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Home»राज्य»उत्तरप्रदेश»उत्तर प्रदेश में 9 वर्षों का स्वास्थ्य सफर: 2017 बनाम 2026
उत्तरप्रदेश

उत्तर प्रदेश में 9 वर्षों का स्वास्थ्य सफर: 2017 बनाम 2026

News DriftBy News DriftJune 21, 2026No Comments5 Mins Read
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उत्तर प्रदेश में 9 वर्षों का स्वास्थ्य सफर: 2017 बनाम 2026
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उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राज्य के लिए स्वास्थ्य सेवाएं केवल एक प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि उसके ‘सर्वोदय’ की पहली शर्त हैं। वर्ष 2017 से लेकर जून 2026 तक के इन 9 वर्षों में राज्य के स्वास्थ्य परिदृश्य ने नीतिगत, ढांचागत और बजटीय स्तर पर एक लंबा सफर तय किया है।

हालिया उत्तर प्रदेश बजट 2026-27 के प्रामाणिक आंकड़ों और धरातलीय यथार्थ के आलोक में, पेश है इस 9 वर्षों के सफर का एक ईमानदार, सूचनाप्रद और संतुलित विश्लेषण:

1. बजटीय आवंटन: कागजी आंकड़ों से धरातल तक

2017 की तुलना में 2026 तक आते-आते उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वास्थ्य बजट में ऐतिहासिक वृद्धि की है। यह वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि राज्य अब स्वास्थ्य को आर्थिक प्रगति का मुख्य आधार मान रहा है।

  • बजट का आकार: वर्ष 2017-18 में चिकित्सा और स्वास्थ्य का बजट जहाँ लगभग ₹14,000 से ₹15,000 करोड़ के आसपास था, वहीं बजट 2026-27 में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण क्षेत्र के लिए रिकॉर्ड आवंटन किया गया है।

  • प्रमुख बजटीय स्तंभ (2026-27):

    • राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM): इसके तहत ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए भारी धनराशि आवंटित की गई है।

    • प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन (PM-ABHIM): प्रत्येक जिले में क्रिटिकल केयर ब्लॉक और सर्विलांस यूनिट्स के लिए विशेष बजटीय प्रावधान किया गया है।

2. बुनियादी ढांचा (Infrastructure): ‘वन डिस्ट्रिक्ट, वन मेडिकल कॉलेज’

2017 में उत्तर प्रदेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि लखनऊ, कानपुर या वाराणसी जैसे गिने-चुने बड़े शहरों को छोड़कर बाकी जिलों में सुपर-स्पेशियलिटी इलाज की भारी कमी थी।

उपलब्धियाँ (2017 बनाम 2026)

  • मेडिकल कॉलेजों का जाल: 2017 से पहले राज्य में बमुश्किल 12-15 सरकारी मेडिकल कॉलेज चालू स्थिति में थे। 2026 तक आते-आते ‘वन डिस्ट्रिक्ट, वन मेडिकल कॉलेज’ नीति के तहत राज्य के लगभग सभी जिलों में मेडिकल कॉलेज या तो क्रियाशील हो चुके हैं या पीपीपी (PPP) मॉडल पर अंतिम चरण में हैं।

  • ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों का कायाकल्प: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) को आयुष्मान आरोग्य मंदिर  के रूप में अपग्रेड किया गया है, जहाँ टेली-मेडिसिन  के जरिए सीधे लखनऊ या दिल्ली के डॉक्टरों से परामर्श संभव हुआ है।

चुनौतियाँ

  • DPR और निर्माण गुणवत्ता: कई नए स्वीकृत मेडिकल कॉलेजों और ग्रामीण विंग्स के निर्माण में DPR (Detailed Project Report) और BOQ (Bill of Quantities) के तकनीकी मानकों के अनुपालन को लेकर स्थानीय स्तर पर शिकायतें रही हैं। बुनियादी ढांचे के विस्तार के साथ-साथ निर्माण की दीर्घकालिक गुणवत्ता सुनिश्चित करना अभी भी एक प्रशासनिक चुनौती है।

