हर साल 13 अगस्त को दुनियाभर में वर्ल्ड ऑर्गन डोनेशन डे (विश्व अंगदान दिवस) मनाया जाता है। इस दिन का मकसद लोगों को अंगदान के महत्व के बारे में जागरूक करना, इससे जुड़े भ्रम और मिथकों को दूर करना, और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को स्वैच्छिक रूप से अंगदान का संकल्प लेने के लिए प्रेरित करना है। एक व्यक्ति का अंगदान कई ज़िंदगियों को नया जीवन दे सकता है, फिर भी दुनियाभर में अंगों की मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है — और भारत भी इससे अछूता नहीं है।
वर्ल्ड ऑर्गन डोनेशन डे 2026 और इसकी थीम
इस साल की थीम लोगों को यह समझाने पर केंद्रित है कि एक सोच-समझकर लिया गया फैसला उम्मीद की शुरुआत बन सकता है — यानी अंगदान का संकल्प लेने का एक छोटा सा कदम कई परिवारों के लिए जीवनदायी साबित हो सकता है। यह दिन डॉक्टरों, नर्सों और ट्रांसप्लांट टीमों के समर्पण को भी सम्मान देता है, जो अंगदान की प्रक्रिया को सफल बनाने में दिन-रात जुटे रहते हैं। ग़ौरतलब है कि विश्व अंगदान दिवस (13 अगस्त) से अलग, भारत अपना राष्ट्रीय अंगदान दिवस 3 अगस्त को मनाता है — यह तारीख देश के पहले सफल मृतक-दाता हृदय प्रत्यारोपण (3 अगस्त 1994) की याद में चुनी गई थी।
भारत में अंगदान की मौजूदा स्थिति
स्वास्थ्य मंत्रालय और NOTTO की वार्षिक रिपोर्ट (2025-26) के मुताबिक, भारत में अंगदान और प्रत्यारोपण की तस्वीर पिछले एक दशक में काफी बदली है:
- 2025 में भारत में कुल 20,138 अंग प्रत्यारोपण हुए — यह अब तक किसी एक साल में हुए सबसे ज़्यादा प्रत्यारोपण हैं, जो 2024 के मुकाबले करीब 6.5 प्रतिशत ज़्यादा है।
- यह आंकड़ा 2013 के मुकाबले चार गुना से भी ज़्यादा है, जब देश में सिर्फ करीब 4,990 प्रत्यारोपण हुए थे।
- इस उपलब्धि के साथ भारत अब अमेरिका और चीन के बाद कुल प्रत्यारोपणों के मामले में दुनिया में तीसरे स्थान पर है, और जीवित-दाता प्रत्यारोपण के मामले में दुनिया में सबसे आगे है।
- हालांकि इसमें मृतक दाताओं (deceased donors) का योगदान अब भी सीमित है — 2025 में मृतक दाताओं से करीब 3,526 प्रत्यारोपण हुए, जो 2013 के 837 के मुकाबले काफी बढ़ोतरी है, लेकिन कुल प्रत्यारोपणों का यह हिस्सा अब भी लगभग 18 प्रतिशत के आसपास ही है — यानी भारत आज भी बड़े पैमाने पर जीवित दाताओं (मुख्यतः परिवार के सदस्यों) पर निर्भर है।
कितने लोग अंग के इंतज़ार में हैं
भारत में अंगों की मांग और उपलब्धता के बीच का अंतर अब भी बहुत बड़ा बना हुआ है। रिपोर्टों के मुताबिक, देश में करीब 80 हज़ार से 90 हज़ार के बीच मरीज़ राष्ट्रीय वेटिंग लिस्ट में किसी न किसी अंग के प्रत्यारोपण का इंतज़ार कर रहे हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या किडनी के मरीज़ों की है, इसके बाद लिवर, हृदय, फेफड़े और पैंक्रियास के मरीज़ों का नंबर आता है। महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और दिल्ली जैसे राज्यों में वेटिंग लिस्ट सबसे लंबी है। दिल्ली में सबसे ज़्यादा प्रत्यारोपण होने के बावजूद वहां मृत्युदर भी ज़्यादा है, क्योंकि अधिकतर प्रत्यारोपण जीवित परिजनों से होते हैं, मृतक दाताओं से नहीं, जिससे कतार लंबी होती जाती है।
भारत में अंगदान से जुड़ा कानून क्या है
