नमो ग्रीन रेल: 17 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन फ्यूल सेल आधारित यात्री ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे। इस उद्घाटन के साथ ही भारत हाइड्रोजन ट्रेन संचालित करने वाला दुनिया का पांचवां देश बन जाएगा जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन (परीक्षण) और चीन के बाद। यह सिर्फ एक नई ट्रेन का शुभारंभ नहीं, बल्कि भारतीय रेलवे के “आत्मनिर्भर भारत” और हरित परिवहन मिशन का एक बड़ा प्रतीकात्मक कदम है।
इसी मौके पर प्रधानमंत्री जींद और नरवाना के नवनिर्मित अमृत भारत रेलवे स्टेशनों का भी उद्घाटन करेंगे, साथ ही हरियाणा में हज़ारों करोड़ रुपये की अन्य विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास करेंगे — जिनमें कुरुक्षेत्र का एलिवेटेड रेलवे ट्रैक, दो नए मेडिकल कॉलेज (भिवानी और नारनौल) और कई सड़क परियोजनाएं शामिल हैं।
प्रोजेक्ट क्या है?
रूट और शुरुआत
- हाइड्रोजन ट्रेन हरियाणा के जींद-सोनीपत रेलखंड (करीब 89 किलोमीटर) पर पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चलेगी।
- रेलवे बोर्ड के शेड्यूल के अनुसार, नियमित संचालन में ट्रेन नंबर 74010 सुबह 7:40 बजे जींद से रवाना होकर सुबह 9:40 बजे सोनीपत पहुंचेगी, और वापसी में ट्रेन नंबर 74009 सुबह 10:40 बजे सोनीपत से चलकर दोपहर 1:00 बजे जींद पहुंचेगी।
- रूट पर कई स्टॉपेज प्रस्तावित हैं, और किराया लगभग 5 से 25 रुपये के बीच रखा गया है।
तकनीकी विशेषताएं
- ट्रेन को रिसर्च, डिज़ाइन एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइजेशन (RDSO) ने डिज़ाइन किया है और चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) में इसका निर्माण हुआ है ।
- यह 10 कोच वाली ट्रेन है, जिसमें 1200 किलोवाट क्षमता की दो ड्राइविंग पावर कार (कुल 2400 किलोवाट पावर आउटपुट) और आठ यात्री डिब्बे शामिल हैं — यह ब्रॉड गेज पर चलने वाली दुनिया की सबसे लंबी और सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेन है, जो जर्मनी की मूल कोराडिया आईलिंट ट्रेन से करीब पांच गुना लंबी है ।
- इसमें 3 कोच विशेष रूप से हाइड्रोजन भंडारण के लिए हैं, जिनमें फ्यूल सेल कनवर्टर, बैटरियां और वायु भंडारण प्रणाली एकीकृत है ।
- ट्रायल में ट्रेन ने 120-140 किमी/घंटा तक की रफ्तार हासिल की, लेकिन यात्रियों की सुरक्षा को देखते हुए वाणिज्यिक संचालन में अधिकतम गति 75 किमी/घंटा तय की गई है।
- ट्रेन की क्षमता करीब 2600 यात्रियों तक बताई गई है (कोच शहरी मेट्रो डिज़ाइन पर आधारित हैं, जिनमें DC एयर-कंडीशनिंग और ऑटोमैटिक दरवाज़े हैं)।
हाइड्रोजन कैसे मिलेगा
- जींद में ही एक हाइड्रोजन उत्पादन संयंत्र स्थापित किया गया है, जो इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया से “ग्रीन हाइड्रोजन” तैयार करता है।
- यहां हाइड्रोजन आपूर्ति एक 1 मेगावाट क्षमता वाले पॉलिमर इलेक्ट्रोलाइट मेम्ब्रेन (PEM) इलेक्ट्रोलाइजर से होगी, जो प्रतिदिन करीब 430 किलोग्राम हाइड्रोजन तैयार करेगा ।