मानव संसाधन : डॉक्टरों और स्टाफ की स्थिति

मशीनें और इमारतें खड़ी करना आसान है, लेकिन उन्हें चलाने के लिए योग्य हाथ ढूंढना इन 9 वर्षों की सबसे बड़ी परीक्षा रही है।

उपलब्धियाँ

  • सीटों में वृद्धि: मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ने से एमबीबीएस (MBBS) और पीजी (PG) सीटों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, जिससे आने वाले समय में डॉक्टरों की कमी दूर होने की उम्मीद जगी है।

  • नर्सिंग और पैरामेडिकल सेक्टर: मिशन निरामया के तहत नर्सिंग कॉलेजों की गुणवत्ता सुधारी गई है, जिससे ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों को कुशल कार्यबल मिल रहा है।

चुनौतियाँ

  • ग्रामीण क्षेत्रों में तैनाती: आज भी विशेषज्ञ डॉक्टरों (सर्जन्स, पीडियाट्रिशियन्स, गायनेकोलॉजिस्ट्स) की ग्रामीण और दूरदराज के CHCs में तैनाती एक बड़ा संकट है। डॉक्टरों का बड़े शहरों की तरफ झुकाव कम करना और ग्रामीण अंचलों में उनकी रुकने की दर बढ़ाना 2026 की सबसे बड़ी नीतिगत चुनौती है।

सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सूचकांक:

शिशु मृत्यु दर (IMR) और मातृ मृत्यु दर (MMR) किसी भी राज्य के स्वास्थ्य तंत्र का असली आईना होते हैं।

  • आयुष्मान भारत और मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना: इन 9 वर्षों में करोड़ों गरीब परिवारों को ₹5 लाख तक का मुफ्त इलाज का सुरक्षा कवच मिला है। इसने ग्रामीण आबादी को इलाज के कारण होने वाले कर्ज के जाल से बचाया है।

  • सूचकांकों में सुधार: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़ों के अनुसार, 2017 की तुलना में 2026 तक उत्तर प्रदेश ने संस्थागत प्रसव और पूर्ण टीकाकरण में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। जापानी इन्सेफेलाइटिस (JE) और एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) जैसी बीमारियों पर पूर्वी यूपी में लगभग पूर्ण नियंत्रण पाया गया है, जो एक बड़ी सफलता है।

आगे की राह: 2026 और उसके बाद का रोडमैप

उत्तर प्रदेश के ‘सर्वोदय’ के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को अगले स्तर पर ले जाने के लिए तीन मोर्चों पर काम करना होगा:

  1. तकनीकी और वित्तीय पारदर्शिता: स्वास्थ्य परियोजनाओं के बजट आवंटन में सोशल ऑडिट और आरटीआई (RTI) जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करना, ताकि हर पैसा सीधे मरीज के इलाज में लगे।

  2. प्रिवेंटिव हेल्थकेयर पर जोर: जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों (डायबिटीज, हाइपरटेंशन) के लिए ग्रामीण स्तर पर ही स्क्रीनिंग तेज करना।

  3. लॉजिस्टिक्स और दवा उपलब्धता: सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवाओं की उपलब्धता की चेन को डिजिटल रूप से ट्रैक करना ताकि ‘स्टॉक आउट’ की समस्या न हो।

निष्कर्ष: 2017 का उत्तर प्रदेश जहाँ स्वास्थ्य के मामले में केवल ‘आपातकालीन प्रबंधन’ पर निर्भर था, वहीं 2026 का उत्तर प्रदेश ‘स्थायी और आत्मनिर्भर बुनियादी ढांचे’ की ओर बढ़ चुका है। सफर लंबा है, चुनौतियाँ गंभीर हैं, लेकिन दिशा सकारात्मक है।

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