उत्तर प्रदेश कैडर के 2023 बैच के IAS अधिकारी रिंकू सिंह राही एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक लंबी पोस्ट लिखकर प्रदेश की मौजूदा नौकरशाही व्यवस्था पर सीधा सवाल खड़ा किया। उन्होंने लिखा कि अपनी पुरानी और मौजूदा सेवा के अनुभवों के आधार पर उन्हें यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि वे उत्तर प्रदेश की वर्तमान नौकरशाही संस्कृति के लिए उपयुक्त नहीं हैं। उन्होंने यह इच्छा भी जताई कि उन्हें किसी दूसरे राज्य या कैडर में जाकर सकारात्मक ढंग से काम करने का अवसर मिले। राही ने अपनी पोस्ट में यह भी लिखा कि IAS बनने के पीछे उनका मकसद वे काम करना था, जिनकी लोगों को उनसे अपेक्षा थी — लेकिन मौजूदा माहौल में वह उस मकसद को पूरा कर पाने में खुद को असमर्थ महसूस कर रहे हैं।
यह कोई अकेली या अचानक उठाई गई मांग नहीं है। बीते कुछ महीनों में रिंकू सिंह राही लगातार अलग-अलग तरीकों से इस मुद्दे को सामने ला रहे हैं, और हर बार उनकी बात राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बन रही है।
कौन हैं रिंकू सिंह राही?
रिंकू सिंह राही ने UPSC सिविल सेवा परीक्षा में 683वीं रैंक हासिल कर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में जगह बनाई थी, जिसके बाद उन्हें उत्तर प्रदेश कैडर आवंटित हुआ। प्रशिक्षण के दौरान भी वे चर्चा में रह चुके हैं — शाहजहांपुर के पवायां तहसील में बतौर प्रशिक्षु SDM तैनाती के दौरान, तहसील परिसर में गंदगी और खुले में शौच करते लोगों को देखकर उन्होंने खुद को भी जिम्मेदार मानते हुए वकीलों के सामने उठक-बैठक (sit-ups) की थी — यह वीडियो उस वक्त खूब वायरल हुआ था।
बाद में उन्हें जालौन जिले में SDM के तौर पर तैनाती मिली, जहां उनके कार्यकाल में कई बड़े विवाद खड़े हुए।
जालौन में विवादों की शुरुआत
23 जून 2026 को एक कोल्ड स्टोरेज के निरीक्षण के दौरान SDM रिंकू सिंह राही और भाजपा के जालौन ब्लॉक प्रमुख रामराजा निरंजन के बीच तीखी बहस हो गई। ब्लॉक प्रमुख ने आरोप लगाया कि राही ने उन्हें धक्का दिया और थप्पड़ मारने की कोशिश की, और इसका CCTV फुटेज भी सार्वजनिक किया। इसके बाद जालौन तहसील के राजस्व विभाग के कर्मचारियों ने भी SDM के व्यवहार को “रुखा और अमानवीय” बताते हुए जिलाधिकारी को सामूहिक अवकाश की मांग वाला ज्ञापन सौंपा। मामले की जांच ADM स्तर पर हुई, और रिपोर्ट शासन को भेजे जाने के बाद राही का तबादला SDM (न्यायिक) के पद पर कर दिया गया।
इसके बाद भी विवाद थमा नहीं। अगस्त की शुरुआत में जालौन के वकीलों और SDM (न्यायिक) रिंकू सिंह राही के बीच टकराव गहरा गया। वकीलों ने उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए राजस्व अदालतों के बहिष्कार का ऐलान किया, जिससे सैकड़ों राजस्व मामलों की सुनवाई प्रभावित होने की आशंका पैदा हुई। राही ने अपनी सफाई में अदालती कार्यवाही का वीडियो जारी करते हुए कहा कि वे पूरी तरह नियमों के मुताबिक काम कर रहे हैं और किसी भी अधिवक्ता से उनका कोई निजी विवाद नहीं है।
‘तकनीकी इस्तीफा’ और पांच पेज का पत्र
