उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले की तरबगंज तहसील में शत्रु संपत्ति से जुड़े कथित फर्जीवाड़े ने एक नया मोड़ ले लिया है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), गोंडा ने मामले में प्रथम दृष्टया गंभीर अनियमितताओं के संकेत मिलने पर तरबगंज थाना पुलिस को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(4) के तहत एफआईआर दर्ज कर विधिक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।
यह मामला तरबगंज तहसील के ग्राम गौहानी स्थित एक शत्रु संपत्ति से जुड़ा है। अदालत में दायर प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया गया कि राजस्व अभिलेखों में कूटरचना, ओवरराइटिंग और कथित मिलीभगत के माध्यम से फर्जी प्रविष्टियां दर्ज कर सरकारी भूमि को निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज कराने की कोशिश की गई। आरोप है कि इसी आधार पर संपत्ति की खरीद-बिक्री की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई गई।
अदालत ने उपलब्ध अभिलेखों और प्रस्तुत तथ्यों का परीक्षण करने के बाद माना कि मामले में संज्ञेय अपराध के पर्याप्त संकेत दिखाई देते हैं। इसी आधार पर पुलिस को एफआईआर दर्ज कर निष्पक्ष जांच करने तथा 10 दिनों के भीतर कार्रवाई की रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।
SDM सहित अन्य पर हैं आरोप:
प्रार्थना पत्र में जिन लोगों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं, उनमें तत्कालीन उपजिलाधिकारी (SDM), तत्कालीन हल्का लेखपाल, अन्य राजस्व कर्मचारी तथा कुछ निजी व्यक्ति शामिल हैं। आरोप है कि इन्हीं की मिलीभगत से राजस्व रिकॉर्ड में कथित हेराफेरी कर सरकारी संपत्ति को निजी नामों पर दर्ज कराया गया।
अब पुलिस विवेचना के दौरान राजस्व अभिलेखों, संबंधित दस्तावेजों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच करेगी। जांच में जो तथ्य सामने आएंगे, उसी के आधार पर संबंधित व्यक्तियों की जिम्मेदारी तय की जाएगी।
क्या है शत्रु संपत्ति:
शत्रु संपत्ति वह अचल संपत्ति होती है, जिसके मूल मालिक भारत छोड़कर पाकिस्तान या चीन जैसे शत्रु देश के नागरिक बन गए थे। देश के विभाजन, वर्ष 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों के बाद ऐसी बड़ी संख्या में संपत्तियां सरकार के नियंत्रण में आईं।
इन संपत्तियों में मकान, दुकान, कृषि भूमि, व्यावसायिक परिसर और अन्य अचल संपत्तियां शामिल हैं। इनका प्रबंधन केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त कस्टोडियन ऑफ एनेमी प्रॉपर्टी फॉर इंडिया (CEPI) के माध्यम से किया जाता है।
देशभर में हजारों शत्रु संपत्तियां दर्ज हैं, जिनकी अनुमानित कीमत लाखों करोड़ रुपये तक आंकी जाती है। इनकी सुरक्षा और संरक्षण की जिम्मेदारी केंद्र सरकार के अधीन है।
शत्रु संपत्ति से जुड़े प्रमुख कानूनी प्रावधान
शत्रु संपत्ति अधिनियम, 1968
यह वह मूल कानून है जिसके तहत शत्रु संपत्तियों को सरकारी संरक्षण में लिया गया और उनके प्रबंधन की व्यवस्था की गई।
कस्टोडियन ऑफ एनेमी प्रॉपर्टी
इन संपत्तियों की देखरेख, संरक्षण और प्रशासनिक नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार ने कस्टोडियन की व्यवस्था की है। बिना वैधानिक अनुमति के ऐसी संपत्तियों का हस्तांतरण या बिक्री वैध नहीं मानी जाती।
वर्ष 2017 का संशोधन
शत्रु संपत्ति अधिनियम में वर्ष 2017 में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। संशोधन के बाद सरकार को ऐसी संपत्तियों के प्रबंधन और आवश्यक परिस्थितियों में उनके निस्तारण के व्यापक अधिकार मिले। साथ ही कानून को और स्पष्ट बनाया गया ताकि उत्तराधिकार और स्वामित्व से जुड़े विवादों को सीमित किया जा सके।
न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र
शत्रु संपत्ति से जुड़े मामलों में सामान्य सिविल न्यायालयों की भूमिका सीमित है। ऐसे मामलों में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष कानूनी चुनौती दी जा सकती है। यही कारण है कि इनसे जुड़े विवाद अक्सर लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया में चलते रहते हैं।
क्यों सामने आते रहते हैं ऐसे मामले?
उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में समय-समय पर शत्रु संपत्तियों पर अवैध कब्जे और रिकॉर्ड में हेराफेरी के मामले सामने आते रहे हैं। विशेषज्ञ इसके पीछे कई कारण बताते हैं—
- कई स्थानों पर शत्रु संपत्तियों का रिकॉर्ड पूरी तरह अद्यतन नहीं है।
- राजस्व अभिलेखों में कथित फर्जी प्रविष्टियां और दस्तावेजों से छेड़छाड़ की शिकायतें मिलती रही हैं।
- विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की कमी के कारण समय पर कार्रवाई नहीं हो पाती।
- शहरी क्षेत्रों में इन संपत्तियों की बाजार कीमत अधिक होने से अवैध कब्जे और धोखाधड़ी का खतरा बढ़ जाता है।
आगे क्या ?
अदालत के आदेश के बाद तरबगंज पुलिस को विधि अनुसार एफआईआर दर्ज कर मामले की जांच शुरू करनी होगी। जांच के दौरान राजस्व अभिलेखों की जांच, दस्तावेजों का सत्यापन तथा संबंधित अधिकारियों और निजी व्यक्तियों से पूछताछ की जाएगी। यदि जांच में कूटरचना या सरकारी रिकॉर्ड से छेड़छाड़ के आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।
गोंडा का यह मामला एक बार फिर सरकारी और शत्रु संपत्तियों की सुरक्षा व्यवस्था, राजस्व अभिलेखों की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि जांच में आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह मामला केवल एक भूमि विवाद नहीं बल्कि सरकारी संपत्ति के संरक्षण से जुड़ा एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
