अगर आप कानपुर, गोरखपुर या वाराणसी के आस-पास के गांवों में किसी पुराने दूध उत्पादक किसान से बात करें, तो उसके मुंह से “पराग” का नाम किसी अपनेपन के साथ निकलता है। सत्तर और अस्सी के दशक में पराग उत्तर प्रदेश में दूध का पर्यायवाची था — जिस तरह गुजरात में अमूल था। लेकिन पिछले डेढ़ दशक में तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। एक तरफ अमूल ने यूपी के बाजार में गहरी पैठ बना ली है, दूसरी तरफ नमस्ते इंडिया जैसा निजी ब्रांड तेजी से हर गली-मोहल्ले तक पहुंच रहा है, और इन दोनों के बीच पराग सिकुड़ता चला जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर वही पराग, जिसकी शुरुआत सरकार और किसानों की साझेदारी से बड़े गर्व के साथ हुई थी, आज संकट में क्यों है।
पराग की जड़ें और उसका गिरता ग्राफ
पराग का मॉडल शुरू से सहकारी रहा है — गांव स्तर की दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियां किसानों से दूध इकट्ठा करती हैं, वह जिला संघों तक जाता है, और वहां से महासंघ इसे प्रोसेस कर बाजार में उतारता है। सिद्धांत में यह मॉडल अमूल जैसा ही है, लेकिन व्यवहार में इसमें सरकारी नौकरशाही और राजनीतिक हस्तक्षेप कहीं ज्यादा गहरा घुस गया।
गोरखपुर का उदाहरण इस पूरी कहानी को समझने के लिए काफी है। यहां डेढ़ लाख लीटर क्षमता वाला एक आधुनिक प्लांट 2019 में शुरू हुआ था, लेकिन कुछ ही वर्षों में यह बदहाली का शिकार हो गया। हालात यहां तक पहुंचे कि कर्मचारियों को करीब डेढ़ साल तक वेतन नहीं मिला, और जून 2023 तक किसानों, कर्मचारियों व अन्य बकायेदारों का करीब सवा छह करोड़ रुपये का भुगतान अटका रह गया। नतीजा यह हुआ कि प्लांट करीब 18 महीनों के लिए पूरी तरह बंद हो गया, और दशकों से इससे जुड़े दूध उत्पादक किसानों की रोजी-रोटी छिन गई। कानपुर के प्लांट को लेकर भी संचालन सौंपने में रकम और प्रक्रिया के पेच फंसे रहे, जिस पर विपक्ष ने भी सवाल उठाए।
यह कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं, बल्कि पूरे देश में सरकारी सहकारी दुग्ध ढांचे में दिखने वाला एक पैटर्न है — हाल ही में हिमाचल प्रदेश के मिल्कफेड दत्तनगर प्लांट में भी ठीक इसी तरह किसानों का भुगतान महीनों अटकने पर आक्रोश देखने को मिला, जहां करीब 26 हजार दुग्ध उत्पादकों का पैसा तीन महीने से रुका हुआ था।
पराग पिछड़ने की असली वजहें
इन घटनाओं के पीछे कुछ साफ कारण नजर आते हैं।
पहला, प्रबंधन और राजनीतिक हस्तक्षेप। पराग का हर बड़ा फैसला नौकरशाही और सरकार की मंजूरी से होकर गुजरता है। एमडी और अफसरों की पोस्टिंग बदलती रहती है, योजनाएं एक सरकार में शुरू होकर दूसरी सरकार में अटक जाती हैं — जैसे गोरखपुर प्लांट की नींव 2016 में समाजवादी पार्टी सरकार में पड़ी, जबकि उसका निर्माण खर्च बाद की सरकार ने उठाया। इस तरह की राजनीतिक निरंतरता की कमी दीर्घकालिक योजना को कमजोर करती है।
दूसरा, किसानों को समय पर भुगतान न मिलना। दूध का व्यवसाय रोज के नकद प्रवाह पर टिका है — किसान को चारा, दवा और घर खर्च के लिए हर दस-पंद्रह दिन में भुगतान चाहिए होता है। जब पराग जैसी सहकारी संस्थाएं महीनों भुगतान रोक देती हैं, तो किसान मजबूरन निजी दूध खरीदारों या अमूल जैसी संस्था की ओर रुख कर लेते हैं, जहां भुगतान अपेक्षाकृत भरोसेमंद है।
