RBI: करीब 22 वर्षों तक नए लाइसेंस जारी करने पर रोक के बाद भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी) को सतत आधार पर यानी ‘ऑन-टैप’ लाइसेंस देने के लिए मसौदा दिशा-निर्देश जारी किए हैं। प्रस्तावित नियमों को सहकारी साख समितियों के लिए एक अवसर के साथ-साथ चेतावनी के रूप में भी देखा जा रहा है। इसका सीधा संदेश है कि जो समितियां भविष्य में शहरी सहकारी बैंक बनना चाहती हैं, उन्हें अपनी वित्तीय स्थिति, कामकाज और प्रशासनिक व्यवस्था मजबूत करनी होगी।
सहकारी समिति क्या होती है
सहकारी समिति ऐसे लोगों का स्वैच्छिक संगठन है, जो अपनी साझा आर्थिक, सामाजिक या अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए मिलकर काम करते हैं। भारत में सहकारी समितियों को औपचारिक कानूनी आधार 1904 में सहकारी साख समिति अधिनियम के जरिए मिला। आजादी के बाद सहकारिता क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम उठाए गए। इनमें बहु-राज्यीय सहकारी समितियां अधिनियम, 2002, वर्ष 2021 में अलग सहकारिता मंत्रालय की स्थापना और बहु-राज्यीय सहकारी समितियां संशोधन अधिनियम, 2023 प्रमुख हैं।
सहकारी साख समिति से शहरी सहकारी बैंक तक का सफर
सहकारी साख समितियां खासकर ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में लोगों की छोटी-बड़ी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनके जरिए लोगों को स्थानीय स्तर पर कर्ज की सुविधा मिलती है और परंपरागत साहूकारों पर निर्भरता कम होती है। इस लिहाज से ये समितियां वित्तीय समावेशन का भी महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
हालांकि केवल सहकारी समिति के रूप में पंजीकृत होना बैंकिंग कारोबार करने के लिए पर्याप्त नहीं है। चाहे कोई समिति किसी राज्य के सहकारी समिति कानून के तहत पंजीकृत हो या बहु-राज्यीय सहकारी समितियां अधिनियम के तहत, बैंकिंग कारोबार के लिए उसे बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 22 और धारा 56 के प्रावधानों के तहत आरबीआई से लाइसेंस लेना पड़ता है। जिस सहकारी संस्था को प्राथमिक सहकारी बैंक के रूप में बैंकिंग लाइसेंस मिल जाता है, उसे शहरी सहकारी बैंक कहा जाता है।
देश में सहकारी क्षेत्र का कितना बड़ा नेटवर्क है
राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस के अनुसार, 20 जनवरी 2026 तक देश में करीब 6.6 लाख सक्रिय सहकारी समितियां थीं। इनमें लगभग एक-तिहाई महाराष्ट्र में थीं।
केंद्रीय सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार के पोर्टल पर 11 अगस्त 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 18 राज्यों में 362 बहु-राज्यीय साख सहकारी समितियां दर्ज थीं। इनमें 301 यानी 83 प्रतिशत से अधिक महाराष्ट्र में थीं।
राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस के अनुसार देश में कुल 1,341 शहरी सहकारी बैंक हैं। इनमें अकेले महाराष्ट्र में 410 शहरी सहकारी बैंक हैं।
अब मसौदा नियम जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी
आरबीआई के गवर्नर ने 1 अक्टूबर 2025 को जारी मौद्रिक नीति वक्तव्य में नए शहरी सहकारी बैंकों को लाइसेंस देने के मुद्दे पर चर्चा-पत्र लाने का प्रस्ताव रखा था।
नए यूसीबी लाइसेंस जारी करने पर वर्ष 2004 से रोक लगी हुई थी। उस समय फैसला लिया गया था कि नए लाइसेंस तभी दिए जाएंगे, जब शहरी सहकारी बैंकिंग क्षेत्र के लिए व्यापक नीति, मजबूत कानूनी और नियामकीय ढांचा तथा वित्तीय स्थिति सुधारने की प्रभावी व्यवस्था तैयार हो जाए।