- संपीड़ित हाइड्रोजन गैस के भंडारण और वितरण के लिए पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) से ज़रूरी मंज़ूरी ली जा चुकी है ।
काम कैसे करती है
हाइड्रोजन फ्यूल सेल में हाइड्रोजन गैस ऑक्सीजन के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करती है, जिससे बिजली पैदा होती है — यही बिजली ट्रेन के इलेक्ट्रिक मोटर को चलाती है। इस प्रक्रिया का इकलौता उप-उत्पाद पानी (जलवाष्प) है, यानी कोई कार्बन उत्सर्जन नहीं।
बड़ा संदर्भ: “हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज” मिशन
यह जींद-सोनीपत ट्रेन अकेली परियोजना नहीं है, बल्कि एक बड़े मिशन का पहला कदम है:
- रेल मंत्रालय ने “हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज” प्रोजेक्ट के तहत देशभर में 35 हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की योजना बनाई है, जिसके लिए 2,800 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है। हेरिटेज और पहाड़ी मार्गों पर बुनियादी ढांचे के लिए अतिरिक्त 600 करोड़ रुपये अलग से रखे गए हैं।
- अनुमान के मुताबिक हर हाइड्रोजन ट्रेन की लागत करीब 80 करोड़ रुपये है, जबकि ज़रूरी बुनियादी ढांचे (हाइड्रोजन प्लांट, रीफ्यूलिंग स्टेशन, सुरक्षा उपकरण) पर अलग से करीब 70 करोड़ रुपये खर्च होंगे — हालांकि रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का कहना है कि चूंकि यह अभी पायलट चरण है, इसलिए इसकी तुलना स्थापित (डीज़ल/इलेक्ट्रिक) ट्रेनों की लागत से करना जल्दबाज़ी होगी।
- यह परियोजना भारतीय रेलवे के 2030 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन के व्यापक लक्ष्य का हिस्सा है।
फायदे
- शून्य कार्बन उत्सर्जन: हाइड्रोजन ट्रेन से डीज़ल इंजन के मुकाबले सिर्फ पानी निकलता है, कोई धुआं या कालिख नहीं।
- गैर-विद्युतीकृत रूट पर भी संचालन: यह गैर-विद्युतीकृत ट्रैकों पर भी चल सकती है, जिससे महंगी ओवरहेड इलेक्ट्रिफिकेशन परियोजनाओं की ज़रूरत ख़त्म हो जाती है — खासकर छोटे, हेरिटेज या पहाड़ी रूटों के लिए यह बड़ी बचत है।
- आत्मनिर्भर भारत का प्रदर्शन: यह पूरी तरह भारत में डिज़ाइन और विकसित तकनीक है, जो हाइड्रोजन कर्षण, भंडारण, रीफ्यूलिंग और रेलवे इंजीनियरिंग में स्वदेशी क्षमता को दिखाती है ।
- ईंधन की बचत (दीर्घकाल में): निर्माण लागत ज़्यादा है, लेकिन हाइड्रोजन की तुलनात्मक रूप से कम परिचालन लागत के चलते अनुमान है कि 30 साल के जीवनकाल में करोड़ों रुपये का ईंधन खर्च बचाया जा सकता है।
- ऊर्जा सुरक्षा: आयातित जीवाश्म ईंधन (डीज़ल) पर निर्भरता घटाकर घरेलू स्तर पर उत्पादित हरित हाइड्रोजन की ओर बढ़ना।
- किफायती किराया: शुरुआती अनुमान में किराया मात्र 5-25 रुपये रखा गया है, जिससे स्थानीय यात्रियों को सस्ती, स्वच्छ यात्रा सुविधा मिलेगी।