तीसरा, पुरानी और जर्जर तकनीक। जहां निजी और नए सहकारी मॉडल आधुनिक कोल्ड चेन, आरएफआईडी आधारित पशु पहचान और डिजिटल खरीद प्रणाली में निवेश कर रहे हैं, वहीं पराग के कई प्लांट दशकों पुरानी मशीनरी पर चल रहे थे, जिनकी मरम्मत में महीनों लग गए।
चौथा, ब्रांड और मार्केटिंग में पिछड़ना। निजी ब्रांड लगातार पैकेजिंग, विज्ञापन और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क में निवेश करते रहते हैं, जबकि सरकारी दुग्ध महासंघ का बजट और प्राथमिकता आमतौर पर सिर्फ उत्पादन तक सीमित रह जाती है, ब्रांड बिल्डिंग तक नहीं पहुंच पाती।
पांचवां, जलवायु और उत्पादन का दबाव। गर्मी बढ़ने से भैंसों और गायों का दूध उत्पादन सीधे प्रभावित हो रहा है — आगरा जैसे इलाकों में पराग को दूध सप्लाई करने वाली सहकारी समितियों के मुताबिक, चरम गर्मी में जो भैंस रोज चार-पांच लीटर देती थी, वह घटकर तीन लीटर पर आ गई। यह पूरे क्षेत्र की समस्या है, पर कमजोर सहकारी ढांचे के कारण पराग इसका असर बेहतर तरीके से झेल नहीं पाता, जबकि बड़े संगठित खरीदार इसे प्रबंधित करने में बेहतर साबित होते हैं।
अमूल आगे कैसे निकला
अमूल की कामयाबी का राज उसकी संरचना में छिपा है। यह भी सहकारी मॉडल है, लेकिन इसमें किसान सिर्फ नाम के लिए हिस्सेदार नहीं, बल्कि वास्तविक निर्णय-निर्माता हैं, और गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन महासंघ (GCMMF) का पेशेवर प्रबंधन दशकों से एक जैसी नीति और अनुशासन के साथ चल रहा है। अमूल ने अपने कुल 36 लाख डेयरी किसानों के नेटवर्क और वित्त वर्ष 2025-26 में एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के कारोबार के दम पर देशभर में विस्तार किया है, और उत्तर प्रदेश इस विस्तार का एक बड़ा हिस्सा रहा है।
अमूल यूपी में सिर्फ बिक्री बढ़ाने नहीं आया, बल्कि उत्पादन ढांचे में सीधा निवेश कर रहा है — बागपत में करीब 900 करोड़ रुपये की लागत से मिल्क प्लांट लगाने की योजना इसी रणनीति का हिस्सा है। इसके अलावा अमूल का खरीद मॉडल किसानों के बीच खासा भरोसेमंद माना जाता है, इतना कि खुद किसान संगठनों ने सरकार से मांग की है कि दूध की न्यूनतम कीमत तय करने के लिए अमूल का ही खरीद फॉर्मूला पूरे देश में लागू किया जाए। यही भरोसा वह वजह है जिसके चलते यूपी के कई इलाकों में किसान अपनी पुरानी सहकारी समितियों को छोड़कर बनास डेयरी जैसी अमूल से जुड़ी समितियों का हिस्सा बनने लगे हैं।
नमस्ते इंडिया जैसे निजी ब्रांड कैसे तेज दौड़ रहे हैं
नमस्ते इंडिया दरअसल कानपुर की ही आरएसपीएल समूह की डेयरी इकाई है — वही समूह जो घड़ी डिटर्जेंट के लिए मशहूर है। एक निजी कंपनी होने के नाते इसका फैसला लेने का ढांचा बेहद तेज है — न सरकारी मंजूरी का इंतजार, न राजनीतिक बदलाव का असर। यह ब्रांड हर साल दो करोड़ लीटर से ज्यादा दूध बेचता है और उत्तर व पूर्वी भारत के करीब दस लाख घरों तक रोज पहुंचता है, और उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर, बिहार, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, झारखंड, जम्मू-कश्मीर और असम जैसे कई राज्यों में इसका मजबूत वितरण नेटवर्क फैला है। हाल ही में कंपनी ने बिहार में भी करीब साढ़े तीन सौ करोड़ रुपये के निवेश के साथ अपना दूध कारोबार शुरू किया है।