बीते दो दशकों में इस क्षेत्र में कई सुधार हुए हैं। वित्तीय स्थिति, नियमन और निगरानी में बदलाव के बाद सहकारी क्षेत्र से जुड़े संगठनों और अन्य हितधारकों की ओर से नए लाइसेंस की प्रक्रिया दोबारा शुरू करने की मांग भी लगातार उठती रही है।
यह विचार नया नहीं है
सहकारी साख समितियों को आगे बढ़ाकर शहरी सहकारी बैंक बनाने की अवधारणा पर काफी पहले से विचार होता रहा है। वर्ष 2001 में आरबीआई की एक स्क्रीनिंग समिति ने सुझाव दिया था कि नए शहरी सहकारी बैंकों का गठन किसी मौजूदा सहकारी साख समिति के सत्यापित और बेहतर प्रदर्शन वाले रिकॉर्ड के आधार पर होना चाहिए। इसे एक तरह से समिति के ‘दर्जा-उन्नयन’ की प्रक्रिया माना गया था।
बाद में वर्ष 2011 में वाई. एच. मालेगाम की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति और वर्ष 2015 में आर. गांधी की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने भी इस विचार को आगे बढ़ाया। इसके पीछे सोच यह थी कि यदि सहकारी साख समितियों के लिए स्पष्ट और कठोर मानक तय किए जाएं तो भविष्य में बनने वाले शहरी सहकारी बैंक शुरुआत से ही वित्तीय रूप से मजबूत, पर्याप्त रूप से विविधीकृत और जोखिम का सामना करने में सक्षम होंगे।
यूसीबी लाइसेंस के लिए कड़े मानक
आरबीआई के मसौदा दिशा-निर्देशों में सहकारी साख समितियों के शहरी सहकारी बैंक में बदलाव के लिए कई कड़ी पात्रता शर्तें प्रस्तावित की गई हैं।
समिति का अस्तित्व कम से कम 10 वर्ष पुराना होना चाहिए। इसके अलावा पिछले पांच वर्षों के परिचालन और वित्तीय प्रदर्शन में सकारात्मक तथा सुधार की दिशा में स्पष्ट रुझान होना जरूरी होगा।
आवेदन से ठीक पहले वाले वित्त वर्ष के मार्च अंत के ऑडिटेड आंकड़ों के अनुसार समिति के पास कम से कम 10,000 करोड़ रुपये की जमा राशि और कम से कम 300 करोड़ रुपये की नेटवर्थ होनी चाहिए।
इसके साथ ही पूंजी-जोखिम भारित परिसंपत्तियों का अनुपात यानी सीआरएआर कम से कम 12 प्रतिशत होना चाहिए। मार्च अंत तक शुद्ध गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी नेट एनपीए का अनुपात 3 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।
प्रस्तावित नियमों में यह भी कहा गया है कि किसी एक सदस्य की समिति में हिस्सेदारी 5 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। आरबीआई बैंक के निदेशकों की ‘फिट एंड प्रॉपर’ स्थिति यानी उनकी योग्यता, ईमानदारी और बैंक संचालन के लिए उपयुक्तता का भी आकलन करेगा।
शुरुआती चरण में उन सहकारी समितियों को प्राथमिकता दिए जाने का प्रस्ताव है, जिनका संचालन और सदस्य आधार कई राज्यों में फैला हुआ हो। इस लिहाज से बहु-राज्यीय साख सहकारी समितियों को फायदा मिल सकता है।
कितनी समितियां आवेदन कर पाएंगी, यह अभी साफ नहीं
इन प्रस्तावित नियमों का वास्तविक असर तभी स्पष्ट होगा, जब यह सामने आएगा कि देश में कितनी सहकारी साख समितियां तय मानकों को पूरा करती हैं। फिलहाल सहकारी साख समितियों का ऐसा व्यापक और भरोसेमंद सार्वजनिक डेटाबेस उपलब्ध नहीं है, जिससे यह सटीक अनुमान लगाया जा सके।
फिर भी इन नियमों का महत्व केवल लाइसेंस देने तक सीमित नहीं है। प्रस्तावित व्यवस्था सहकारी समितियों को अपनी वित्तीय स्थिति सुधारने, जमा और पूंजी आधार बढ़ाने, जोखिम कम करने और प्रशासनिक व्यवस्था मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है।
दूसरे शब्दों में, आरबीआई ने शहरी सहकारी बैंक बनने का रास्ता जरूर खोलने की पहल की है, लेकिन यह रास्ता मजबूत वित्तीय स्थिति और बेहतर प्रशासन से होकर ही गुजरेगा। जो सहकारी साख समितियां लंबे समय में बैंकिंग क्षेत्र में प्रवेश करना चाहती हैं, उनके लिए अब अपने प्रदर्शन और वित्तीय अनुशासन को साबित करना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