भारत में अंगदान और प्रत्यारोपण को नियंत्रित करने वाला मुख्य कानून है — मानव अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम (Transplantation of Human Organs and Tissues Act — THOTA), 1994, जिसमें 2011 में महत्वपूर्ण संशोधन भी किए गए। इस कानून के तहत:
- अंगदान को पूरी तरह स्वैच्छिक और निःशुल्क रखा गया है — अंगों की खरीद-फरोख्त या व्यावसायिक लेन-देन को गैरकानूनी घोषित किया गया है, ताकि अंग तस्करी और शोषण को रोका जा सके।
- मस्तिष्क मृत्यु (ब्रेन-स्टेम डेथ) को कानूनी रूप से मृत्यु माना जाता है, जिससे मृतक दाताओं से अंग प्रत्यारोपण संभव हो पाता है। इसके लिए चार डॉक्टरों की एक टीम — जिसमें अस्पताल का मेडिकल सुपरिटेंडेंट, इलाज कर रहा चिकित्सक, एक न्यूरोलॉजिस्ट/न्यूरोसर्जन और सरकार द्वारा नामित एक डॉक्टर शामिल होता है — निर्धारित प्रक्रिया के तहत मस्तिष्क मृत्यु की पुष्टि करती है।
- जीवित दाता आमतौर पर केवल अपने करीबी रिश्तेदारों (माता-पिता, भाई-बहन, बच्चे, जीवनसाथी) को अंगदान कर सकता है। यदि दाता करीबी रिश्तेदार नहीं है, तो मामले को राज्य स्तरीय प्राधिकरण समिति के पास मंज़ूरी के लिए भेजा जाता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि दान के पीछे कोई व्यावसायिक मकसद नहीं है।
- देशभर में अंगदान और प्रत्यारोपण की निगरानी और समन्वय के लिए राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (NOTTO) शीर्ष संस्था के रूप में काम करता है, जिसके अंतर्गत क्षेत्रीय (ROTTO) और राज्य स्तरीय (SOTTO) संगठन भी सक्रिय हैं। ये संस्थाएं वेटिंग लिस्ट प्रबंधन, अंग आवंटन और डेटा निगरानी का काम संभालती हैं।
- 18 साल से कम उम्र के लोग भी अंगदान का संकल्प ले सकते हैं, लेकिन इसके लिए माता-पिता या अभिभावक की सहमति ज़रूरी होती है।
क्या अंगदान बढ़ रहा है
आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में अंगदान को लेकर जागरूकता और भागीदारी दोनों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। 2023 में शुरू किए गए राष्ट्रीय डिजिटल प्रतिज्ञा पोर्टल के ज़रिए अब तक 5 लाख से ज़्यादा आधार-सत्यापित अंगदान संकल्प दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें से सिर्फ 2025 में ही 2.58 लाख से अधिक नागरिकों ने अंगदान का संकल्प लिया। यह रुझान दिखाता है कि भारतीय समाज में अंगदान को लेकर हिचक धीरे-धीरे कम हो रही है, हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल के मुताबिक मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर अब भी एक राष्ट्रीय प्राथमिकता का मुद्दा बना हुआ है। मंत्रालय के अनुसार, इस अंतर के पीछे लोगों की अनिच्छा से ज़्यादा जागरूकता की कमी और मिथकों को लेकर झिझक ज़िम्मेदार है — जबकि सच यह है कि किसी भी प्रमुख धर्म में अंगदान को वर्जित नहीं बताया गया है।
कौन-कौन से अंग दान किए जा सकते हैं और कितनी देर तक सुरक्षित रहते हैं
मृतक दाता से आमतौर पर निम्नलिखित प्रमुख अंग और ऊतक दान किए जा सकते हैं:
- हृदय (हार्ट): शरीर से निकालने के बाद करीब 4 से 6 घंटे के भीतर प्रत्यारोपित करना ज़रूरी होता है।
- फेफड़े (लंग्स): इन्हें भी लगभग 4 से 6 घंटे के भीतर प्रत्यारोपित किया जाना चाहिए।
- लिवर: इसे 8 से 12 घंटे तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
