भारत में आज एक अजीब विरोधाभास दिख रहा है। एक तरफ खाने-पीने की चीज़ों में मिलावट लगातार बढ़ रही है और इससे जुड़ी बीमारियाँ देश के कोने-कोने में पैर पसार रही हैं, तो दूसरी तरफ सरकार और उसके ज़िम्मेदार अधिकारी अक्सर जाति-धर्म और राजनीतिक बहसों में उलझे नज़र आते हैं। दूध, पनीर, घी, मसाले, तेल — रोज़मर्रा की लगभग हर खाने की चीज़ में मिलावट की खबरें सामने आ रही हैं, लेकिन जनस्वास्थ्य जैसा बुनियादी मुद्दा अक्सर सुर्खियों से गायब रहता है।
यह सिर्फ आम धारणा नहीं है। हाल के महीनों में सामने आई जाँच रिपोर्टों और सरकारी कार्रवाइयों ने खुद इस संकट की गंभीरता को उजागर किया है।
तुकाराम मुंढे मॉडल: सख्ती से बदलाव मुमकिन है
महाराष्ट्र में इस साल एक उदाहरण सामने आया जो दिखाता है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति हो तो हालात बदले जा सकते हैं। 2005 बैच के IAS अधिकारी तुकाराम मुंढे को जब महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) का कमिश्नर बनाया गया, तो उन्होंने मुंबई, कोंकण, पुणे, नासिक, छत्रपति संभाजीनगर और नागपुर सहित पूरे राज्य में सरप्राइज़ इंस्पेक्शन का अभियान शुरू किया। कुछ ही महीनों में यह अभियान 1,100 से ज़्यादा निरीक्षणों तक पहुँच गया।
शिरडी जैसे धार्मिक स्थलों पर भी उन्होंने कार्रवाई की — करीब 700 किलो संदिग्ध मिलावटी और घटिया गुणवत्ता वाला पेड़ा ज़ब्त कर नष्ट कराया गया। रेस्टोरेंट, होटल, बेकरी, डेयरी और यहाँ तक कि क्विक-कॉमर्स ब्रांड तक इस जाँच के दायरे में आए। नतीजा यह हुआ कि पूरे राज्य में खाद्य कारोबारियों ने अपनी रसोई की सफाई और मानकों में खुद सुधार करना शुरू कर दिया, सिर्फ इस डर से कि कभी भी औचक निरीक्षण हो सकता है।
मुंढे का करियर पहले भी सोलापुर में जल संरक्षण (जलयुक्त शिवार) और नवी मुंबई में अवैध निर्माण के खिलाफ सख्ती के लिए जाना गया है। उनकी कार्यशैली पर बहस ज़रूर हुई है — बॉम्बे हाईकोर्ट ने कुछ मामलों में लाइसेंस निलंबन को यह कहते हुए पलटा कि कार्रवाई प्रक्रिया के मुताबिक और आनुपातिक होनी चाहिए। लेकिन मूल बात यही है: जहाँ नियम पहले से मौजूद हैं, वहाँ सिर्फ उन्हें ईमानदारी से लागू करने भर से बड़ा फर्क पड़ता है। सवाल यह है कि बाकी राज्यों में यह इच्छाशक्ति कहाँ है।
मिलावट किस-किस चीज़ में हो रही है?
खाद्य सुरक्षा एजेंसियों की हालिया जाँचों में मिलावट का दायरा चौंकाने वाला है:
दूध और डेयरी उत्पाद: देश भर में असली दूध की जगह सिंथेटिक और “एनालॉग” दूध का इस्तेमाल आम हो गया है। जाँच में सामने आया कि नकली पनीर, घी और खोया बनाने के लिए टैल्कम पाउडर, हानिकारक डिटर्जेंट, टाइटेनियम डाइऑक्साइड और लिक्विड ग्लूकोज़ जैसी चीज़ें मिलाई जा रही थीं। दिल्ली-एनसीआर में नकली और एनालॉग पनीर की सप्लाई का बड़ा केंद्र हरियाणा का मेवात इलाका बताया गया, जबकि नकली दूध और खोया उत्तर प्रदेश के शामली और बागपत से सप्लाई हो रहा था। यह हालात इतने गंभीर हो गए कि उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ के बाद अब उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अगस्त 2026 में पनीर, घी और खोया जैसे एनालॉग डेयरी उत्पादों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया।
मसाले और तेल: ईंट का बुरादा, रंग (कलर), लकड़ी का बुरादा और सस्ते फिलर मसालों में मिलाए जाने की शिकायतें लगातार आती रही हैं। खाने के तेल में सस्ते और अक्सर अखाद्य तेलों की मिलावट सेहत के लिए गंभीर खतरा है।
सड़क किनारे के ठेले और दुकानें: गर्मी और बरसात के मौसम में यह समस्या और बढ़ जाती है। नालियों के किनारे, गंदगी और खुले में बिकने वाले खाने-पीने के सामान — गोलगप्पे, चाट, जूस, कटे हुए फल — इन सबमें बैक्टीरिया और गंदे पानी के संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि मानसून में गंदा पानी आसानी से खुले खाद्य पदार्थों में मिल जाता है।
इससे कौन-कौन सी बीमारियाँ हो रही हैं?
