आर्थिक विकास पर इसका क्या असर पड़ेगा?
पर्याप्त और निर्बाध बिजली किसी भी राज्य के औद्योगिक विकास का आधार होती है।
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उद्योगों को गति: ग्रेटर नोएडा, नोएडा, लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे और गोरखपुर में लग रहे डाटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब और भारी उद्योगों को अब 24 घंटे पावर बैकअप मिल रहा है।
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निवेश को बढ़ावा: ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में आए एमओयू (MoUs) को धरातल पर उतारने में बिजली की निर्बाध आपूर्ति सबसे बड़ा संबल बनकर उभरी है।
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कृषि एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था: किसानों को सिंचाई के लिए समय पर बिजली मिलने से फसल उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार देखने को मिला है।
निष्कर्ष
12 साल पहले बिजली संकट के लिए पहचाने जाने वाला उत्तर प्रदेश आज ‘ऊर्जा आत्मनिर्भरता’ की मिसाल बन चुका है। जरूरत के अनुपात में आपूर्ति का शत-प्रतिशत होना केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह राज्य की आर्थिक रफ्तार और आम नागरिक के जीवन स्तर में सुधार का स्पष्ट संकेतक है।
