दिल्ली के जंतर-मंतर पर Gen Z के प्रदर्शनों की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक नई और अनोखी तस्वीर सामने आई — इस बार सड़क पर उतरने वाले युवा नहीं, बल्कि स्कूली बच्चे थे। मीडिया ने इसे “Gen Alpha” का विरोध नाम दिया, यानी 2010 से 2024 के बीच जन्मी वह पीढ़ी जो अब तक ज़्यादातर स्मार्टफोन और डिजिटल दुनिया से जुड़ी पहचान के लिए जानी जाती थी, पहली बार अपने बुनियादी अधिकारों के लिए सड़क पर नारेबाज़ी करती नज़र आई।
यह पूरा मामला शुरू हुआ लखनऊ के पारा क्षेत्र स्थित जयप्रकाश नारायण सर्वोदय विद्यालय से, जो समाज कल्याण विभाग के अंतर्गत संचालित होता है। शुक्रवार, 14 अगस्त को स्कूल के सैकड़ों छात्र स्कूल परिसर से निकलकर बुद्धेश्वर चौराहे पर पहुंच गए और आगरा एक्सप्रेसवे की तरफ जाने वाला मार्ग जाम कर दिया। संयोग से इसी जाम में समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण का काफिला भी फंस गया, जो कन्नौज जा रहे थे। मंत्री और विभाग के निदेशक अनुराग यादव मौके पर पहुंचे, छात्रों से बातचीत की और जल्द समाधान का भरोसा दिलाया, जिसके बाद प्रदर्शन खत्म हुआ।
लेकिन यह आश्वासन ज़्यादा दिन नहीं टिका। तीन दिन बाद, सोमवार 17 अगस्त को, उसी स्कूल की छात्राएं दोबारा सड़क पर उतर आईं — इस बार दुबग्गा -कानपुर बाईपास और बालागंज चौराहा जाम कर दिया गया। छात्राओं का कहना था कि मंत्री के आश्वासन के बावजूद ज़मीनी हालात में कोई बदलाव नहीं आया।
बच्चों की शिकायतें क्या हैं?
छात्र-छात्राओं की शिकायतें बुनियादी लेकिन गंभीर हैं:
- विषय शिक्षकों की भारी कमी — छात्राओं का आरोप है कि फिजिक्स, केमिस्ट्री जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों में शिक्षक ही नहीं हैं, जिससे बोर्ड परीक्षा की तैयारी बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
- हॉस्टल का खराब भोजन — बच्चों ने आरोप लगाया कि खाने में बार-बार कीड़े निकलते हैं।
- इलाज की अनुपलब्धता — बीमार पड़ने पर समय पर इलाज न मिलने की शिकायतें भी सामने आईं।
- स्कूल प्रबंधन की अनियमितताएं — सामान्य प्रशासनिक कुव्यवस्था को लेकर भी नाराज़गी जताई गई।
अधिकारियों के मुताबिक, अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति का मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है, यही वजह बताई जा रही है कि खाली पड़े शिक्षकों के पद तुरंत नहीं भरे जा सकते।
अकेला लखनऊ नहीं — पूरे देश में गूंज
यह घटना अकेले लखनऊ तक सीमित नहीं रही। दिल्ली में Gen Z के प्रदर्शनों के बाद राजस्थान से लेकर मध्य प्रदेश तक अलग-अलग राज्यों में स्कूली बच्चों ने अधिकारों और सुविधाओं को लेकर अधिकारियों के सामने सवाल खड़े किए। कहीं बच्चियों ने नए स्कूल के दूर होने पर आपत्ति जताई तो कहीं बुनियादी ढांचे की कमी पर आवाज़ उठाई। यह पैटर्न दिखाता है कि सरकार के तमाम दावों के बावजूद ज़मीनी शिक्षा व्यवस्था में गहरी खामियां बरकरार हैं।
