बैंकिंग अब पैसे जमा करने की जगह नहीं रही — यह पैसे काटने का एक संस्थागत तंत्र बनती जा रही है। RBI के नरम नियमों और सरकार की आँखें मूँदने के बीच, आम जनता हर महीने अनजाने में सैकड़ों रुपये गँवाती रहती है।
न्यूनतम बैलेंस की अनिवार्यता — वित्तीय समावेशन का सबसे बड़ा झूठ:
एक तरफ सरकार “सबका साथ, सबका विकास” और वित्तीय समावेशन के नारे लगाती है, प्रधानमंत्री अपने भाषणों में जन-धन योजना की पीठ थपथपाते हैं — वहीं दूसरी तरफ बैंक खाते में न्यूनतम बैलेंस न रख पाने पर जुर्माना वसूला जाता है। सरकारी बैंक SBI से लेकर HDFC, ICICI जैसे निजी बैंक — सभी इस खेल में बराबर के भागीदार हैं। और प्राइवेट बैंकों में ये चार्ज तो 300 से 500 के बीच होता है , वो भी मासिक। सुविधा या वित्तीय उत्पीड़न? बैंक कैसे कर रहे हैं आम जनता की जेब ढीली
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस गरीब आदमी के पास पहले से पैसे नहीं, उससे “पैसे न रखने” पर पैसे काटना — क्या यह वित्तीय समावेशन है या वित्तीय उत्पीड़न?
बैंकों के प्रमुख चार्ज — जो जनता नहीं जानती:
आखिर हर चीज पर टैक्स देने वाली जनता और लोन पर ब्याज देने वाले ग्राहकों से सर्विस चार्ज के नाम पर इस तरह की वसूली क्यों की जा रही है , और इसका सबसे बड़ा शिकार बन रहा है – सिर्फ गरीब , श्रमिक और माध्यम वर्गीय।
ATM का खेल — लापरवाही बैंक की, भरपाई जनता की:
यह शायद सबसे बड़ा अन्याय है। जब बैंक का अपना ATM खराब हो, कैश खत्म हो, या नेटवर्क डाउन हो — तब ग्राहक मजबूर होकर दूसरे बैंक के ATM जाता है। और उसी पर चार्ज लगता है। गलती बैंक की, सज़ा ग्राहक की।
उदाहरण से समझिये –
आखिर बैंक जनता के पैसों से कमाती कैसे है?
हर बैंक आपके जमा पैसों को दूसरों को ऊँची ब्याज दर पर उधार देती है — यही उसका मूल व्यवसाय है। SBI आपको सेविंग अकाउंट पर 2.7% ब्याज देती है, जबकि आपके ही पैसे किसी को 8–12% पर होम लोन के रूप में देती है। यह मुनाफा लाखों करोड़ में है। फिर भी SMS अलर्ट के लिए ₹15 माँगना — क्या यह न्यायसंगत है?
NEFT / RTGS / IMPS — “डिजिटल” पर डबल मार:
2019 में RBI ने NEFT और RTGS को ग्राहकों के लिए मुफ्त किया था — पर सिर्फ ऑनलाइन। बैंक शाखा में जाकर NEFT करवाएँ तो ₹2 से ₹25 तक कटते हैं। और IMPS — जो 24×7 काम करता है — अभी भी पूरी तरह चार्जेबल है। असली डिजिटल-मजबूर लोग यानी बुजुर्ग, अनपढ़, ग्रामीण — वे शाखा जाते हैं और ज्यादा चुकाते हैं।
Debit / Credit Card स्वाइप — हर खरीद पर छुपा टैक्स:
जब आप दुकान पर कार्ड स्वाइप करते हैं, तो दुकानदार से MDR (Merchant Discount Rate) काटी जाती है — 0.4% से 2.5% तक। दुकानदार यह रकम माल की कीमत में जोड़ देता है। मतलब कार्ड से खरीदने वाला असल में ज्यादा चुका रहा है, बिना जाने।
दुनिया के वे देश — जहाँ बैंकिंग सच में मुफ्त और सुलभ है
भारत में जहाँ बैंकिंग चार्जेज़ की बाढ़ है, वहीं कई देशों ने यह साबित कर दिया है कि किफायती और सम्मानजनक बैंकिंग संभव है।
RBI और सरकार की भूमिका — खामोश दर्शक?
RBI समय-समय पर दिशानिर्देश जारी करता है, लेकिन बैंकों को चार्ज तय करने की व्यापक स्वायत्तता दी गई है। परिणाम? निजी बैंक स्पर्धा के बजाय मिलीभगत से एक जैसे चार्ज लगाते हैं, और सरकारी बैंक भी पीछे नहीं रहते।
2022 में RBI ने बैंकों को निर्देश दिया था कि SMS अलर्ट शुल्क में पारदर्शिता लाएँ — लेकिन निगरानी और प्रवर्तन की कमी के चलते स्थिति जस की तस है।
वहीं दूसरी तरफ सरकार जनता पर नए नए करों से तो वसूली कर ही रही है साथ ही बैंकिंग को भी आम आदमी को लूटने की खुली छूट दे रखी हैं , लाखों करोड़ों का घोटाला करके लोग फरार हो जाते हैं और फिर यही जनता बैंकों के घाटों की भरपाई अलग अलग चार्जेज से करती है।
जनता की माँगें — जो होनी चाहिए:
- सभी बेसिक सेविंग अकाउंट पर न्यूनतम बैलेंस की अनिवार्यता समाप्त हो। जन-धन की तरह सभी खातों को शून्य-बैलेंस का अधिकार मिले।
- ATM खराब होने पर दूसरे बैंक की निकासी मुफ्त हो। बैंक की गलती, ग्राहक नहीं भरेगा।
- UPI/NEFT/RTGS सदा के लिए मुफ्त रखे जाएँ। डिजिटल इंडिया का सपना शुल्क से मत तोड़ो।
- सभी बैंक चार्जेज़ का एक राष्ट्रीय रजिस्टर बने। जनता को पहले से पता हो कि कौन सा बैंक क्या काटेगा।
- RBI को स्वतंत्र और सशक्त बनाया जाए — ताकि वह बैंकों के खिलाफ जनता का पक्ष ले सके।
बैंकिंग एक सार्वजनिक सेवा है, न कि मुनाफाखोरी का लाइसेंस। जब तक सरकार और RBI जनता के हितों को सर्वोपरि नहीं रखेंगे, यह लूट जारी रहेगी — बस तरीके बदलते रहेंगे।