- पैंक्रियास: करीब 12 से 24 घंटे तक उपयोग किया जा सकता है।
- किडनी (गुर्दे): आधुनिक संरक्षण तकनीकों की मदद से 24 से 36 घंटे, और कुछ मामलों में इससे भी अधिक समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है — इसी वजह से किडनी सबसे ज़्यादा प्रत्यारोपित होने वाला अंग है।
- छोटी आंत (इंटेस्टाइन): आमतौर पर 6 से 8 घंटे के भीतर प्रत्यारोपित की जाती है।
- कॉर्निया (आंख): मृत्यु के कुछ घंटों बाद निकाली जा सकती है और उसे 6 से 14 दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है, जिससे यह सबसे व्यापक रूप से दान किया जाने वाला ऊतक बन जाता है।
- त्वचा और हड्डियां (स्किन व बोन टिश्यू): इन्हें उचित तरीके से संरक्षित करने पर वर्षों तक इस्तेमाल के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है, और इनका उपयोग जलने के गंभीर मरीज़ों व हड्डी संबंधी सर्जरी में किया जाता है।
इसके अलावा हृदय के वाल्व भी दान किए जा सकते हैं। एक मृतक दाता अपने अंगों और ऊतकों के ज़रिए 8 से ज़्यादा लोगों की जान बचा सकता है और कई अन्य लोगों के जीवन की गुणवत्ता सुधार सकता है।
हाल में शुरू हुई पहलें
अगस्त 2026 में 16वें भारतीय अंगदान दिवस के मौके पर केंद्र सरकार ने अंगदान के तंत्र को और मज़बूत, पारदर्शी व सुलभ बनाने के लिए कई नई पहलें शुरू कीं:
- जुग जुग जियो अभियान: यह एक साल भर चलने वाला राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान है, जिसका मकसद देश के कोने-कोने तक अंगदान का संदेश पहुंचाना है।
- ई-प्रत्यारोपण: यह एक एकीकृत डिजिटल मंच है, जो अस्पतालों, डॉक्टरों, दाताओं, प्राप्तकर्ताओं और अन्य सभी हितधारकों को एक ही तकनीकी प्रणाली में जोड़ता है, ताकि पंजीकरण, वेटिंग-लिस्ट प्रबंधन, अंग आवंटन और निगरानी की पूरी प्रक्रिया अधिक सुव्यवस्थित व पारदर्शी बन सके।
- NOTTO मोबाइल ऐप: इससे आम नागरिकों के लिए अंगदान से जुड़ी जानकारी और सेवाएं और आसानी से उपलब्ध हो सकेंगी।
इसके अलावा एम्स जोधपुर, एम्स भुवनेश्वर, एम्स पटना और एम्स ऋषिकेश में लिवर ट्रांसप्लांट, तथा एम्स भोपाल में हृदय प्रत्यारोपण सेवाएं भी शुरू की गई हैं, जिससे प्रत्यारोपण सुविधाओं का दायरा देश के अन्य हिस्सों तक भी बढ़ रहा है।
आगे की चुनौतियां
इतनी प्रगति के बावजूद भारत के सामने कुछ बड़ी चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं — जैसे मृतक दाताओं से जुड़े अंगदान को बढ़ावा देने के लिए ब्रेन-स्टेम डेथ को लेकर जागरूकता बढ़ाना, अस्पतालों के आईसीयू में अंगदान काउंसलिंग को व्यवस्थित तरीके से शामिल करना, और सभी पंजीकृत प्रत्यारोपण अस्पतालों से समय पर डेटा रिपोर्टिंग सुनिश्चित करना — क्योंकि 2025 में 804 पंजीकृत अस्पतालों में से 217 अस्पताल राष्ट्रीय रजिस्ट्री पर अनिवार्य डेटा अपलोड करने में विफल रहे। इसके साथ ही अवैध अंग तस्करी को रोकना और नैतिक प्रत्यारोपण सुनिश्चित करना भी नियामकीय स्तर पर एक सतत चुनौती बना हुआ है।
विश्व अंगदान दिवस इस बात की याद दिलाता है कि एक व्यक्ति का लिया गया एक सोचा-समझा फैसला कई परिवारों के लिए उम्मीद की नई किरण बन सकता है — बशर्ते ज़्यादा से ज़्यादा लोग जागरूक हों, संकल्प लें और अपने परिवार के साथ इस इच्छा को साझा करें।