लखनऊ की घटना पर विपक्ष ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सरकार पर निशाना साधते हुए सवाल किया कि जब स्कूली बच्चों को सड़क पर उतरना पड़ रहा है, तो प्रदेश की शिक्षा मंत्री कहां हैं।
कागज़ पर सुधार बनाम ज़मीनी हकीकत
यहीं पर यह पूरा मामला एक बड़े विरोधाभास को उजागर करता है। एक तरफ सरकार के आंकड़े और दावे भारी-भरकम सुधार की तस्वीर पेश करते हैं:
- उत्तर प्रदेश सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में बेसिक (प्राथमिक) शिक्षा के लिए ₹77,622 करोड़ की भारी-भरकम राशि आवंटित की है।
- बेसिक शिक्षा विभाग के “ऑपरेशन कायाकल्प” और माध्यमिक शिक्षा विभाग के “प्रोजेक्ट अलंकार” के तहत सरकार का दावा है कि स्कूलों में पेयजल, शौचालय, पुस्तकालय, विज्ञान प्रयोगशालाएं, स्मार्ट कक्षाएं और डिजिटल संसाधन जैसी सुविधाएं तेज़ी से पहुंचाई गई हैं।
- प्रदेश में करीब 29,216 माध्यमिक विद्यालय संचालित हैं, जिनमें 2,460 राजकीय हाईस्कूल और इंटर कॉलेज शामिल हैं, और सरकार इन सबके “कायाकल्प” का श्रेय लेती है।
लेकिन दूसरी तरफ, ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। खुद लखनऊ के मोहनलालगंज विधानसभा क्षेत्र के सिसेंडी कस्बे के एक प्राथमिक विद्यालय की खस्ता हालत स्वच्छ भारत मिशन जैसे सरकारी दावों की पोल खोलती नज़र आई है। वहीं एक जन-संवाद कार्यक्रम में डालीगंज के एक शिक्षामित्र ने भले माना कि पहले के मुकाबले हालात कुछ सुधरे हैं, लेकिन शिक्षकों की कमी और स्पेशल चाइल्ड (दिव्यांग बच्चों) की शिक्षा को लेकर चिंताएं अभी भी बनी हुई हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो तस्वीर और चिंताजनक है — पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न कारणों से देशभर में कुल 94,028 सरकारी स्कूल या तो बंद हो चुके हैं या दूसरे स्कूलों में विलय कर दिए गए हैं, और यह प्रक्रिया अब भी जारी है। शिक्षा अधिकार अधिनियम (RTE) 2010 के तहत तय 30:1 का छात्र-शिक्षक अनुपात कई जगह अब भी सिर्फ कागज़ों पर ही सिमटा नज़र आता है।
नारे नहीं, नीति में बदलाव चाहिए
लखनऊ के जयप्रकाश नारायण सर्वोदय विद्यालय की घटना अकेली नहीं, बल्कि एक बड़े ढांचागत संकट की एक झलक भर है। सरकार के बजट आंकड़े और “कायाकल्प”, “अलंकार” जैसी योजनाओं के नाम भले प्रभावशाली लगें, लेकिन जब स्कूली बच्चों को मंत्री का काफिला रोककर अपनी बुनियादी मांगें मनवानी पड़ें, तो यह साफ संकेत है कि योजना और क्रियान्वयन के बीच की खाई अब भी बहुत गहरी है।
खास बात यह भी है कि यह विरोध अब सिर्फ एक स्कूल या एक शहर तक सीमित नहीं रह गया — Gen Alpha का यह गुस्सा राजस्थान से मध्य प्रदेश तक कई राज्यों में एक जैसे मुद्दों पर फूट रहा है, जो दिखाता है कि यह समस्या स्थानीय प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक व्यापक और व्यवस्थागत विफलता है। जब तक शिक्षक भर्ती, बुनियादी ढांचे और छात्र कल्याण से जुड़े फैसले अदालतों और फाइलों में अटके रहेंगे, तब तक कागज़ों पर लिखी “बदली तस्वीर” और स्कूल के भीतर बच्चों की असल ज़िंदगी के बीच का यह फासला शायद ही पट पाएगा।
