CBSE का OSM घोटाला: मई 2026 की वह सुबह लाखों परिवारों के लिए उत्सव का दिन होनी चाहिए थी — CBSE कक्षा 12 के परिणाम का दिन। लेकिन जब रिजल्ट आया, तो खुशी की जगह आंसू थे। पास प्रतिशत गिरकर मात्र 85.20% रह गया — पिछले सात वर्षों में सबसे कम। 2025 में यह 88.39% था। एक झटके में 3 प्रतिशत से अधिक की गिरावट — और इसके पीछे था एक नया प्रयोग, जो पारदर्शिता के नाम पर शुरू हुआ था, लेकिन बन गया एक राष्ट्रीय विवाद।
यह कहानी है CBSE के ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम की — एक ऐसी व्यवस्था जिसमें तकनीक, टेंडर, और कथित भ्रष्टाचार ने मिलकर 18.5 लाख से अधिक छात्रों का भविष्य दाँव पर लगा दिया।
क्या है OSM — ऑन-स्क्रीन मार्किंग?
CBSE ने 2026 की बोर्ड परीक्षाओं के साथ कक्षा 12 की कॉपियों के मूल्यांकन में एक बड़ा बदलाव किया। पुरानी व्यवस्था में शिक्षक परीक्षा केंद्रों पर जाकर शारीरिक रूप से कॉपियाँ जाँचते थे। नई OSM प्रणाली में:
- छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन करके डिजिटल कर दिया जाता है
- शिक्षक अपने स्कूल से ही कंप्यूटर पर इन्हें ऑनलाइन जाँचते हैं
- अंकों का जोड़ स्वचालित (automated) होता है
- मूल्यांकन पोर्टल cbse.onmark.co.in पर होता है
CBSE का दावा था कि इससे गलतियाँ कम होंगी, पारदर्शिता बढ़ेगी, और परिणाम जल्दी आएंगे। लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल उल्टी निकली।
घोटाले की परतें: कैसे हुई धांधली?
1. टेंडर में गड़बड़ी — मोबाइल से स्कैनिंग का आरोप
यह विवाद का सबसे गंभीर पहलू है। मई 2025 में CBSE ने जो टेंडर जारी किया था, उसमें स्पष्ट शर्त थी कि कॉपियाँ स्वचालित रोबोटिक स्कैनर से स्कैन की जाएंगी, न्यूनतम 300 DPI रेजोल्यूशन के साथ, और कॉपी की जिल्द (spine) को बिना नुकसान पहुँचाए।
लेकिन अगस्त 2025 में दोबारा जारी टेंडर में यह सब चुपचाप हटा दिया गया — “स्कैनर” की शर्त को सामान्य कर दिया गया, और रेजोल्यूशन 300 DPI से घटाकर 200 DPI कर दिया गया।
इस बदले हुए टेंडर पर COEMPT Edu Teck नाम की कंपनी को कॉन्ट्रैक्ट मिला। आरोप है कि इस कंपनी ने प्रोफेशनल स्कैनर की जगह मोबाइल फोन से कॉपियाँ स्कैन कीं — जिसके चलते हजारों कॉपियों में धुंधलापन, छाया (shadow), मुड़े हुए निशान (fold marks) और पन्ने गायब होने जैसी समस्याएं आईं।
2. COEMPT की संदिग्ध पृष्ठभूमि
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने खुलासा किया कि COEMPT Edu Teck पहले Globarena नाम से जानी जाती थी, और इस कंपनी पर तेलंगाना में दो बार बोर्ड परीक्षाओं में घोटाले का आरोप लग चुका है। सवाल उठा — ऐसे रिकॉर्ड वाली कंपनी को 18 लाख बच्चों की कॉपियों की जिम्मेदारी कैसे सौंपी गई?
