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Home»राज्य»उत्तरप्रदेश»भूमि रजिस्ट्री में क्रांतिकारी बदलाव के खिलाफ लामबंद वकील
उत्तरप्रदेश

भूमि रजिस्ट्री में क्रांतिकारी बदलाव के खिलाफ लामबंद वकील

News DriftBy News DriftJune 19, 2026No Comments4 Mins Read
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भूमि रजिस्ट्री में क्रांतिकारी बदलाव के खिलाफ लामबंद वकील
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भूमि रजिस्ट्री: लखनऊ की तपती गर्मी में जून 2026 के दूसरे हफ्ते कुछ अलग ही किस्म की आग भड़की। मुजफ्फरनगर से नोएडा तक, लखीमपुर खीरी से इलाहाबाद तक — उत्तर प्रदेश के करीब 35 जिलों में सब-रजिस्ट्रार दफ्तरों के बाहर वकीलों, दस्तावेज लेखकों, स्टाम्प विक्रेताओं और टाइपिस्टों की भीड़ धरने पर बैठ गई। सरकारी दफ्तर ताले में बंद, रजिस्ट्री का काम पूरी तरह ठप।

 

मामला है उत्तर प्रदेश सरकार की उस महत्वाकांक्षी योजना का, जिसे सरकार “ई-पंजीकरण” कह रही है और जिसे विरोधी “हजारों परिवारों की रोजी-रोटी पर हमला” बता रहे हैं।

पासपोर्ट की तर्ज पर रजिस्ट्री — सरकार का दांव

उत्तर प्रदेश सरकार का प्रस्ताव दरअसल एक बड़े सुधार की कोशिश है। विचार यह है कि जिस तरह पासपोर्ट बनवाने के लिए अब सीधे सरकारी पोर्टल पर जाकर अपॉइंटमेंट लिया जाता है, दस्तावेज अपलोड किए जाते हैं और बीच में किसी दलाल या एजेंट की जरूरत नहीं होती — ठीक वैसे ही जमीन-जायदाद की रजिस्ट्री भी पूरी तरह ऑनलाइन हो जाए। खरीदार और विक्रेता दोनों खुद पोर्टल पर अपने कागज अपलोड करेंगे, आधार से बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन होगी, और सब-रजिस्ट्रार दफ्तर में केवल अंतिम मुहर लगाने जाना होगा।

सरकार का तर्क साफ है — रजिस्ट्री के नाम पर चल रही दलाली और भ्रष्टाचार की जड़ काटनी है।
और यह तर्क निराधार भी नहीं। किसी भी सब-रजिस्ट्रार दफ्तर के बाहर खड़े होकर देखिए — एक पूरी समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही होती है। “एजेंट” अपॉइंटमेंट दिलाने से लेकर कागज बनाने तक हर काम के लिए मनमाना पैसा वसूलते हैं। एक सामान्य रजिस्ट्री में सरकारी शुल्क के अलावा हजारों रुपये इन बिचौलियों की “फीस” में चले जाते हैं।

तो फिर विरोध किस बात का:

सवाल वाजिब है। अगर व्यवस्था बेहतर हो रही है, तो शोर क्यों?

जवाब उस पूरे समूह में है जो इस व्यवस्था के इर्द-गिर्द पलता-बढ़ता रहा है। वकील जो रजिस्ट्री के दस्तावेज तैयार करते हैं, दस्तावेज लेखक जो सालों से यही काम कर रहे हैं, स्टाम्प विक्रेता, टाइपिस्ट — इन सबकी आजीविका सीधे इस काम से जुड़ी है। सब रजिस्ट्रार एडवोकेट एसोसिएशन का कहना है कि नई व्यवस्था से हजारों परिवार सड़क पर आ जाएंगे।

यह चिंता महज स्वार्थ की नहीं है। इसमें एक असली सवाल भी छिपा है — क्या सरकार ने इस बदलाव से पहले इन लोगों के पुनर्वास की कोई योजना बनाई? क्या कोई वैकल्पिक रोजगार का रास्ता सोचा गया?

आम आदमी का क्या होगा?

यहाँ बात केवल वकीलों और दस्तावेज लेखकों की नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की भी है जो जमीन खरीदते-बेचते हैं।

UP की बड़ी आबादी ग्रामीण और अर्धशिक्षित है। जिस किसान ने जिंदगी में एकाध बार जमीन की रजिस्ट्री कराई होगी, उससे पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड करने, आधार वेरिफिकेशन करने और ऑनलाइन प्रक्रिया पूरी करने की उम्मीद रखना ज़मीनी हकीकत से दूर है।

पंजाब में जब ऑनलाइन रजिस्ट्री शुरू हुई तो एक अजीब स्थिति सामने आई — दस्तावेज लेखक अब सिर्फ “ऑनलाइन अपॉइंटमेंट” दिलाने के लिए हजारों रुपये वसूलने लगे। दलाल खत्म नहीं हुए, बस उनका काम और उनकी फीस बदल गई। बिचौलिया डिजिटल हो गया।

तकनीक का सच

ई-पंजीकरण के फायदे असली हैं — कोई शक नहीं। भ्रष्टाचार में कमी, पारदर्शिता, डेटा का केंद्रीयकरण, फर्जी रजिस्ट्री पर रोक, स्टाम्प ड्यूटी चोरी में कटौती — ये सब बड़े और जरूरी सुधार हैं। लेकिन तकनीक तभी काम करती है जब उसके पीछे तैयारी हो। सर्वर डाउन, इंटरनेट की कमजोरी, डिजिटल साक्षरता का अभाव — ये व्यावहारिक दिक्कतें हैं जो पायलट प्रोजेक्ट के बिना समझ नहीं आतीं।

रास्ता क्या है?

यह लड़ाई “डिजिटलीकरण हाँ या नहीं” की नहीं है। असली सवाल यह है कि यह बदलाव कैसे हो।

सरकार को चाहिए कि पहले कुछ जिलों में पायलट प्रोजेक्ट चलाए, डिजिटल साक्षरता केंद्र खोले, और प्रभावित वर्गों को नई व्यवस्था में सहायक की भूमिका दे — न कि उन्हें बाहर का रास्ता दिखाए। सुधार और संवेदनशीलता साथ चल सकते हैं, बशर्ते इच्छाशक्ति हो।

फिलहाल संघर्ष समिति ने आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया है। और सरकार के सामने यह चुनौती है कि वह तकनीक की राह पर चले भी, और उन हजारों परिवारों को बेसहारा भी न छोड़े जो दशकों से इस व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं।

जमीन की रजिस्ट्री बदलने की बात है — पर जमीन उनके पैरों तले से न खिसके, यह भी देखना होगा।

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