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Home»बिजनेस»RBI का मेगा डिविडेंड: सरकार की झोली में ₹2.86 लाख करोड़
बिजनेस

RBI का मेगा डिविडेंड: सरकार की झोली में ₹2.86 लाख करोड़

News DriftBy News DriftMay 23, 2026No Comments4 Mins Read
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RBI का मेगा डिविडेंड: सरकार की झोली में ₹2.86 लाख करोड़
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RBI का मेगा डिविडेंड: वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के मोर्चे पर जूझ रही केंद्र की मोदी सरकार के लिए देश के केंद्रीय बैंक (RBI) से एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर आई है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को ₹2,86,588.46 करोड़ (लगभग 2.86 लाख करोड़ रुपये) का अब तक का सबसे ऐतिहासिक और रिकॉर्ड-तोड़ सरप्लस (डिविडेंड) ट्रांसफर करने की मंजूरी दे दी है।

यह भारी-भरकम रकम वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत में ही सरकारी खजाने को जबरदस्त मजबूती देगी। हालांकि, इस रिकॉर्ड मुनाफे के बाद भी देश के आर्थिक जगत में एक नई और दिलचस्प बहस छिड़ गई है।

लगातार तीसरे साल तोड़े रिकॉर्ड: पिछले वर्षों का गणित

आरबीआई द्वारा सरकार को भेजा गया यह लाभांश अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। अगर पिछले तीन सालों के ट्रेंड पर नजर डालें, तो केंद्रीय बैंक की कमाई और सरकार को मिलने वाले हिस्से में लगातार बढ़ोतरी हुई है:

  • वित्त वर्ष 2025-26: ₹2.86 लाख करोड़ (रिकॉर्ड डिविडेंड)

  • वित्त वर्ष 2024-25: ₹2.69 लाख करोड़

  • वित्त वर्ष 2023-24: ₹2.11 लाख करोड़

बाजार विश्लेषकों (Analysts) ने अनुमान लगाया था कि इस बार डिविडेंड ₹2.7 लाख करोड़ से ₹3.5 लाख करोड़ के बीच रह सकता है, और यह फैसला उम्मीदों के दायरे में ही रहा।

इसे भी पढ़ें: यूपी का नया विधानभवन

आखिर कैसे हुई RBI को इतनी बंपर कमाई?

इस भारी-भरकम सरप्लस के पीछे आरबीआई की मजबूत वित्तीय नीतियां और वैश्विक बाजार के समीकरण रहे हैं। आरबीआई की कुल आय में पिछले साल के मुकाबले 26.42% की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस मुनाफे के तीन सबसे मुख्य कारण रहे:

  1. डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट: वित्त वर्ष 2026 के दौरान अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया करीब 10% तक कमजोर हुआ। इस गिरावट से आरबीआई की बैलेंस शीट का विस्तार हुआ और उसके विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों के मूल्यांकन में बड़ा लाभ हुआ।

  2. विदेशी मुद्रा बाजार में एक्टिव दखल: रुपये की अत्यधिक कमजोरी को रोकने के लिए आरबीआई ने मुद्रा बाजार में सक्रिय रूप से डॉलर बेचे, जिससे उसे भारी मुनाफा हुआ।

  3. विदेशी निवेश पर रिटर्न: वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव के बीच आरबीआई को अपने विदेशी निवेशों और करेंसी स्वैप परिचालन से बेहतरीन रिटर्न मिला।

आरबीआई का आधिकारिक बयान: “जोखिम प्रावधानों और वैधानिक फंडों में ट्रांसफर से पहले, वित्त वर्ष 2026 में कुल शुद्ध आय ₹3,95,972.10 करोड़ रही, जो पिछले साल ₹3,13,455.77 करोड़ थी। इसके अलावा 31 मार्च, 2026 तक बैंक की बैलेंस शीट 20.61% बढ़कर ₹91,97,121.08 करोड़ हो गई है।”

रिकॉर्ड डिविडेंड पर छिड़ी ‘सोना बेचने’ की जंग:

इतने बड़े ऐतिहासिक लाभांश के बावजूद, देश के आर्थिक और बाजार विश्लेषकों के बीच एक नई बहस शुरू हो गई है। वित्तीय जगत के एक धड़े का मानना है कि यह डिविडेंड राशि बाजार की उम्मीदों के मुकाबले थोड़ी कम रही है।

आर्थिक विश्लेषकों के इस वर्ग का तर्क है कि आरबीआई अपनी बैलेंस शीट पर 6.5% का जो आकस्मिक जोखिम बफर बनाए रखता है, उसे और व्यावहारिक किया जा सकता है। उनका सुझाव है कि केंद्रीय बैंक को अपने भारी-भरकम सोने के भंडार के कुछ हिस्से को लिक्विडेट करना चाहिए और अपनी बैलेंस शीट के आकार को तर्कसंगत बनाना चाहिए, ताकि सरकार को विकास कार्यों के लिए और अधिक अधिशेष राशि ट्रांसफर की जा सके।

बाजार में आमने-सामने आए दो दृष्टिकोण

इस सुझाव के सामने आते ही आर्थिक मामलों के जानकारों और निवेशकों के बीच विचारों का सीधा टकराव देखने को मिला:

  • अधिक सरप्लस के समर्थक: इनका तर्क है कि जब देश को वैश्विक चुनौतियों के बीच आर्थिक विकास की गति तेज करनी हो, तो केंद्रीय बैंक के पास जमा अतिरिक्त पूंजी का इस्तेमाल सरकारी खजाने को मजबूत करने में होना चाहिए। बफर फंड की सीमाओं को थोड़ा लचीला बनाकर अर्थव्यवस्था को अधिक गति दी जा सकती है।

  • पारंपरिक अर्थशास्त्री और सुरक्षा के समर्थक: इसके विपरीत, विशेषज्ञों के एक बड़े वर्ग ने आरबीआई की मौजूदा नीति का पुरजोर समर्थन किया है। उनका मानना है कि सोना या आपातकालीन बफर फंड किसी भी देश की आर्थिक रीढ़ होते हैं। सोना केवल बेहद गंभीर या अभूतपूर्व वित्तीय संकट के समय ही छुआ जाता है, सिर्फ बैलेंस शीट को छोटा करने या लाभांश बढ़ाने के लिए नहीं। वैश्विक मंदी और भू-राजनीतिक तनाव को देखते हुए 6.5% का सुरक्षा बफर देश के आर्थिक भविष्य के लिए बेहद जरूरी है।

कंटिजेंट रिस्क बफर के बारे में:

दरअसल, तय बैंकिंग नियमों और विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के मुताबिक, आरबीआई को किसी भी अप्रत्याशित वित्तीय जोखिम, बाजार की भारी उथल-पुथल या वैश्विक आर्थिक झटकों से निपटने के लिए अपनी कुल बैलेंस शीट का 5.5% से 6.5% हिस्सा आपातकालीन फंड यानी ‘कंटिजेंट रिस्क बफर’ (CRB) के रूप में सुरक्षित रखना अनिवार्य होता है।

केंद्रीय बैंक ने इस बार भी सतर्कता बरतते हुए ऊपरी सीमा यानी 6.5% का अधिकतम सुरक्षा बफर अपने पास सुरक्षित रखा और बाकी बची शुद्ध अधिशेष राशि सरकार को ट्रांसफर की।

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