नमस्ते इंडिया जैसे ब्रांडों की ताकत तीन चीजों में है — लगातार पूंजी निवेश, आक्रामक विस्तार रणनीति, और उपभोक्ता को दिखने वाली गुणवत्ता व पैकेजिंग पर फोकस। जहां पराग जैसी सहकारी संस्था को हर बड़े फैसले के लिए सरकारी अनुमोदन चाहिए, वहीं निजी कंपनी बाजार का रुख भांपते ही तुरंत नए शहर या नए उत्पाद में उतर जाती है।
तीनों मॉडल की तुलना
| पहलू | पराग (PCDF, यूपी सरकार) | अमूल (GCMMF, सहकारी) | नमस्ते इंडिया (RSPL, निजी) |
|---|---|---|---|
| स्वामित्व ढांचा | सरकारी नियंत्रित सहकारी | किसान-नियंत्रित पेशेवर सहकारी | पूर्ण निजी कंपनी |
| फैसले की रफ्तार | धीमी, नौकरशाही निर्भर | अपेक्षाकृत तेज, स्थिर नीति | बहुत तेज |
| किसान भुगतान | अक्सर विलंबित | अपेक्षाकृत भरोसेमंद | सीधा अनुबंध आधारित |
| निवेश क्षमता | सीमित बजट पर निर्भर | बड़ा, निरंतर पुनर्निवेश | आक्रामक पूंजी निवेश |
| विस्तार | सिकुड़ता दायरा | राष्ट्रीय विस्तार जारी | तेज बहु-राज्य विस्तार |
अब सुधार की दिशा में क्या हो रहा है
अच्छी बात यह है कि यूपी सरकार ने समस्या को स्वीकार करते हुए कदम उठाना शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में राज्य सरकार, पीसीडीएफ और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के बीच एक अहम समझौता हुआ है, जिसके तहत कानपुर, गोरखपुर और कन्नौज के दुग्ध प्लांट तथा अंबेडकर नगर स्थित पशु आहार निर्माणशाला अगले दस वर्षों के लिए एनडीडीबी को सौंप दिए गए हैं। इसी करार के नतीजे में गोरखपुर का बंद पड़ा प्लांट मरम्मत के बाद जून 2026 से दोबारा चालू हो गया है और अब यहां रोजाना करीब डेढ़ लाख लीटर दूध की प्रोसेसिंग हो रही है, जिससे बाजार में पराग और मदर डेयरी दोनों ब्रांड के उत्पाद एक साथ उपलब्ध होंगे।
यह मॉडल दिखाता है कि पराग को बचाने का रास्ता क्या हो सकता है:
- पेशेवर प्रबंधन को सरकारी दखल से अलग करना — एनडीडीबी-मदर डेयरी साझेदारी इसी दिशा में एक कदम है, जहां तकनीकी और परिचालन फैसले राजनीतिक चक्र से बाहर लिए जा सकें।
- किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करना, भले उसके लिए अलग एस्क्रो व्यवस्था या डिजिटल भुगतान प्रणाली बनानी पड़े, ताकि भरोसा फिर से कायम हो।
- प्लांटों का आधुनिकीकरण और कोल्ड चेन व डिजिटल खरीद तकनीक में निवेश, ताकि गुणवत्ता और दक्षता दोनों बढ़े।
- ब्रांड और मार्केटिंग में अलग बजट, क्योंकि सिर्फ अच्छा दूध बनाना काफी नहीं, उपभोक्ता तक पहुंचना और भरोसा बनाना भी उतना ही जरूरी है।
- राजनीतिक निरंतरता — यानी सरकार बदलने पर भी दुग्ध नीति और परियोजनाओं में निरंतरता बनी रहे, जैसा अमूल के गुजरात मॉडल में दशकों से देखा गया है।
पराग की कहानी असल में यह बताती है कि सहकारी मॉडल अपने आप में बुरा नहीं है — अमूल इसी मॉडल पर देश की सबसे बड़ी डेयरी कंपनी बन गई। समस्या मॉडल में नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन में है। जहां अमूल ने पेशेवर प्रबंधन, समय पर भुगतान और निरंतर निवेश से किसानों का भरोसा जीता, वहीं पराग नौकरशाही, राजनीतिक अस्थिरता और भुगतान में देरी के भंवर में फंस गया। दूसरी ओर नमस्ते इंडिया जैसे निजी ब्रांड यह दिखाते हैं कि तेज फैसले और आक्रामक निवेश किस तरह बाजार में जगह बना लेते हैं। अच्छी खबर यह है कि हाल का एनडीडीबी-मदर डेयरी करार पराग के पुनरुद्धार की दिशा में पहला ठोस कदम है — अब देखना यह है कि क्या यह सुधार सिर्फ कागजों तक सीमित रहता है, या वाकई जमीन पर किसानों और उपभोक्ताओं दोनों तक इसका असर पहुंचता है।