3. पोर्टल में सुरक्षा खामियाँ
झारखंड के 17 वर्षीय छात्र सार्थक सिधांत और एथिकल हैकर निसर्ग अधिकारी ने OSM पोर्टल में गंभीर सुरक्षा खामियाँ उजागर कीं। उनका दावा था कि पोर्टल की कमजोरियों के चलते इंटरनेट पर कोई भी व्यक्ति छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन कॉपी डाउनलोड कर सकता था — यह छात्रों की निजता का घोर उल्लंघन था।
4. री-वैल्यूएशन पोर्टल पर साइबर हमले
जब CBSE ने 2 जून 2026 को री-वैल्यूएशन पोर्टल खोला, तो कुछ ही मिनटों में पोर्टल पर 2 मिनट में 15 लाख हिट्स हुए। CBSE का कहना है कि यह “Denial of Service (DoS) attack” था और “दुर्भावनापूर्ण तत्वों” ने 1 लाख से अधिक अनधिकृत फाइल एक्सेस के प्रयास किए।
क्षेत्रवार प्रभाव: कहाँ कितना नुकसान?
OSM घोटाले का असर पूरे देश में एक समान नहीं पड़ा। क्षेत्रवार आँकड़े एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं:
| क्षेत्र | पास प्रतिशत (2026) | स्थिति |
|---|---|---|
| त्रिवेंद्रम | 95.62% | सर्वश्रेष्ठ |
| चेन्नई | 93.84% | दूसरा स्थान |
| बेंगलुरु | 93.19% | तीसरा स्थान |
| विजयवाड़ा | 92.77% | चौथा स्थान |
| गुवाहाटी | अपेक्षाकृत कम | compartment % सबसे ज़्यादा |
| प्रयागराज/लखनऊ क्षेत्र | प्रभावित | उत्तर भारत में अधिक शिकायतें |
| पटना | प्रभावित | compartment में वृद्धि |
दक्षिण भारत के चार क्षेत्र शीर्ष पाँच में रहे। इसके पीछे विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण के स्कूलों में डिजिटल अवसंरचना बेहतर है, और शिक्षक नई प्रणाली के लिए अपेक्षाकृत तैयार थे।
उत्तर भारत के कई राज्यों — उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश — में सरकारी और अर्ध-सरकारी स्कूलों के छात्रों पर असर ज्यादा पड़ा। इन क्षेत्रों में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, शिक्षकों की अपर्याप्त ट्रेनिंग, और खराब स्कैन क्वालिटी ने मिलकर नुकसान दोगुना कर दिया।
बच्चों की कॉपियों में क्या-क्या हुआ?
छात्रों और अभिभावकों ने सोशल मीडिया पर जो शिकायतें दर्ज कीं, वे चौंकाने वाली थीं:
- गलत कॉपी मिलना — किसी छात्र को किसी और की उत्तर पुस्तिका की स्कैन कॉपी दे दी गई
- पन्ने गायब — स्कैनिंग में कई पृष्ठ छूट गए, जिससे अंक नहीं मिले
- धुंधली कॉपी — मोबाइल स्कैनिंग के कारण शब्द अस्पष्ट, आरेख (diagrams) अदृश्य
- उत्तर छूटे — लंबे उत्तर और diagram वाले प्रश्नों में परीक्षक को ठीक से दिखा ही नहीं
- जैविकी (Biology) में भारी गिरावट — इस विषय में छात्रों के अंक अचानक बहुत कम आए
- स्वचालित जोड़ में भूल — मैनुअल जाँच में जो “benefit of doubt” मिलता था, वह automated system में खत्म हो गया
2018 में भी CBSE की री-वैल्यूएशन प्रक्रिया में 9,111 आवेदनों में से 4,632 कॉपियाँ गलत मूल्यांकित पाई गई थीं — यानी आधे से ज्यादा। 2026 में यह संख्या कितनी होगी, अभी जाँच जारी है।
संसद में गूँजा मामला, CBSE अध्यक्ष हटाए गए
इस विवाद ने इतना बड़ा रूप लिया कि:
- शिक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने CBSE अधिकारियों और शिक्षा सचिव को तलब किया
- सार्थक सिधांत (17 वर्षीय छात्र) ने संसदीय पैनल के सामने गवाही दी
- CBSE के चेयरमैन राहुल सिंह और सचिव हिमांशु गुप्ता को तबादला किया गया