मिलावटी खाना सिर्फ पेट खराब करने तक सीमित नहीं है — इसके असर लंबे समय तक शरीर पर पड़ते हैं:
- पेट और आंतों की बीमारियाँ: फूड पॉइज़निंग, दस्त, टाइफाइड, हैज़ा, पीलिया (हेपेटाइटिस-A) जैसी बीमारियाँ दूषित और मिलावटी खाने-पानी से सीधे जुड़ी हैं।
- किडनी और लिवर पर असर: नकली दूध और डेयरी उत्पादों में मिलाए जाने वाले केमिकल, डिटर्जेंट और टाइटेनियम डाइऑक्साइड जैसे तत्व लंबे समय तक सेवन करने पर किडनी और लिवर को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
- कैंसर का खतरा: कुछ रंग (टेक्सटाइल डाई), मिलावटी तेल और परिरक्षक (प्रिज़रवेटिव) लगातार सेवन से कैंसर के खतरे को बढ़ाने वाले माने जाते हैं।
- बच्चों में कुपोषण और विकास संबंधी समस्याएँ: मिलावटी दूध और डेयरी उत्पाद बच्चों को ज़रूरी पोषण देने की बजाय उनके शारीरिक-मानसिक विकास को प्रभावित कर सकते हैं।
- एलर्जी और त्वचा रोग: मिलावटी और अस्वच्छ खाद्य पदार्थों से एलर्जी, त्वचा में जलन और संक्रमण जैसी समस्याएँ भी सामने आती रही हैं।
- हृदय रोग: मिलावटी घी और तेल में इस्तेमाल होने वाले सस्ते वनस्पति फैट और ट्रांस-फैट दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं।
उत्तर प्रदेश की तस्वीर
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा दूध उत्पादक राज्य है, फिर भी यहाँ संगठित क्षेत्र में सिर्फ करीब 10% दूध ही प्रोसेस होता है, जबकि राष्ट्रीय औसत लगभग 17% है। यही खाली जगह मिलावटखोरों के लिए मौका बन जाती है। मथुरा जैसे धार्मिक-पर्यटन केंद्रों में भी छापेमारी के दौरान दूध, पनीर और पेड़े के नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे।
सरकारी डेयरी ब्रांड पराग का हाल भी इस लापरवाही की मिसाल रहा है — कानपुर का ऐतिहासिक पराग प्लांट 2013 में बंद हो गया था और सालों तक बदहाल पड़ा रहा। राहत की बात यह है कि 2025-26 में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के साथ समझौते के बाद इसे दोबारा शुरू किया गया है। लेकिन सवाल यह है कि दशकों तक एक भरोसेमंद सरकारी ब्रांड को यूँ ही बदहाल क्यों छोड़ा गया, जबकि निजी क्षेत्र में मिलावट का कारोबार फलता-फूलता रहा।
महाराष्ट्र के अनुभव से एक बात साफ है — कानून पहले से मौजूद है, खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम (FSSAI एक्ट), 2006 काफी सख्त प्रावधान देता है। कमी कानून की नहीं, बल्कि उसे ज़मीन पर लागू करने की इच्छाशक्ति की है। जब तक हर राज्य में तुकाराम मुंढे जैसी सख्ती और निरंतरता नहीं दिखेगी, तब तक मिलावट का यह कारोबार यूँ ही फलता-फूलता रहेगा और आम आदमी की थाली में ज़हर परोसा जाता रहेगा। जनस्वास्थ्य को राजनीतिक बहसों से ऊपर रखना अब विकल्प नहीं, ज़रूरत बन चुका है।