- तकनीकी नेतृत्व: दुनिया की सबसे लंबी (10-कोच) ब्रॉड गेज हाइड्रोजन ट्रेन बनाकर भारत इस तकनीक में वैश्विक बेंचमार्क स्थापित करने का दावा कर रहा है।
चुनौतियां
- ज़्यादा निर्माण व बुनियादी ढांचा लागत: प्रति ट्रेन 80 करोड़ रुपये और अलग से बुनियादी ढांचे पर 70 करोड़ रुपये का खर्च — डीज़ल या इलेक्ट्रिक ट्रेनों की तुलना में शुरुआती निवेश काफी ज़्यादा है।
- हाइड्रोजन की ज्वलनशील प्रकृति और सुरक्षा: हाइड्रोजन गैसीय और अत्यंत विस्फोटक प्रकृति की होती है, इसलिए स्टेशन पर गैस-रिसाव सेंसर, फ्लेम डिटेक्टर, बैकअप कंप्रेसर और नियमित सुरक्षा ऑडिट जैसी अतिरिक्त व्यवस्थाएं ज़रूरी हैं।
- सीमित गति: ट्रायल में 120-140 किमी/घंटा तक की क्षमता दिखाने के बावजूद, वाणिज्यिक संचालन में गति सिर्फ 75 किमी/घंटा तक सीमित रखी गई है — यानी अभी यह हाई-स्पीड विकल्प नहीं बन सकती।
- हाइड्रोजन उत्पादन व रीफ्यूलिंग नेटवर्क की कमी: अभी सिर्फ जींद में एक प्लांट है; बड़े पैमाने पर विस्तार के लिए देशभर में हाइड्रोजन उत्पादन व रीफ्यूलिंग स्टेशनों का जाल बिछाना बड़ी चुनौती होगी।
- वैश्विक अनुभव सतर्क करने वाला: जर्मनी ने अपनी अधिकतर कोराडिया आईलिंट हाइड्रोजन ट्रेनें 2024 के अंत में सेवा से हटा लीं और भविष्य में बैटरी-इलेक्ट्रिक विकल्पों की ओर झुकाव दिखाया है; फ्रांस की योजना उम्मीद से धीमी रही है; जापान की FV-E991 ट्रेन 2022 से टेस्ट में है पर बड़े पैमाने पर नहीं पहुंची; और चीन की CRRC-निर्मित हाइड्रोजन ट्रेन भी अभी परीक्षण चरण में ही है, जर्मनी के फ्रैंकफर्ट क्षेत्र में 27 आईलिंट ट्रेनों के बेड़े को उम्मीद से कम भरोसेमंद पाए जाने पर दिसंबर 2024 में बड़े पैमाने पर रिपेयर के लिए वापस बुलाना पड़ा था । यह दिखाता है कि तकनीक अभी दुनियाभर में भी परिपक्वता के दौर से गुज़र रही है।
- आपूर्ति शृंखला की अनिश्चितता: वैश्विक स्तर पर हाइड्रोजन फ्यूल सेल आपूर्तिकर्ताओं में भी उठापटक देखी गई है — जैसे कमिंस कंपनी को अपने फ्यूल सेल कारोबार में भारी घाटे के बाद उसे बेचना पड़ा</cite>, जिससे लंबी अवधि में पुर्जों व सर्विस सपोर्ट को लेकर सवाल उठते हैं।
- लागत तुलना का अभाव: चूंकि यह पायलट चरण में है, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि बड़े पैमाने (35 ट्रेनों) पर विस्तार होने पर लागत घटेगी या मुश्किलें बढ़ेंगी।
दुनिया में हाइड्रोजन ट्रेन की स्थिति
| देश | स्थिति |
|---|---|
| जर्मनी | 2018 में दुनिया की पहली व्यावसायिक हाइड्रोजन यात्री ट्रेन “कोराडिया आईलिंट” (एल्सटॉम निर्मित) शुरू करने वाला पहला देश। 2022 तक नियमित सेवा और लगातार माइलेज बढ़ता गया , लेकिन 2024 के अंत में लोअर सैक्सनी के अधिकतर ट्रेन सेवा से हटा लिए गए, और भविष्य के ऑर्डर बैटरी-इलेक्ट्रिक तकनीक की ओर झुकते दिख रहे हैं । फ्रैंकफर्ट क्षेत्र में हाइड्रोजन आपूर्ति में तकनीकी दिक्कतों के चलते कई ट्रेनें रद्द या डीज़ल विकल्पों से बदलनी पड़ीं । |