- सरकार ने S. राधा चौहान (क्षमता निर्माण आयोग की अध्यक्ष) की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जाँच समिति गठित की
- राहुल गांधी ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा माँगा
- #OSMfailed हैशटैग सोशल मीडिया पर ट्रेंड करता रहा
CBSE ने सभी आरोपों को “भ्रामक और तथ्यहीन” बताया और कहा कि टेंडर प्रक्रिया General Financial Rules के तहत पारदर्शी तरीके से हुई।
पुराने घाव: CBSE के मूल्यांकन विवाद का इतिहास
यह पहली बार नहीं है जब CBSE की मूल्यांकन प्रणाली पर सवाल उठे हों:
2016: CBSE ने री-इवैल्यूएशन की सुविधा पूरी तरह बंद कर दी, जिसके बाद देशभर के छात्रों ने अदालतों में याचिकाएँ दायर कीं। दिल्ली हाईकोर्ट ने मूल्यांकन प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
2018: री-वैल्यूएशन में पाया गया कि आधे से अधिक आवेदनों में कॉपियाँ गलत जाँची गई थीं। 12वीं की एक टॉपर की जगह दूसरी छात्री को टॉपर घोषित करना पड़ा क्योंकि उसकी 17 सही उत्तरों को गलत मान लिया गया था।
2021 (Term-1): CBSE स्कूल एसोसिएशन ने बोर्ड को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि परीक्षाओं में व्हाट्सएप और LAN नेटवर्क के जरिए पेपर लीक हुए, और छात्रों को एक घंटे पहले जवाब रटाए गए।
2025: सोशल मीडिया पर पेपर लीक के दावे वायरल हुए, हालाँकि CBSE ने इन्हें “शरारती तत्वों” की करतूत बताया।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
शिक्षाविदों का मानना है कि OSM एक अच्छा विचार था, लेकिन उसका क्रियान्वयन बेहद जल्दबाजी में हुआ:
- बिना पर्याप्त infrastructure तैयार किए राष्ट्रीय स्तर पर लागू कर दिया गया
- स्कैनिंग की गुणवत्ता मानकों में टेंडर के बीच बदलाव अक्षम्य है
- शिक्षकों को OSM की पर्याप्त ट्रेनिंग नहीं दी गई
- ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में internet connectivity की कमी ने काम बिगाड़ा
- साफ लिखावट, structured उत्तर, और labeled diagrams की जरूरत पहले से नहीं बताई गई
आगे का रास्ता: क्या होना चाहिए?
- स्वतंत्र न्यायिक जाँच — COEMPT को कॉन्ट्रैक्ट कैसे मिला, इसकी निष्पक्ष जाँच जरूरी
- मुफ्त री-वैल्यूएशन — प्रभावित छात्रों के लिए री-इवैल्यूएशन की फीस माफ हो
- टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता — किसी भी बदलाव का सार्वजनिक नोटिस अनिवार्य हो
- Pilot Test पहले — किसी भी नई तकनीक को पहले सीमित क्षेत्र में आजमाया जाए
- डिजिटल infrastructure — उत्तर और पूर्वोत्तर भारत में स्कूलों में बेहतर scanning और connectivity सुनिश्चित हो
- डेटा सुरक्षा कानून — छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं की गोपनीयता के लिए सख्त नियम
परीक्षा प्रणाली का संकट
CBSE का OSM विवाद केवल एक तकनीकी गड़बड़ी नहीं है — यह उस बड़ी समस्या का प्रतिबिंब है जो भारत की परीक्षा प्रणाली को अंदर से खोखला कर रही है। जब 18 लाख बच्चे साल भर पढ़ते हैं, और उनकी मेहनत का मूल्यांकन एक धुंधली मोबाइल स्कैन पर निर्भर हो जाए — तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक नैतिक संकट है।
NEET के बाद CBSE — भारत में परीक्षा प्रणाली पर भरोसे का यह संकट बताता है कि सुधार की जरूरत सिर्फ तकनीक में नहीं, बल्कि नीयत, जवाबदेही और पारदर्शिता में भी है।
हर परीक्षार्थी का एक सपना होता है। उस सपने की कीमत किसी की लापरवाही या भ्रष्टाचार नहीं चुका सकता।