इन विवादों के बीच 26 मार्च 2026 को राही ने राष्ट्रपति, उत्तर प्रदेश के नियुक्ति विभाग और केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय (DOPT) को एक “तकनीकी इस्तीफा” भेजा था। तकनीकी इस्तीफे का मतलब है कि अधिकारी सेवा पूरी तरह नहीं छोड़ता, बल्कि अपनी पूर्ववर्ती सेवा में वापस भेजे जाने की मांग करता है। राही ने इसमें समाज कल्याण अधिकारी के पद पर वापसी की मांग की थी, यह तर्क देते हुए कि वे वहां जमीनी स्तर पर ज्यादा प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं। हालांकि बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका इरादा नौकरी छोड़ने का नहीं था, और अगर सरकार उनसे IAS के तौर पर काम नहीं लेना चाहती तो उन्हें उनकी मूल सेवा (PCS कैडर) में वापस भेज दिया जाए।
जुलाई में यह विवाद और गहरा गया, जब राही ने नियुक्ति विभाग को पांच पन्नों का एक पत्र लिखा। इसमें उन्होंने योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र देव सिंह और भाजपा विधायक गौरी शंकर वर्मा का भी उल्लेख किया। पत्र में उन्होंने कहा कि उनका काम सिर्फ चार घंटे का रह गया है, इसलिए या तो उन्हें आधी सैलरी दी जाए, या फिर ऐसी जगह पोस्टिंग दी जाए जहां वे नियमानुसार पूरी क्षमता से काम कर सकें। साथ ही उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीतिक हस्तक्षेप और सुशासन को लेकर कई गंभीर आरोप भी लगाए और अनुरोध किया कि अगर कोई उपयुक्त तैनाती संभव न हो, तो उनका कैडर बदलने की अनुमति दी जाए। उन्होंने यह भी लिखा कि जब तक इस पर अंतिम फैसला नहीं होता, तब तक 22 जुलाई 2026 से उन्हें आधी तनख्वाह ही दी जाए।
भ्रष्टाचार के खुले संरक्षण पर भावुक पोस्ट
जुलाई के अंत में राही ने एक और भावुक सोशल मीडिया पोस्ट लिखी, जिसमें उन्होंने कहा कि सिस्टम के भीतर भ्रष्टाचार को खुलेआम संरक्षण मिल रहा है, और ऐसे माहौल में ईमानदारी से काम करना किसी युद्ध लड़ने जैसा है। उन्होंने कहा कि यहां लड़ाई सिर्फ बाहरी चुनौतियों से नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर मौजूद प्रभावशाली लोगों से भी लड़नी पड़ती है, और सुशासन लागू करने से पहले ही उसके लिए संघर्ष करना पड़ रहा है — जबकि लगातार अनुरोध के बावजूद उन्हें पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था तक उपलब्ध नहीं कराई जा रही। इसी पोस्ट में उन्होंने कैडर बदलने के अपने अनुरोध का दोबारा जिक्र करते हुए उम्मीद जताई कि किसी न किसी राज्य में ऐसा कोई जिला या तहसील ज़रूर होगी, जहां भ्रष्टाचार की चुनौती तो हो, लेकिन उसे खुला संरक्षण न मिलता हो। उन्होंने बैकडेट में पत्र जारी किए जाने और डिस्पैच रजिस्टर में उसे बाद में दर्ज किए जाने जैसी प्रशासनिक अनियमितताओं का भी हवाला दिया।
आगे क्या?
फिलहाल राज्य सरकार या केंद्र सरकार की ओर से रिंकू सिंह राही के कैडर बदलने की मांग पर कोई आधिकारिक फैसला सार्वजनिक नहीं हुआ है। उनका मामला भारतीय प्रशासनिक तंत्र में एक दुर्लभ उदाहरण बन गया है, जहां एक युवा सिविल सेवा अधिकारी सार्वजनिक रूप से — पत्रों और सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिए — अपने ही कैडर की कार्यसंस्कृति और राजनीतिक हस्तक्षेप पर खुलकर सवाल उठा रहा है। यह मामला जहां एक तरफ प्रशासनिक जवाबदेही और सुशासन की बहस को हवा दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह भी सवाल खड़ा करता है कि युवा अधिकारियों को स्वतंत्र रूप से काम करने का माहौल किस हद तक मिल पा रहा है।