| फ्रांस | एल्सटॉम की मूल कंपनी फ्रांस में है और वहां हाइड्रोजन बेड़े में निवेश जारी है, पर योजनाएं शुरुआती अनुमान से धीमी गति से आगे बढ़ी हैं। |
| इटली | लोम्बार्डी क्षेत्र में करीब 400 मिलियन यूरो की लागत से “H2iseO” हाइड्रोजन वैली प्रोजेक्ट के तहत ब्रेशिया-इसेओ-एदोलो गैर-विद्युतीकृत रूट पर 14 हाइड्रोजन ट्रेनें (कोराडिया स्ट्रीम एच) चलाने की योजना है, जो मूल रूप से मिलान-कॉर्टिना विंटर ओलंपिक 2026 के लिए तैयार होनी थीं, पर अब 2026 की पहली छमाही में सेवा शुरू होने की उम्मीद है — यह योजना से एक साल से ज़्यादा पीछे चल रही है । |
| जापान | 2022 में योकोहामा-कावासाकी के बीच त्सुरुमी लाइन पर FV-E991 सीरीज़ हाइड्रोजन ट्रेन टेस्ट सेवा में उतारी गई, और जापान HYBARI नाम की एक हाइब्रिड (फ्यूल सेल + बैटरी) ट्रेन भी विकसित कर रहा है , पर बड़े पैमाने पर विस्तार अभी बाकी है। |
| चीन | CRRC कंपनी द्वारा विकसित हाइड्रोजन यात्री ट्रेन परीक्षण संचालन में है, लेकिन अभी वॉल्यूम प्रोडक्शन में नहीं पहुंची। |
| दक्षिण कोरिया | ह्यूंडे रोटेम द्वारा निर्मित 38 हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्राम डेजॉन मेट्रो लाइन-2 के लिए बनाई जा रही हैं, जिनकी सेवा 2028 में शुरू होने की उम्मीद है। |
| अमेरिका/कनाडा | सितंबर 2025 में कैलिफ़ोर्निया के सैन बर्नार्डिनो-रेडलैंड्स रूट पर “एरो” नाम से पहली हाइड्रोजन ट्रेन सेवा शुरू हुई , जबकि कनाडा में CPKC रेलवे ने अल्बर्टा प्रांत की मदद से हाइड्रोजन लोकोमोटिव के दीर्घकालिक पायलट प्रोजेक्ट में तीन इकाइयां शामिल की हैं। |
| भारत | 17 जुलाई 2026 को जींद-सोनीपत रूट पर स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन का वाणिज्यिक शुभारंभ — दुनिया की सबसे लंबी (10-कोच) ब्रॉड गेज हाइड्रोजन ट्रेन, जो देश को इस तकनीक अपनाने वाला पांचवां देश बनाती है। |
दुनियाभर में हाइड्रोजन ट्रेन तकनीक “साबित तो हो चुकी है, पर आर्थिक रूप से बैटरी-इलेक्ट्रिक विकल्पों के मुकाबले संघर्ष कर रही है” — यही पैटर्न जर्मनी, फ्रांस, जापान और चीन सभी जगह देखने को मिलता है। भारत के लिए यह चुनौती और भी अहम है, क्योंकि यहां लक्ष्य सिर्फ प्रदर्शन नहीं बल्कि 35 ट्रेनों के बड़े बेड़े तक विस्तार करना है।
निष्कर्ष
17 जुलाई की यह ट्रेन भारतीय रेलवे के लिए एक ऐतिहासिक तकनीकी उपलब्धि है — स्वदेशी डिज़ाइन, सबसे लंबा हाइड्रोजन ट्रेन-सेट, और हरित ऊर्जा की दिशा में ठोस कदम। लेकिन यह अभी एक पायलट प्रोजेक्ट है, न कि पूर्ण रूप से सिद्ध वाणिज्यिक मॉडल। जर्मनी और अन्य देशों का अनुभव बताता है कि हाइड्रोजन ट्रेन तकनीक को भरोसेमंद और किफायती बनाने में अभी वक़्त और सुधार दोनों लगेंगे। अगले कुछ वर्षों में जींद-सोनीपत रूट का प्रदर्शन ही तय करेगा कि “हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज” मिशन के तहत बाकी 34 ट्रेनें कितनी तेज़ी से पटरी पर उतरती हैं।
